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SEBI प्रमुख महोदय, स्टॉक मार्केट को संभलने का दें मौका, कड़े नियमों में करें बदलाव

तुहिन कांत पांडेय के नाम खुला पत्र: ऐसे कड़े नियमों में ढील दें, जिन्होंने निवेशकों का भरोसा तोड़ा है, और बुच द्वारा प्रस्तावित बड़े बदलावों पर फिलहाल रोक लगाएं.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

पलक शाह

 

प्रिय महोदय,  

SEBI प्रमुख के रूप में आपकी नियुक्ति पर बधाई! मुंबई और इसकी अफरा-तफरी में आपका स्वागत है. पिछले एक साल में विदेशी निवेशकों (FPIs) ने भारतीय बाजार से 25 अरब डॉलर से ज्यादा की रकम निकाल ली है. खास बात यह है कि इस साल यानी 2025 के पहले दो महीनों में ही इसका लगभग 50% हिस्सा निकाला जा चुका है. यह सब आपकी पूर्ववर्ती, माधबी पुरी बुच के कार्यकाल में हुआ, जिन्होंने SEBI के नियमों को बहुत सख्त बना दिया. उनके नेतृत्व में बाजार पर ऐसा नियंत्रण रखा गया, जिसे कई लोग इंदिरा गांधी के "लाइसेंस राज" जैसा मान रहे हैं. उन्होंने SEBI अधिकारियों से ज्यादा मेहनत कराने के लिए सख्त और नरम नीति (गाजर और छड़ी वाली नीति) अपनाई, लेकिन उनकी कोशिशें संतुलन बनाने में नाकाम रहीं.

उन्होंने शेयर बाजार में कीमतों को जरूरत से ज्यादा बढ़ा हुआ माना और इसे सुधारने की कोशिश की. 2024 के आम चुनाव से कुछ दिन पहले उन्होंने सार्वजनिक रूप से यह बात भी कही थी. लेकिन उनके कार्यकाल में SEBI के कड़े नियमों की वजह से शेयर बाजार में ट्रेडिंग का स्तर पिछले साल की तुलना में 40% तक गिर गया. खासकर, छोटे और मझोले निवेशकों को भारी नुकसान हुआ, और सरकार को भी टैक्स के रूप में बड़ा घाटा होने वाला है. भारत में पैसा लगाने के लिए काफी फंड उपलब्ध हैं, लेकिन फिर भी अगर विदेशी और घरेलू निवेशकों का भरोसा कमजोर पड़ा है, तो इसका मुख्य कारण SEBI के सख्त नियम हैं. अब भारत का शेयर बाजार दुनिया के कई देशों की तुलना में सस्ता हो गया है (अगर हम Price To Earnings अनुपात देखें).

आपका काम साफ है: बाजार को खुद से संभलने का मौका दें, जिन कड़े नियमों की वजह से बाजार में यह हालत बनी है, उन्हें थोड़ा आसान बनाएं और फिलहाल नए सख्त नियमों को लागू करने से बचें. बीते कुछ महीनों में बहुत सारे बड़े बदलाव किए गए हैं, इसलिए बाजार को इन्हें अपनाने के लिए थोड़ा समय देने की जरूरत है.

बाजार में गिरावट: SEBI की बड़ी भूमिका  

माधबी पुरी बुच ने कुछ शब्दों का इस्तेमाल किया, जैसे - छोटे और मझोले शेयरों में "फ्रॉथ" (बढ़ी हुई कीमतें), "बेवजह जोश," और "बुनियादी कारणों से ज्यादा मूल्यांकन". इन बयानों ने 2024 के पहले छह महीनों में, जब चुनाव नजदीक थे, निवेशकों के बीच डर फैला दिया. शेयर बाजार किसी भी देश की अर्थव्यवस्था के मूड को दिखाता है. जब SEBI जैसी बड़ी नियामक संस्था (Regulator) का प्रमुख चुनाव से ठीक पहले बाजार के बारे में नकारात्मक टिप्पणी करता है, तो इसके कई संकेत होते हैं. खासकर जब SEBI ने चुनाव नतीजों के दिन, जब ऐसा लग रहा था कि प्रधानमंत्री मोदी को बहुमत नहीं मिलेगा, सोनिया गांधी परिवार की करीबी उषा थोराट को एक एक्सचेंज कमेटी में जल्दबाजी में नियुक्त कर दिया.  

हालांकि, असली गिरावट सितंबर 2024 से शुरू हुई, जब SEBI ने अपने कड़े नियमों को आखिरी समय तक लागू करना जारी रखा. इसका नतीजा यह हुआ कि निफ्टी सूचकांक अपने ऊपरी स्तर से 4,000 अंक गिर चुका है.

निशाने पर म्यूचुअल फंड: SEBI का सख्त रुख  

अगस्त 2024 में SEBI के कड़े नियम पूरी तरह सामने आ गए, जब उसने म्यूचुअल फंड (MFs) को आक्रामक ट्रेडिंग करने से रोक दिया. SEBI ने एसेट मैनेजमेंट कंपनियों (AMCs) को नए और जटिल नियम लागू करने के लिए मजबूर किया. 

2 नवंबर 2024 से लागू हुए नए नियम, जिनका नाम *मार्केट में गड़बड़ी रोकने के लिए संस्थागत व्यवस्था" रखा गया, ने म्यूचुअल फंड्स पर भारी दबाव बना दिया. अब उन्हें हर हफ्ते तीन स्तरों की जांच करनी थी, जिसमें ट्रेडिंग वॉल्यूम, कीमतों में उतार-चढ़ाव और सौदों की जानकारी देखनी पड़ती. अगर कोई संदिग्ध गतिविधि नजर आती, तो जांच शुरू हो जाती और फंड मैनेजर या डीलर को जांच पूरी होने तक छुट्टी पर भेज दिया जाता.

हकीकत में, किसी भी घरेलू AMC में एक ट्रेडर रोज़ाना 30 से 100 सौदे करता है. शेयर बाजार में खासकर तेज उतार-चढ़ाव के समय, जब विदेशी निवेशक (FPIs) भारी बिकवाली कर रहे होते हैं, तो छोटे निवेशकों के सौदों में कुछ अस्थायी अंतर आ सकते हैं. ऐसे में, कौन जोखिम उठाकर गिरते बाजार में खरीदारी करेगा जब उसे जांच का डर हो? SEBI के नियमों ने बाजार में अनिश्चितता और घबराहट बढ़ा दी, जिससे बाजार की स्थिरता पर असर पड़ा.

इस तरह की सख्ती से शेयरों के सही मूल्य तय करने की प्रक्रिया भी प्रभावित हो सकती है. म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री के लोग निजी तौर पर मानते हैं कि वे इस स्थिति में बेबस हैं. हर महीने 25,000 करोड़ रुपये से ज्यादा की SIP निवेश में आ रही है, लेकिन अगर निवेशकों को अच्छा रिटर्न नहीं मिला, तो वे म्यूचुअल फंड से पैसा निकालकर दूसरी जगह निवेश करने लगेंगे.

विदेशी निवेशकों पर सख्ती  

17 दिसंबर को SEBI ने एक नया नियम लागू किया – "कुछ खास ODI निवेशकों से अतिरिक्त विस्तृत जानकारी का खुलासा". इस नियम के तहत, Offshore Derivative Instruments (ODIs) या Participatory Notes (P-Notes) पर दोबारा सख्त जांच का खतरा बढ़ गया, जिससे बाजार में डर फैल गया. SEBI ने यह अनिवार्य किया कि ODI रखने वाली सभी कंपनियों की पूरी जानकारी दी जाए—कौन उसका मालिक है, कौन उसे नियंत्रित कर रहा है, और किसका उसमें आर्थिक हित है. यह जानकारी आखिर तक यानी व्यक्तिगत स्तर (प्राकृतिक व्यक्ति) तक मांगी गई. 

इतनी कड़ी शर्तों से विदेशी निवेशकों (FPIs) में घबराहट बढ़ गई, जिससे बाजार में लगातार बिकवाली का दबाव बना। जब यह सर्कुलर जारी हुआ, तब बाजार में लगभग 20 अरब डॉलर के ODI निवेश सक्रिय थे, जिससे स्थिति और खराब हो गई.

स्टॉक ब्रोकर्स पर सख्ती  

भारतीय स्टॉक ब्रोकर्स, खासकर डिस्काउंट ब्रोकर्स, कम लागत में ट्रेडिंग की सुविधा देकर छोटे निवेशकों को फायदा पहुंचा रहे थे. लेकिन SEBI ने एक्सचेंजों को निर्देश दिया कि वे ब्रोकर्स को मिलने वाली डिस्काउंट स्कीम्स खत्म करें और निश्चित शुल्क प्रणाली लागू करें. इस फैसले से यह बिजनेस मॉडल बुरी तरह प्रभावित हुआ है. कई ब्रोकर्स साधारण ट्रेड्स पर ज़ीरो ब्रोकरेज दे रहे थे, लेकिन अब SEBI के दबाव के कारण उन्हें फिर से फीस लगानी पड़ेगी. दुनिया भर में बड़े सौदों पर छूट देना एक आम और कानूनी प्रक्रिया है, तो फिर भारत में इसे रोकना कितना उचित है?  

ज़ेरोधा के नितिन कामथ ने हाल ही में ट्वीट किया— "सभी ब्रोकर्स में ट्रेडिंग एक्टिविटी 30% से ज्यादा गिर गई है. SEBI के नए नियमों के कारण, 15 साल में पहली बार हमारे बिजनेस में गिरावट हो रही है."

डेरिवेटिव्स: दोहरी मार  

अक्टूबर 2024 में SEBI ने डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स (Derivative Contracts) का लॉट साइज बढ़ा दिया, जिससे ट्रेडिंग के लिए आवश्यक पूंजी लगभग दोगुनी हो गई. इसके बाद, कई ट्रेडर्स और सटोरियों (Speculators) ने कमोडिटी मार्केट का रुख कर लिया, जहां कुछ कॉन्ट्रैक्ट्स का मूल्य सिर्फ 1 लाख रुपये तक है. इसके अलावा, SEBI ने यह भी नियम बना दिया कि हर हफ्ते एक से ज्यादा इंडेक्स एक्सपायरी नहीं हो सकती. हालांकि छोटे निवेशकों को बचाने की मंशा समझ में आती है, लेकिन जब बाजार में पहले से ही भारी उतार-चढ़ाव हो, तब इस तरह की सख्त पाबंदियां लगाने से निवेशकों को संभलने का मौका नहीं मिलता.  

सवाल यह भी है कि जो अन्य एक्सचेंज अब साप्ताहिक इंडेक्स लॉन्च करने की तैयारी कर रहे हैं, क्या वे बाजार में और ज्यादा सट्टेबाजी (Speculation) नहीं बढ़ाएंगे? अगर ऐसा होता है, तो क्या SEBI का असली उद्देश्य ही बेकार नहीं हो जाएगा?  अगर SEBI का मकसद ज्यादा सट्टेबाजी को रोकना था, तो फिर कमोडिटी एक्सचेंजों को छोटे मूल्य वाले कॉन्ट्रैक्ट्स ट्रेड करने की छूट क्यों दी गई? यह खुदरा निवेशकों को वहां खींचने जैसा नहीं है? कमोडिटी मार्केट का असली मकसद तो हेजिंग (जोखिम कम करना) होता है, क्योंकि कच्चे तेल (Crude Oil) और सोने-चांदी (Bullion Metals) की असली कीमत भारत में तय नहीं होती.  

SEBI के अंतर्गत पहले इक्विटी और कमोडिटी मार्केट के लिए समान नियम बनाए गए थे, लेकिन माधबी पुरी बुच के कार्यकाल में SEBI ने एक्सचेंज प्रमुखों की दोबारा नियुक्ति के नियम बदल दिए. पहले, SEBI को 2 या 3 नाम भेजे जाते थे, लेकिन नए नियम के अनुसार अब सिर्फ 1 नाम ही भेजा जाएगा. क्यों? क्या इसका मतलब यह है कि उनके कार्यकाल में नियुक्त किए गए एक्सचेंज प्रमुखों को बिना ज्यादा विकल्प दिए दोबारा चुना जा सके?

लिवरेज पर अचानक प्रहार  

अक्टूबर 2024 में SEBI ने मार्जिन की शर्तें सख्त कर दीं और गिरवी रखे जा सकने वाले शेयरों की सूची को काफी हद तक कम कर दिया. इस नए नियम के कारण ब्रोकरों, बैंकों और NBFCs (गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों) को अपने ग्राहकों को मिलने वाली लिवरेज (ऋण पर ट्रेडिंग) घटानी पड़ी, जिससे छोटे और मझोले शेयरों (Small & Mid-Cap Stocks) में तेज गिरावट आई.

जब यह सर्कुलर जारी हुआ, तब स्टॉक ब्रोकर्स की मार्जिन ट्रेडिंग फैसिलिटी (MTF) बुक करीब ₹73,500 करोड़ की थी, और इसमें से ज्यादातर शेयर उन्हीं श्रेणियों में आते थे, जिन पर नए नियम लागू हुए. नतीजा यह हुआ कि निवेशकों के पास अतिरिक्त मार्जिन जमा करने का विकल्प नहीं बचा, जिससे उन्हें अपने शेयर बेचने पड़े, और बाजार में गिरावट और तेज हो गई.

T+0 सेटलमेंट: एक तुगलकी फरमान  

T+0 सेटलमेंट का लागू होना भी एक अव्यवहारिक फैसला साबित हुआ. बाजार में भारी विरोध और कम ट्रेडिंग वॉल्यूम के बावजूद, इसे जबरदस्ती लागू कर दिया गया. खासतौर पर विदेशी निवेशकों, जो अलग-अलग टाइम ज़ोन में काम करते हैं, के लिए यह तकरीबन असंभव हो गया है. उनके लिए इस सिस्टम को अपनाना व्यवहारिक रूप से एक बड़ी परेशानी बन गया है.

केतन पारेख आदेश का समय: सही या गलत?  

3 जनवरी 2025 को SEBI ने कुख्यात बाजार ऑपरेटर केतन पारेख के खिलाफ आदेश जारी किया, जिससे बाजार की हालत और बिगड़ गई. पहले से ही कमजोर बाजार के बीच इस आदेश का जारी होना कई सवाल खड़े करता है. अगर SEBI ने जून 2023 में छापेमारी कर ली थी, तो फिर 18 महीनों तक इस फैसले में देरी क्यों की गई? जब बाजार पहले से ही भारी दबाव में था, तब यह आदेश जारी करने से अमीर निवेशकों (High Networth Players) में घबराहट बढ़ गई, और वे तेजी से बाजार से बाहर निकलने लगे. इससे बाजार में और ज्यादा गिरावट आ गई.

निष्कर्ष: अस्थिरता पैदा करने की रणनीति?

पिछले 6 से 8 महीनों में SEBI ने जो कड़े नियम लागू किए—चाहे वह म्यूचुअल फंड्स, विदेशी निवेशकों (FPIs), स्टॉक ब्रोकर्स पर पाबंदियां हों या मार्जिन और डेरिवेटिव्स के नियमों में अचानक बदलाव, इससे बाजार में मंदी के पक्षधर (Bear Lobby) को शॉर्ट सेलिंग का सीधा संकेत मिल गया.  

क्या SEBI ने जानबूझकर बाजार गिराने की कोशिश की? 

इन फैसलों की लंबी सूची देखकर ऐसा लगता है कि लगातार बदलते नियमों ने निवेशकों में असमंजस और डर पैदा कर दिया, जिससे बाजार में गिरावट और गहरा गई. अब जरूरत है कि निवेशकों का भरोसा दोबारा बहाल किया जाए—चाहे वे म्यूचुअल फंड निवेशक हों, विदेशी संस्थागत निवेशक (FPIs) हों या खुदरा निवेशक. SEBI को यह साबित करना होगा कि वह निष्पक्ष संस्था है, जिसका मकसद शॉर्ट टर्म एजेंडा पूरा करना नहीं, बल्कि बाजार की दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित करना है. आपके कार्यकाल के लिए शुभकामनाएं! उम्मीद है कि आप भारतीय स्टॉक बाजार को स्थिर और मजबूत बनाने के लिए जरूरी कदम उठाएंगे.
 


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