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एक स्वागत योग्य बुनियादी बदलाव का संकेत देता है बजट 2025

प्रबल बसु रॉय का मानना है कि केवल आर्थिक दृष्टिकोण पर निरंतरता और ध्यान केंद्रित करने से ही इस आम बजट 2025 की सफलता तय होगी,

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

जहां तक ​​सुधारों का सवाल है, वार्षिक बजट का महत्व धीरे-धीरे कम हो गया है, लेकिन वित्त और सरकार के इरादे के बयान के रूप में इसका अभी भी उत्सुकता से इंतजार किया जाता है. इस वर्ष का बजट खास था, क्योंकि आर्थिक स्थिति गंभीर थी और, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अब यह स्थिति जनता और सत्ता के गलियारों में पूरी तरह से समझ में आ गई है.

मीडिया और उसके विश्लेषकों द्वारा कोई भी कथन या उत्साहवर्धन आम आदमी के दर्द, भारत की कॉर्पोरेट क्षेत्र के वित्तीय परिणामों और एफआईआई (विदेशी संस्थागत निवेशकों) के भारत से भारी पलायन के खिलाफ नहीं जा सकता था. अब यह स्पष्ट है कि हम मंदी में हैं, हालांकि यह नवंबर 2023 से ही स्पष्ट था, जब मैंने सार्वजनिक मंच पर बीडब्ल्यू के एक इवेंट के दौरान कई खतरे के संकेतों की बात की थी. सवाल यह था कि क्या मंदी चक्रीय (cyclical) है या संरचनात्मक (structural) – यह एक महत्वपूर्ण सवाल था जो उचित प्रतिक्रिया निर्धारित करेगा. 

हालांकि सरकारी नौकरशाहों ने इसे चक्रीय (cyclical) मंदी के रूप में वर्गीकृत किया है, लेकिन बजट का सबसे संतोषजनक हिस्सा मेरे दृष्टिकोण से यह है कि इसकी प्रतिक्रिया न केवल चक्रीय संकट को, बल्कि संरचनात्मक मुद्दों को भी संबोधित करती है, और यह अपने उद्देश्य और दिशा में सही है.

चक्रीय मोर्चे पर सभी सही कदम उठाए गए हैं – 1.5 लाख करोड़ रुपये के राजकोषीय संकुचन को 4.4 प्रतिशत के राजकोषीय लक्ष्य पथ पर बनाए रखते हुए, उदार कर कटौतियों के माध्यम से खपत को बढ़ाना, जबकि एक टिकाऊ पूंजीगत व्यय (capex) की योजना बनाना, श्रम-गहन क्षेत्रों जैसे फुटवियर, खाद्य प्रसंस्करण आदि में रोजगार सृजन के अवसर और क्लीन टेक तथा कृषि के लिए वित्त पोषण सभी सही दिशा में उठाए गए कदम हैं.

हालांकि, यह याद रखना जरूरी है कि 4 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था में 1 लाख करोड़ रुपये की टैक्स कटौती ज्यादा प्रभावी नहीं होगी, विशेष रूप से क्योंकि 12 लाख रुपये का वार्षिक आय, प्रति व्यक्ति आय से 6 गुना अधिक है, और इसलिए यह केवल एक छोटे से हिस्से (करीब पांच करोड़ करदाता) को प्रभावित करेगा, जबकि हमारी कुल जनसंख्या 140 करोड़ है. आम लोग अभी भी बहुत उच्च जीएसटी (GST) बोझ के तहत जूझते रहेंगे और इस प्रकार उनके पास खर्च करने योग्य आय सीमित रहेगी. हालांकि, दिशा के दृष्टिकोण से यह कदम सही है.

हमारी अर्थव्यवस्था की मुख्य समस्या कम रोजगार सृजन, निजी पूंजीगत व्यय की कमी और कम घरेलू मांग का दुष्चक्र रही है. हालाँकि, मेक इन इंडिया फॉर द वर्ल्ड के साथ पर्याप्त वैश्विक मांग है, भले ही व्यापारिक निर्यात में हमारी हिस्सेदारी वैश्विक व्यापार का केवल 2 प्रतिशत है, इसलिए 2019 की भारी कर कटौती, बैंकिंग प्रणाली की सफाई, पीएलआई, बड़े सार्वजनिक पूंजीगत व्यय आदि जैसे प्रोत्साहनों के बावजूद पिछले नौ वर्षों में कम निजी पूंजीगत व्यय के लिए मांग कोई मुद्दा नहीं रही है. उद्योगपतियों को प्रोत्साहन, मजबूत मांग दृष्टिकोण की आवश्यकता है - लेकिन गंभीर रूप से पूंजीगत व्यय में दीर्घकालिक निवेश करने के लिए किसी विशेष भूगोल की जोखिम धारणा को प्रबंधित करने के लिए पर्यावरण में विश्वास की भी आवश्यकता है.

यह आखिरी तत्व ही समस्या का कारण रहा है, जिसे केवल निजी बातचीत में ही चर्चा की जाती रही है. इसका मुख्य कारण यह है कि, राष्ट्रीय चैंपियन बनाने की हमारी कोशिश में, हमने निवेशकों के दिमाग में मनमाने नियामक बदलावों का डर बैठा दिया है. इसके अलावा, प्रवर्तन एजेंसियों का एक निश्चित डर और बढ़ते अनुपालन बोझ ने भी हालात को बिगाड़ दिया है. तीसरी बात, 2018 से, हम अपनी आर्थिक नीतियों में अधिक संरक्षणवादी हो गए हैं, जिसमें विभिन्न गैर-टैरिफ उपायों सहित "गुणवत्ता नियंत्रण आदेश" शामिल हैं, जिनका अर्थ उस लाइसेंस-कोटा राज जैसा है जिसे हमने 1991 में पीछे छोड़ दिया था. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि नीतियों की निरंतरता आर्थिक व्यवहार में सबसे महत्वपूर्ण तत्व है, जो निवेशों के लिए आवश्यक विश्वास निर्माण करता है. 

ये संरचनात्मक कारण हैं जो वर्तमान में हम जो आर्थिक मंदी का सामना कर रहे हैं, उसे जन्म देते हैं, और जिन्हें अर्थशास्त्रियों ने उल्लेख किया है, और मुझे संदेह है कि यही बड़े एफआईआई (विदेशी संस्थागत निवेशक) के बहिर्वाह का कारण बन रहे हैं. विश्लेषक और मीडिया एंकर, जिन्होंने बार-बार यह बयान दिया था कि एफआईआई अब अप्रासंगिक हो गए हैं, क्योंकि हमने अपने घरेलू, आकांक्षी निवेशकों के माध्यम से आत्मनिर्भरता हासिल कर ली है, अब चुप हैं! एफआईआई ने उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं के विभिन्न चक्रों को देखा है और वे पहले ही चेतावनी के संकेत मिलने पर आर्थिक नीति की दिशा के पतन पर भारत से बाहर निकल जाएंगे.

यह स्थिति आरबीआई की लगभग ढाई साल पहले की आत्मघाती नीति की वजह से और बढ़ गई थी, जिसमें उन्होंने उच्च मुद्रास्फीति के बावजूद रुपये को बचाने के लिए कठोर कदम उठाए थे. इससे हमें 220 अरब डॉलर के विदेशी मुद्रा भंडार का नुकसान हुआ है, जो अब घटकर लगभग 630 अरब डॉलर पर आ गया है, साथ ही निर्यात को प्रतिस्पर्धी बनाने में मुश्किल हुई है. अब, आरबीआई इस नीति को पलटने जा रहा है, जिससे मुद्रा कमजोर बनी रहेगी और निर्यात को प्रतिस्पर्धी बनाया जाएगा.

इसलिए, मैं बजट में किए गए ऐलानों से आशान्वित हूं, जो संरचनात्मक आधार पर इस सोच को पलटने का संकेत देते हैं. वित्त मंत्री का यह स्पष्ट आश्वासन कि नियामक ढांचा 'लाइट टच' और विश्वास आधारित होगा, आने वाला नया प्रत्यक्ष कर कोड और लाइसेंस और अनुपालनों को कम करने के लिए समिति का गठन सभी का गर्मजोशी से स्वागत किया जाना चाहिए. यदि इस व्यावहारिक दृष्टिकोण को लागू किया गया – और आरबीआई द्वारा मौद्रिक और विदेशी मुद्रा पक्ष पर समर्थन प्राप्त हुआ – तो यह विश्वास को फिर से बनाने में एक लंबा रास्ता तय करेगा। बेशक, समय, ध्यान और इस नीति दिशा की निरंतरता महत्वपूर्ण होगी. जब यह साबित होगा, तो खोखली चर्चा के बजाय, मुझे पूरा यकीन है कि निजी पूंजी निवेश का चक्र आखिरकार शुरू होगा और यह विकास और रोजगार सृजन को बढ़ावा देने में मदद करेगा, जो हमें एक विकसित भारत (Viksit Bharat) बनाने के लिए लड़ने का एक मौका देगा.

(डिस्क्लेमर : इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के अपने खुद के विचार हैं और यह जरूरी नहीं कि ये BW हिन्दी के विचारों को भी दर्शाते हैं.)

अतिथि लेखक -प्रबल बसु रॉय लंदन बिजनेस स्कूल के स्लोन फैलो, विभिन्न कंपनियों के बोर्ड चेयरमैन के निदेशक और सलाहकार, लेखक पूर्व में विभिन्न कंपनियों के समूह सीएफओ (CFO) रहे हैं.


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