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कच्चे तेल की तकरार : पश्चिम एशिया संकट के बीच तेल की कीमतों की मार से जूझता भारत

पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनावों के कारण उत्पन्न तेल संकट भारत के लिए एक गंभीर, लेकिन नियंत्रित योग्य चुनौती है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

भारत एक संवेदनशील आर्थिक मोड़ पर खड़ा है क्योंकि पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक उथल-पुथल से एक बार फिर तेल मूल्य झटके की आशंका बढ़ गई है. रूस-यूक्रेन संघर्ष के बाद सबसे आक्रामक कदम के रूप में पिछले सप्ताह ईरान पर इजराइल के हमले के कारण ब्रेंट क्रूड की कीमत 75 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई. हालांकि बाजारों में घबराहट है, लेकिन तेल आपूर्ति की बुनियादी स्थितियाँ और भारत की व्यापक आर्थिक दृढ़ता यह दर्शाती हैं कि यह संकट, यद्यपि गंभीर है, पहले की तरह विघटनकारी सिद्ध नहीं हो सकता.

क्या तेल का झटका उतना गंभीर होगा जितना डर है?
क्रूड ऑयल के 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचने की आशंकाएँ सुर्खियों में हैं, लेकिन कई वैश्विक विश्लेषकों का तर्क है कि जब तक संघर्ष बड़े पैमाने पर नहीं फैलता, तब तक जोखिम मध्यम बना रहेगा. ईरान, रूस की तुलना में, अपेक्षाकृत कम तेल निर्यात करता है और इसका अधिकांश उत्पादन चीन को जमीनी मार्गों या फारस की खाड़ी के बाहर समुद्री मार्गों से जाता है. ओपेक, विशेष रूप से सऊदी अरब और इराक, और रूस के पास अभी भी अतिरिक्त उत्पादन क्षमता है. यह वैश्विक प्रणाली को ईरानी आपूर्ति बाधित होने की स्थिति में कुछ लचीलापन प्रदान करता है.

हालाँकि, सबसे महत्वपूर्ण चिंता है होरमुज की खाड़ी, यह संकीर्ण लेकिन महत्वपूर्ण जलमार्ग वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग पांचवां हिस्सा संभालता है. यदि यहाँ लंबे समय तक अवरोध या सैन्य नाकाबंदी होती है, तो यह गंभीर ऊर्जा संकट को जन्म दे सकती है. फिर भी, भू-राजनीतिक तर्क और इतिहास संकेत देते हैं कि इस क्षेत्र की सभी शक्तियाँ, जिनमें इजराइल और ईरान शामिल हैं, उस "रेड लाइन" से बचना चाहेंगी. दोनों पक्ष समझते हैं कि होरमुज को निशाना बनाना मामलों को अनियंत्रित स्तर तक बढ़ा देगा और अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप को आमंत्रित करेगा. इसलिए, जबकि अल्पकालिक अस्थिरता निश्चित है, पूर्ण आपूर्ति संकट की संभावना फिलहाल कम लगती है.

भारत के लिए क्या दांव पर लगा है?
भारत अपनी 80 प्रतिशत से अधिक तेल जरूरतें आयात करता है. वैश्विक तेल कीमतों में कोई भी वृद्धि सीधे खुदरा महंगाई को प्रभावित करती है, व्यापार घाटे को बढ़ाती है और रुपया कमजोर करती है, लेकिन इन परिचित जोखिमों से परे, असली खतरा द्वितीयक प्रभावों में छिपा है. इनमें ईंधन की ऊँची कीमतों के कारण घरेलू परिवारों की खर्च करने की क्षमता में कमी, उपभोग मांग में गिरावट और निर्माण व परिवहन क्षेत्रों पर असर शामिल है.

यदि ईरान समर्थित हूती विद्रोही लाल सागर या स्वेज नहर के पास जहाजों पर हमले तेज करते हैं, तो भारत का निर्यात प्रभावित हो सकता है. माल को केप ऑफ गुड होप के रास्ते भेजना पड़ सकता है, जिससे डिलीवरी में देर होगी और लागत बढ़ेगी. यह विशेष रूप से भारत के वस्त्र, रसायन और फार्मा निर्यात को नुकसान पहुंचा सकता है, जहाँ समयबद्धता और मूल्य प्रतिस्पर्धा अहम हैं.

फिर भी, इन जोखिमों के बावजूद, भारत लाचार नहीं है. वास्तव में, वह अब पहले की तुलना में बेहतर तैयार है.

2025 में भारत की रणनीतिक ताकतें
पहला, देश ने रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार बनाए हैं, जो 9 दिनों के तेल आयात के बराबर हैं और इस भंडार को और बढ़ाया जा रहा है. यह भले ही वैश्विक मानकों पर सीमित हो, लेकिन वैश्विक संकट के समय यह कुछ राहत प्रदान करता है.

दूसरा, भारत ने अपने तेल स्रोतों में विविधता लाई है, जबकि पश्चिम एशिया अब भी प्रमुख है, रूस, अमेरिका, ब्राजील और अफ्रीकी देशों से बढ़ते आयात संकट के समय लचीलापन प्रदान करते हैं.

तीसरा, भारत की राजकोषीय और मौद्रिक नीति ने अद्भुत दृढ़ता दिखाई है. 2008 या 2020 के विपरीत, महंगाई अपेक्षाकृत नियंत्रण में रही है और यदि जरूरत पड़ी तो भारतीय रिजर्व बैंक के पास हस्तक्षेप की गुंजाइश है. खाद्य और ईंधन को छोड़कर कोर मुद्रास्फीति स्थिर है. भारत की जीडीपी वृद्धि दर, भले ही थोड़ी धीमी हो रही हो, फिर भी वैश्विक स्तर पर शीर्ष पर बनी हुई है.

चौथा, कच्चे तेल की अस्थिरता के प्रति संवेदनशील होने के बावजूद भारतीय रुपया उच्च विदेशी मुद्रा भंडार और मजबूत पूंजी प्रवाह के कारण तुलनात्मक रूप से स्थिर है. निर्यातकों को कमजोर रुपये से लाभ मिलता है, जिससे कुछ हद तक आयात लागत में वृद्धि की भरपाई होती है.

नीतिनिर्माताओं और व्यवसायों को क्या करना चाहिए?
इस मजबूती के बावजूद, आत्मसंतोष एक गलती होगी. भारतीय नीति निर्माताओं को पहले से सक्रिय होकर कदम उठाने चाहिए.
1. ईंधन कर में लचीलापन: केंद्र और राज्य सरकारों दोनों को उपभोक्ताओं को ईंधन मूल्य वृद्धि से बचाने के लिए उत्पाद शुल्क और वैट को अस्थायी रूप से कम करने के लिए तैयार रहना चाहिए.
2. तेल हेजिंग को मजबूत करें: सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन कंपनियों को वैश्विक बाजारों में कच्चे तेल की खरीद के लिए सक्रिय रूप से हेजिंग करनी चाहिए ताकि कीमतें निश्चित की जा सकें.
3. रणनीतिक भंडार बढ़ाएं: सरकार को तेल भंडारण क्षमता को तेजी से बढ़ाने की योजना पर काम करना चाहिए ताकि कम से कम 30 दिनों के आयात को कवर किया जा सके.
4. नवीकरणीय ऊर्जा को तेजी से अपनाएं: दीर्घकालिक लक्ष्य जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता को कम करना है. यह संकट इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, सौर और पवन ऊर्जा तथा ऊर्जा दक्षता में निवेश तेज करने की याद दिलाता है.
5. निर्यात और लॉजिस्टिक्स की रक्षा करें: वाणिज्य मंत्रालय को प्रमुख शिपिंग लाइनों और बीमा कंपनियों के साथ संपर्क साधना चाहिए ताकि संघर्ष-प्रभावित क्षेत्रों के माध्यम से माल की आवाजाही सुनिश्चित हो सके. पूर्वी अफ्रीकी बंदरगाहों के साथ द्विपक्षीय व्यापार समझौते वैकल्पिक मार्ग बन सकते हैं.

कॉरपोरेट भारत को तैयार रहना होगा और अनुकूलन करना होगा
भारतीय उद्योग के लिए यह समय लागत संरचनाओं और दक्षता मॉडलों की फिर से समीक्षा करने का है. एयरलाइंस, लॉजिस्टिक्स, पेंट, टायर और सीमेंट जैसे क्षेत्र तेल मूल्य में उतार-चढ़ाव के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील हैं. रणनीतिक इन्वेंटरी प्रबंधन, स्मार्ट फ्यूल खरीद और कम तेल-निर्भर परिचालन की ओर बदलाव मार्जिन पर झटके को कम कर सकते हैं.
बड़े निर्यातकों को अपने योजना में मार्ग में रुकावट और लंबी शिपिंग अवधि को शामिल करना चाहिए. उद्योगों को आपूर्ति श्रृंखला को घरेलू या दक्षिण-पूर्व एशियाई स्रोतों की ओर स्थानांतरित करने पर भी विचार करना चाहिए ताकि पश्चिम एशिया के जोखिम को कम किया जा सके.

इस बीच, बैंकों को उन क्षेत्रों की निगरानी करनी चाहिए जो तेल झटकों के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील हैं. यदि उच्च कीमतें लंबे समय तक बनी रहती हैं और एसएमई की लाभप्रदता पर असर डालती हैं, तो विशेष रूप से परिवहन, निर्माण और छोटे विनिर्माण क्षेत्रों में खराब ऋण बढ़ सकते हैं.

निष्कर्ष: यह भी बीत जाएगा, लेकिन सबक बनाए रखने होंगे
हालांकि सुर्खियों में घबराहट है, लेकिन आधारभूत आंकड़े अधिक संतुलित तस्वीर दिखाते हैं. तेल आपूर्ति खतरे में होने के बावजूद उसके लिए कुछ बैकअप मौजूद हैं. वैश्विक अर्थव्यवस्था, जो पहले से धीमी हो रही है, अब पिछली दशकों की तरह पागलपन भरी गति से तेल की मांग नहीं कर रही है. ऊर्जा महंगाई एक जोखिम है, लेकिन अनिवार्यता नहीं.

भारत की अर्थव्यवस्था परिपक्व हो चुकी है. यह अब बेहतर तरीके से हेज की गई है, अधिक विविधीकृत है और अधिक फुर्तीली है. तात्कालिक संकट कष्टदायक हो सकता है, लेकिन सम्भवतः संभाला जा सकता है. हालांकि, सरकार और भारत के उद्योग जगत को इस अवसर को दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा के निर्माण के लिए गंवाना नहीं चाहिए.

यह केवल एक बार के तेल मूल्य उछाल को पार करने की बात नहीं है. यह उस भविष्य के प्रति लचीलापन विकसित करने की बात है जहाँ तेल हमेशा सुलभ, सस्ता या राजनीतिक रूप से तटस्थ नहीं रहेगा.

भारत को इसे एक अस्थायी खतरे की तरह नहीं, बल्कि एक चेतावनी की तरह लेना चाहिए.

(डिस्क्लेमर : इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के व्यक्तिगत हैं और आवश्यक नहीं कि ये प्रकाशन के विचारों को दर्शाते हों.)

विनोद के बंसल, गेस्ट लेखक

(विनोद के बंसल एक अनुभवी चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं, जिनके पास वित्तीय बाजारों में 35 वर्षों से अधिक का अनुभव है. दिल्ली स्थित बंसल वैश्विक वित्तीय प्रवृत्तियों और निवेश रणनीतियों की गहरी समझ रखते हैं, जिससे वह वित्तीय क्षेत्र में एक विश्वसनीय आवाज माने जाते हैं. उनसे संपर्क किया जा सकता है: vinodkbansal@gmail.com)


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