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बिहार का फैसला: मतदाताओं ने अमूर्त प्रगति के बजाय राजनीतिक गणित को क्यों चुना?

बिहार के मतदाताओं ने ठोस विकास या अमूर्त प्रगति की बजाय राजनीतिक गणित और रणनीति को प्राथमिकता दी.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 6 months ago

हाल ही में संपन्न हुए बिहार विधानसभा चुनाव ने एक ऐसा संदेश दिया, जिसे कई विश्लेषक समझ नहीं पाए. भारत के सबसे कम विकसित राज्यों में से एक बिहार आधुनिकता को अस्वीकार नहीं कर रहा है, हर कोई बस इसे अपनी गति से अपनाना चाहता है. यह जनादेश पुराने ढांचे के खिलाफ विद्रोह नहीं था, बल्कि उसके साथ एक सावधानीपूर्ण समझौता था. जो दिखाई दिया, वह वैचारिक महत्वाकांक्षा का उभार नहीं, बल्कि राजनीतिक सतर्कता का एक नायाब उदाहरण था.

राज्य ने अपने इतिहास का सबसे अधिक वोटिंग प्रतिशत दर्ज किया. महिलाओं ने असाधारण संख्या में मतदान किया: 71.6% मतदान, जबकि पुरुषों का प्रतिशत 62.8% था. 130 निर्वाचन क्षेत्रों में महिलाओं ने पुरुष मतदाताओं को पीछे छोड़ा; इनमें से 88% सीटें सत्तारूढ़ एनडीए गठबंधन ने जीतीं. प्रभावी रूप से महिलाओं ने ही सरकार की दिशा तय की.

ये आँकड़े उस बात की पुष्टि करते हैं जो सामाजिक वैज्ञानिक लंबे समय से कहते आए हैं: महिलाएँ अब भारत के लोकतंत्र में निष्क्रिय प्रतिभागी नहीं रहीं. हालांकि, यह भागीदारी किसी आधुनिक नागरिकता की अमूर्त अवधारणाओं की ओर छलांग नहीं थी. इसके बजाय, यह राजनीतिक गणित की गहरी समझ में निहित थी, मापने योग्य, तात्कालिक, और ठोस परिणामों पर आधारित, बिहार के मतदाताओं ने सहज रूप से विलियम पेटी की पुरानी कही बात दोहरा दी: राजनीति ऊँचे दावों से नहीं, बल्कि “संख्या, वजन और माप” से तय होती है.

महिलाओं का उदय, परिचित तर्क

बिहार की राजनीति में महिलाओं का उभरना संयोग नहीं है. पुरुषों के बड़े पैमाने पर बाहर काम करने जाने (माइग्रेशन) ने महिलाओं को परिवार, वित्त और सामुदायिक नेटवर्क संभालने के लिए मजबूर किया है. इससे उनकी घरेलू और सामाजिक ताकत बढ़ी है और उनकी राजनीतिक समझ भी तेज हुई है.

राजनीतिक दलों ने इसे तुरंत भाँप लिया. लगभग 75 लाख महिलाओं को सीधे बैंक हस्तांतरण के माध्यम से मिलने वाली एनडीए की ₹10,000 नकद सहायता योजना ने इस नई वास्तविकता को समझा. इसने महिलाओं को केवल लाभार्थी के रूप में नहीं, बल्कि निर्णायक राजनीतिक वर्ग के रूप में माना.

संस्थागत कारकों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. चुनाव आयोग ने मतदान प्रक्रियाओं को सरल बनाया, लैंगिक आधार पर मतदान आँकड़ों को पारदर्शी किया और दोबारा मतदान की संभावना लगभग समाप्त कर दी. इन सुधारों ने प्रणाली पर विश्वास को बढ़ाया और सहभागिता को आसान बनाया.

फिर भी परिणाम कोई उथल-पुथल नहीं था; यह निरंतरता था. मतदाताओं ने महत्वाकांक्षी वादों की तुलना में भरोसेमंद राजनीतिक तंत्र को प्राथमिकता दी. राष्ट्रीय जनता दल का “हर परिवार को सरकारी नौकरी” वाला वादा हाथ में मिलने वाले तात्कालिक नकद के आकर्षण का मुकाबला नहीं कर सका. मतदाताओं का धीमा लेकिन स्पष्ट संदेश यही था: जाति तेजस्वी के साथ, काम नीतीश के साथ.

परंपरा में लिपटी आधुनिकता

गहरे स्तर पर पैटर्न साफ है. बिहार के मतदाताओं ने परंपरा में निहित आधुनिकता को पूरी तरह रूपांतरकारी बदलाव की तुलना में अधिक पसंद किया. महिलाओं की एजेंसी, नकद सहायता, और प्रशासनिक दक्षता को स्वीकार किया गया लेकिन जाति, रिश्तेदारी, संरक्षण तंत्र और भरोसेमंद नेतृत्व जैसी स्थापित सामाजिक संरचनाओं के भीतर.

समाजशास्त्रीय रूप से, बिहार एक संकर क्षेत्र में बैठता है. आधुनिकता के संकेत महिलाओं की दृश्यता, स्वतंत्र मतदान, और डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर, अब पारंपरिक संरचनाओं के साथ-साथ मौजूद हैं. यहां तक कि जब धन सीधे महिलाओं के खातों में आता है, तब भी उसके उपयोग को परिवार और समुदाय के मानदंड प्रभावित करते हैं. बिहार में सुधार क्रांति के माध्यम से नहीं, बल्कि बातचीत से होकर गुजरता है.

ऑक्टावियो पाज ने इस तनाव को सबसे अच्छे शब्दों में व्यक्त किया: “बीते कल की आधुनिकता आज की परंपरा है, और आज की आधुनिकता कल की परंपरा बन जाएगी.” बिहार में, ‘नया’ जल्दी ही आत्मसात होकर परंपरागत हो जाता है.

भागीदारी, पर शक्ति नहीं?

उच्च मतदान हमेशा समान स्तर की स्वायत्तता का संकेत नहीं होता. कई महिलाएँ अब भी परिवार या समुदाय के संकेतों के आधार पर मतदान करती हैं. जैसा कि एक पर्यवेक्षक ने चेतावनी दी, “उपस्थित होना कहानी का सिर्फ आधा हिस्सा है.”

₹10,000 का हस्तांतरण, भले ही सशक्तिकारी हो, फिर भी कल्याण आधारित संरक्षण-तंत्र को मजबूत करने का जोखिम रखता है: महिला एक ‘प्राप्तकर्ता’ बनी रहती है, निर्णयकर्ता नहीं. सहभागिता को शक्ति में बदलने के लिए संरचनात्मक बदलाव जरूरी हैं शिक्षा, सतत आर्थिक स्वतंत्रता, और राजनीतिक नेतृत्व में अधिक महिला प्रतिनिधित्व. चुनौती सिर्फ यह नहीं है कि कौन वोट देता है, बल्कि यह भी है कि वे कैसे और क्यों वोट देते हैं.

बिहार से मिलने वाले सबक

बिहार का फैसला राष्ट्रीय राजनीति के लिए महत्वपूर्ण संदेश देता है. राजनीतिक दल अब महिलाओं को निर्णायक वोटिंग ब्लॉक के रूप में देखते हैं. वे उनसे उनके सामाजिक भूमिकाओं के आधार पर संवाद करते हैं परिवार प्रबंधन, सामुदायिक संबंधों को संभालने और सामाजिक स्थिरता की संरक्षक के रूप में. कल्याण प्लस पहचान, न कि विघटन, यही विजयी फार्मूला बना हुआ है.

भारतीय चुनावों का गणित भारतीय राजनीति के व्याकरण से तेजी से बदल रहा है. बिहार एक मोड़ भी है और एक याद दिलाने वाला संकेत भी है, महिलाएँ चुनाव परिणामों को बदल सकती हैं और बदलती हैं भी हैं, लेकिन राजनीतिक संरचनाएँ धीरे-धीरे परिवर्तित होती हैं.

बिहार के मतदाताओं ने जन सुराज द्वारा प्रचारित आकांक्षी प्रगति को नहीं चुना. उन्होंने प्रमाण चुना. दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में आधुनिकता तक पहुँचने का रास्ता अब भी राजनीतिक गणित की जटिल तर्क प्रणाली से होकर ही गुजरता है.

(डिस्क्लेमर : इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं और आवश्यक नहीं कि यह प्रकाशन के विचारों को दर्शाते हों.)

अतिथि लेखक- सुभाष मिश्रा, सामाजिक संरक्षण सलाहकार और पूर्व संयुक्त राष्ट्र नीति प्रमुख


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