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भारत के लिए 25वें SCO शिखर सम्मेलन के लाभ: वैश्विक तनावों के बीच रणनीतिक संतुलन और साझेदारी

25वें एससीओ शिखर सम्मेलन में भारत ने वैश्विक मंच पर अपनी रणनीतिक स्वायत्तता, संतुलित कूटनीति और बहु-संरेखण नीति को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 8 months ago

चीन के तियानजिन में 1 सितंबर, 2025 को आयोजित 25वें शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन में भारत की भागीदारी एक महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक मोड़ पर हुई. वैश्विक शक्तियों के बीच बढ़ते तनाव के बीच भारत की उपस्थिति रणनीतिक और आत्मविश्वासी रही. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सदस्य तथा पर्यवेक्षक देशों के नेताओं की उपस्थिति में आयोजित इस शिखर सम्मेलन में आतंकवाद, एकतरफा व्यापार प्रतिबंध, ऊर्जा सुरक्षा और क्षेत्रीय सहयोग जैसे प्रमुख मुद्दों पर चर्चा हुई. भारत के लिए यह शिखर सम्मेलन केवल एक प्रतीकात्मक उपस्थिति नहीं थी, बल्कि यह वैश्विक मुद्दों पर अपनी स्थिति को मजबूत करने, पुराने गठबंधनों को सुदृढ़ करने और नए संबंधों का विस्तार करने का एक मंच था.

एकतरफा प्रतिबंधों की निंदा

शिखर सम्मेलन की प्रमुख उपलब्धियों में से एक “एकतरफा जबरदस्ती उपायों”, विशेषकर आर्थिक प्रकृति के, के विरोध में एससीओ सदस्यों की संयुक्त घोषणा रही. इन उपायों, जो संयुक्त राष्ट्र चार्टर और विश्व व्यापार संगठन के सिद्धांतों का उल्लंघन करते हैं, की अंतरराष्ट्रीय कानून को कमजोर करने और वैश्विक सहयोग में बाधा डालने के लिए आलोचना की गई. इसका स्पष्ट संकेत अमेरिका के टैरिफ्स की ओर था, विशेष रूप से ट्रंप प्रशासन द्वारा कई देशों पर लगाए गए 50% शुल्क, जिनमें रूसी तेल खरीदने पर लगाए गए दंडात्मक शुल्क भी शामिल हैं.

भारत के लिए यह घोषणा अन्य आर्थिक शक्तियों, विशेषकर चीन और रूस, के साथ मेलजोल स्थापित करने और वैश्विक व्यापार की धारणाओं में पश्चिमी प्रभुत्व का विरोध करने का एक महत्वपूर्ण मंच बनी. भारत, जो विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और रूसी तेल का प्रमुख खरीदार भी है, इस संयुक्त रुख के माध्यम से यह संकेत देता है कि नई दिल्ली ऊर्जा नीति और व्यापार निर्णयों पर कोई बाहरी दबाव स्वीकार नहीं करेगी.

आतंकवाद पर सशक्त वक्तव्य

जहाँ व्यापार पर सहमति मजबूत रही, वहीं आतंकवाद पर रुख मिश्रित लेकिन उल्लेखनीय रहा. भारत, जो पाकिस्तान से उत्पन्न होने वाले सीमापार आतंकवाद को लेकर लंबे समय से मुखर रहा है, ने इस शिखर सम्मेलन का उपयोग हाल की आतंकी घटनाओं को उजागर करने के लिए किया. संयुक्त घोषणा में विशेष रूप से 22 अप्रैल को पहलगाम में हुए आतंकी हमले और 11 मार्च को जाफ़र एक्सप्रेस बम विस्फोट का उल्लेख किया गया, जिनका आरोप भारत ने पाकिस्तान-आधारित समूहों पर लगाया.

यद्यपि प्रयुक्त भाषा उतनी कठोर नहीं थी जितनी भारत चाहता था, जो कि पाकिस्तान की उपस्थिति के चलते अपेक्षित था, फिर भी इन घटनाओं का बहुपक्षीय मंच पर उल्लेख होना एक छोटा लेकिन महत्वपूर्ण कूटनीतिक लाभ है. सदस्य देशों ने संवेदना व्यक्त की और यह ज़ोर दिया कि ऐसे हमलों के अपराधियों और प्रायोजकों को न्याय के कटघरे में लाया जाना चाहिए. इससे भारत को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर नैतिक और राजनीतिक बढ़त मिलती है.

रूस और चीन के साथ रणनीतिक संबंधों का सुदृढ़ीकरण

घोषणाओं से परे, शिखर सम्मेलन ने भारत को रणनीतिक द्विपक्षीय बातचीत को आगे बढ़ाने का अवसर भी दिया. सबसे महत्वपूर्ण परिणाम रूस और चीन के साथ हुई बातचीत से सामने आए. मोदी की राष्ट्रपति पुतिन से मुलाक़ात गर्मजोशी और रणनीतिक सहयोग से भरी रही, जिससे दोनों देशों के बीच "विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त साझेदारी" की पुन: पुष्टि हुई. पश्चिमी देशों के इस आरोप के परिप्रेक्ष्य में कि भारत यूक्रेन संघर्ष में रूस का मौन समर्थन कर रहा है, पुतिन के साथ मोदी की घनिष्ठता ने एक सशक्त संकेत दिया कि भारत अपनी स्वतंत्र विदेश नीति पर कायम है.

इसके अतिरिक्त, मोदी ने “सभ्यतागत संवाद मंच” (Civilizational Dialogue Forum) का प्रस्ताव रखा, जो भारत की सांस्कृतिक बहुलता और क्षेत्रीय सहयोग की भावना में निहित है. इसका उद्देश्य जनता से जनता के संपर्क को बढ़ाना और यूरेशियन देशों के बीच एक सॉफ्ट-पावर सेतु बनाना है. इसे विशेष रूप से रूस से सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली और यह मंच सांस्कृतिक कूटनीति के एक आवर्ती माध्यम के रूप में विकसित होने की संभावना रखता है.

भारत का वाशिंगटन को संदेश

चीन और रूस के साथ सक्रिय रूप से जुड़कर और आर्थिक दबाव के प्रति अपने प्रतिरोध को उजागर करते हुए, भारत ने वैश्विक कूटनीति में अपनी भूमिका को लेकर अमेरिका की धारणा का सूक्ष्मता से विरोध किया. एससीओ मंच ने भारत को बहु-संरेखण (multi-alignment) रणनीति को प्रदर्शित करने में सक्षम बनाया, जिसमें वह पश्चिमी शक्तियों के साथ तब काम करता है जब यह लाभकारी हो, लेकिन रणनीतिक स्वायत्तता से पीछे नहीं हटता.

रूसी तेल खरीद से संबंधित अमेरिकी टैरिफ़ के आगे झुकने से इनकार करने पर भारत का रुख इस शिखर सम्मेलन में और मजबूत हुआ. चीन और भारत दोनों रूसी तेल के सबसे बड़े खरीदार हैं, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि वे अमेरिकी दबाव के कारण अपनी ऊर्जा सुरक्षा से समझौता नहीं करेंगे. यह एससीओ संदेश, भले ही शत्रुतापूर्ण न हो, लेकिन यह सशक्त रूप से स्पष्ट था कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र और अर्थव्यवस्थाएं दबाव में कार्य नहीं करेंगी.

मिश्रित लेकिन परिपक्व होता समूहीय स्वरूप

शिखर सम्मेलन ने यह भी उजागर किया कि यद्यपि एससीओ में राजनीतिक प्रणालियों की विविधता है, चीन की सत्तावादी शासन प्रणाली से लेकर भारत के सशक्त लोकतंत्र तक यह एक परिपक्व मंच के रूप में विकसित हो रहा है जो विभिन्न हितों को समाहित कर सकता है. हालांकि कुछ विश्लेषक एससीओ की आलोचना इसे बंटा हुआ या केवल प्रतीकात्मक मंच कहकर करते हैं, तियानजिन शिखर सम्मेलन ने दिखाया कि यह व्यावहारिक समझौतों को जन्म दे सकता है. यद्यपि यूक्रेन का मुद्दा औपचारिक प्रस्ताव में शामिल नहीं था, लेकिन अनौपचारिक चर्चाओं में इसे लेकर बातचीत होने की रिपोर्टें आईं, जो यह दर्शाता है कि एससीओ अब अधिक कार्यात्मक बनता जा रहा है, भले ही समय चुनौतीपूर्ण हो.

द्विपक्षीय प्रगति और भविष्य की दिशा

भारत-चीन संबंधों में एक सतर्क सुधार देखा गया, जिसमें मोदी और शी जिनपिंग दोनों ने विकास-केंद्रित साझेदारी और विवादों से बचने के महत्व की पुन: पुष्टि की. अक्टूबर 2024 में कज़ान में हुई पिछली मुलाक़ात के बाद “सकारात्मक गति” का उल्लेख इस दिशा में उनकी मंशा को दर्शाता है, हालांकि वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर जमीनी स्तर पर विघटन को लेकर संदेह बना हुआ है.

भारत-रूस द्विपक्षीय संबंध अधिक फलदायी रहे. पुतिन ने यूक्रेन में शांति प्रयासों में भारत की भूमिका की सराहना की और भारत की निरंतर तटस्थता को स्वीकार किया. इस वर्ष के अंत में पुतिन की भारत यात्रा के साथ, इस शिखर सम्मेलन ने ऊर्जा, बुनियादी ढाँचे, रक्षा निर्माण और सीमा-पार भुगतान प्रणालियों में गहन सहयोग के लिए आधार तैयार किया है.

निष्कर्ष

25वें एससीओ शिखर सम्मेलन ने भारत को वैश्विक मामलों में अपनी आवाज बुलंद करने के लिए एक उपयुक्त मंच प्रदान किया, बिना किसी पक्ष को चुने. इसने नई दिल्ली को रणनीतिक स्वायत्तता और क्षेत्रीय साझेदारी के बीच संतुलन साधने, आतंकवाद पर अपना पक्ष रखने के साथ टकराव से बचने, और ऊर्जा व व्यापारिक गठबंधनों को पश्चिमी आदेशों के बिना आगे बढ़ाने की अनुमति दी. यद्यपि ठोस परिणामों को मूर्त रूप लेने में समय लग सकता है, फिर भी भारत की सशक्त लेकिन संतुलित कूटनीति पूरे शिखर सम्मेलन में स्पष्ट रूप से दिखाई दी.

एससीओ अभी कोई परिपूर्ण या एकजुट समूह नहीं है, लेकिन भारत के लिए यह एक आवश्यक भू-राजनीतिक उपकरण बना हुआ है, जो यूरेशिया के साथ भारत को अपनी शर्तों पर जुड़ने में सक्षम बनाता है. तियानजिन शिखर सम्मेलन ने यह सिद्ध कर दिया कि वैश्विक स्तर पर बढ़ते विभाजन के बीच भी भारत अपनी राह पर चल सकता है और दूसरों को उसमें सहभागी बना सकता है.

अतिथि लेखक-विनोद के. बंसल व अंकिता माहेश्वरी

(डिस्क्लेमर : इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं और आवश्यक नहीं कि वे इस प्रकाशन के विचारों का प्रतिनिधित्व करते हों.)

प्रोफाइल- विनोद के. बंसल
दिल्ली निवासी विनोद के. बंसल एक अनुभवी चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं, जिन्हें वित्तीय बाजारों में 35 वर्षों से अधिक का अनुभव है. वे वैश्विक वित्तीय रुझानों और निवेश रणनीतियों की गहरी समझ रखते हैं, जिससे वे वित्तीय जगत में एक विश्वसनीय आवाज बन गए हैं. उनसे vinodkbansal@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.

प्रोफाइल- अंकिता माहेश्वरी
अंकिता माहेश्वरी एक समर्पित मां और युवा लड़कियों के भावनात्मक कल्याण की मुखर समर्थक हैं. पेशे से वे एक प्रमाणित वित्तीय योजनाकार (Certified Financial Planner) हैं, लेकिन उनका सबसे प्रिय और महत्वपूर्ण किरदार एक “ओवरटाइम मां” का है, जो हमेशा उपस्थित, संवेदनशील और अपनी बेटी के विकास के वर्षों में गहराई से शामिल रहती हैं.


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