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भगोड़े बनो, छूट पाओ? भारत की न्याय व्यवस्था पर बड़ा सवाल

भारत की न्याय व्यवस्था से कैसे बच सकते हैं डिफॉल्टर्स: देश छोड़ें, सीनियर वकील करें और जितना कर्ज है उसका एक-तिहाई चुकाएं. संदेसेरा सेटलमेंट बनाम अनिल अंबानी के अंतहीन समन

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 5 months ago

भारत ने वर्षों में अपने सबसे बड़े वित्तीय अपराधियों से निपटने के लिए एक बेहद प्रभावी प्रणाली विकसित कर ली है. यह प्रणाली इस तरह काम करती है: अगर आप सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से अरबों रुपये का घोटाला करते हैं, तो सही कदम है कि तुरंत एक फ्लाइट पकड़ें बेहतर हो कि विदेशी पासपोर्ट पर किसी आरामदायक देश में जाकर बस जाएं और इंतजार करें.

अपने वकीलों के याचिका दाखिल करने का इंतजार करें. सरकार के थक जाने का इंतजार करें. और शायद सुप्रीम कोर्ट के उस प्रस्ताव का इंतजार करें जिसमें आपको अपने कुल बकाया का सिर्फ 33 प्रतिशत देकर मामला निपटाने का मौका मिले.

यह प्रणाली कहीं लिखी नहीं है. यह संविधान में भी नहीं है. लेकिन यह वास्तविक है और इसका सबसे हालिया उदाहरण नवंबर 2025 में सामने आया, जब भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने संदेसेरा बंधुओं को उनके कथित घोटाले की राशि का एक-तिहाई देकर आजादी खरीदने की अनुमति दी.

लेकिन जो लोग देश में रहे और जांच में सहयोग करते रहे, उनके लिए एक अलग व्यवस्था है: नौ एफआईआर, पच्चीस समन, पांच अस्थायी अटैचमेंट आदेश, सहयोगियों की गिरफ्तारी और लुक-आउट सर्कुलर वह भी ऐसे व्यक्ति के खिलाफ जिसने देश छोड़ा ही नहीं.

भारत की दो-स्तरीय न्याय प्रणाली में आपका स्वागत है, जहां प्रीमियम श्रेणी उन लोगों के लिए है जो समय रहते देश छोड़ चुके हैं.

संदेसेरा मॉडल: भगोड़ा रणनीति की मिसाल

नितिन और चेतन संदेसेरा, जिनकी कंपनियां फार्मा से लेकर एनर्जी तक फैली थीं, 2017 में अल्बानियाई पासपोर्ट पर भारत छोड़कर चले गए. उनके खिलाफ घरेलू बैंकों से डिफॉल्ट के आरोप थे.

सीबीआई के अनुसार, उन्होंने फर्जी दस्तावेज, बढ़ी हुई वैल्यूएशन और अवैध फंड ट्रांसफर के जरिए लगभग 1.6 अरब डॉलर का घोटाला किया. ईडी ने 9,800 करोड़ रुपये की संपत्तियां अटैच कीं. आयकर विभाग और SFIO ने भी केस दर्ज किए.

फिर आया नवंबर 2025.

सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा कि यदि वे 570 मिलियन डॉलर (कुल बकाया का लगभग एक-तिहाई) चुकाते हैं, तो आपराधिक मामले खत्म किए जा सकते हैं. उनके वकील मुकुल रोहतगी ने कहा कि उनके मुवक्किल “सभी कार्यवाहियों से छुटकारा पाने” के लिए तैयार हैं.

जिम्मेदारी स्वीकार करने के लिए नहीं. भारत लौटकर मुकदमे का सामना करने के लिए नहीं. बल्कि केवल कागजी कार्यवाही खत्म करने के लिए लगभग 67 प्रतिशत की छूट पर.

कोर्ट ने कहा कि अगर पैसा बैंकों को वापस मिल रहा है, तो आपराधिक कार्यवाही जारी रखने का कोई खास उद्देश्य नहीं है.

जो रुके, उनके लिए चेतावनी

अब उस रास्ते को देखें जिसमें व्यक्ति देश में रहता है और जांच में सहयोग करता है.

अनिल अंबानी ने 2025 और 2026 में ईडी के सामने पेशी दी, सुप्रीम कोर्ट में यह आश्वासन दिया कि वह देश नहीं छोड़ेंगे और जांच में सहयोग करेंगे.

इसके बदले उन्हें क्या मिला?
नौ एफआईआर, 25 से अधिक समन, करीब 3,972 करोड़ रुपये की संपत्तियों पर अटैचमेंट, उनके सहयोगियों की गिरफ्तारी और लुक-आउट सर्कुलर.

जो सर्कुलर भगोड़ों के खिलाफ हटाए गए, वही उस व्यक्ति के खिलाफ जारी हुए जिसने देश छोड़ा ही नहीं.

अन्य भगोड़े: आरामदायक निर्वासन

विजय माल्या, नीरव मोदी और ललित मोदी जैसे नाम भी विदेश में हैं और प्रत्यर्पण प्रक्रिया का सामना कर रहे हैं.

भारत को अपने ही नागरिकों को वापस लाने के लिए विदेशी अदालतों को यह साबित करना पड़ रहा है कि उसकी जेलें अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप हैं.

संवैधानिक सवाल

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता की गारंटी देता है. लेकिन मौजूदा उदाहरण एक अलग तस्वीर पेश करते हैं.

अदालतों के फैसलों ने एक संदेश साफ कर दिया है:
जो भाग गए और बाद में समझौता करना चाहते हैं, उन्हें राहत मिल सकती है.

अब सवाल यह है कि जो व्यक्ति भागा ही नहीं, क्या उसे भी वही राहत मिलनी चाहिए?

यह एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब असहज जरूर है, लेकिन स्पष्ट भी.

निष्कर्ष

भारत ने आर्थिक अपराधियों से निपटने के लिए जटिल कानूनी ढांचा बनाया है. लेकिन नवंबर 2025 में एक-तिहाई राशि लेकर समझौता स्वीकार करना एक अलग ही कहानी बताता है. इसी बीच, जो व्यक्ति देश में रहकर जांच का सामना कर रहा है, वह कई कानूनी कार्रवाइयों से घिरा हुआ है.

भारत की न्याय प्रणाली में कई खूबियां हैं. लेकिन स्थिरता उनमें हमेशा शामिल नहीं दिखती.
 


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