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बेहतर कम्युनिकेशन से कैसे मिली DMRC को गति, BW इवेंट में मिला जवाब

90% लोगों का मानना था कि दिल्ली मेट्रो कभी अस्तित्व में नहीं आ पायेगी. इसे सफेद हाथी तक कहा गया.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 2 years ago

BW Businessworld द्वारा राजधानी दिल्ली में BW Marketing World इवेंट आयोजित किया जा रहा है. इस कार्यक्रम में मार्केटिंग से जुड़ी दिग्गज हस्तियां शिरकत कर रही हैं. इस मौके पर DMRC के प्रिंसिपल एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर अनुज दयाल भी उपस्थित रहे. दयाल ने The Power of Thought Leadership in Corporate Communication विषय पर अपने विचार व्यक्त किए और बताया कि किस तरह DMRC के सामने आईं चुनौतियों को उन्होंने बेहतर संवाद से हल किया.  

डॉ बत्रा की तारीफ से हुई शुरुआत
DMRC के प्रिंसिपल एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर अनुज दयाल ने BW Businessworld समूह के चेयरमैन, एडिटर इन चीफ और एक्‍सचेंज4 मीडिया के फाउंडर डॉ. अनुराग बत्रा की तारीफ करते हुए कहा कि डॉ बत्रा की कुछ बातें उनके पहले बॉस डॉक्टर ईश्रीधरन से मिलती हैं. पद्मश्री, पद्मविभूषण ईश्रीधरन न केवल दिल्ली बल्कि पूरे देश की मेट्रो के निर्माता हैं. वह भी इस बात पर जोर दिया करते थे कि 8 घंटे की नींद जरूरी है. सुबह जल्दी उठाना, कुछ आध्यात्मिक साहित्य पढ़ना और शारीरिक रूप से खुद को फिट रखना भी अत्यंत आवश्यक है. इसलिए हमारे ट्रेनिंग स्कूल में सभी कर्मचारियों को योग सिखाया जाता है. 

ये है सक्सेसफुल कम्युनिकेशन
दयाल ने आगे कहा कि डॉक्टर ईश्रीधरन की कर्मचारियों के साथ अच्छी बॉन्डिंग थी, वह कर्मचारियों से उनके घर-परिवार का हालचाल भी जाना करते थे. जब मैं डॉक्टर ईश्रीधरन के केबिन में जाता था, तो जो भी मुद्दे होते थे, उसे हम दोनों ही बातचीत से सुलझा लिए करते थे. मैं उनकी बातों पर फोकस करता था और वो मेरी बातों पर. यही कम्युनिकेशन का बेसिक फंडामेंटल है. यदि मैं जो कुछ बोल रहा हूं और आप उसे सुन रहे हैं, तो ये सक्सेसफुल कम्युनिकेशन है. इसके विपरीत यदि आप ऐसा नहीं कर रहे हैं, तो ये सफल संचार नहीं है. यही वजह है कि मैं पहले से कोई स्पीच तैयार करके नहीं आता. मैं केवल अपने अनुभवों को सबके साथ साझा करता हूं. 

'रेलवे की नौकरी से नहीं था खुश'
उन्होंने कहा कि मैं किस्मत से कम्यूनिकेटर बना. मैंने सिविल सर्विस की तैयारी की. मुझे रेलवे में जो नौकरी मिली, वो मेरी उम्मीद के अनुरूप नहीं थी, क्योंकि वहां काफी फाइल वर्क था. सिविल सर्विस की तैयारी के दौरान मैंने भारतीय विद्या भवन से पत्रकारिता में डिप्लोमा किया था. उस समय पत्रकारिता में कोई संस्थान डिग्री कोर्स नहीं कराता था. लिहाजा जैसे ही मुझे रेलवे में पब्लिक रिलेशन डिपार्टमेंट के बारे में पता चला, मैं उससे जुड़ गया और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. आप सभी कम्युनिकेशन इंडस्ट्री से जुड़े हैं, फिर चाहे वो मार्केटिंग हो, ब्रैंड बिल्डिंग हो. यह भले ही सबसे ज्यादा पे करने वाला प्रोफेशन न हो, लेकिन ये सबसे दिलचस्प प्रोफेशन जरूर है. मैं पॉलिटिकल साइंस ग्रेजुएट हूं, PR क्वालिफिकेशन बाद में की हैं. मैंने 50 की उम्र के बाद मास्टर किया. इस बैकग्राउंड के साथ दिल्ली मेट्रो में मैंने बहुत सी तकनीक जानकारी हासिल की. दिल्ली मेट्रो के संबंध में मेरी अधिकांश स्टोरी टेक्निकल स्टोरी ही रही हैं.

पत्रकारिता में अब पहले वाली बात नहीं
पत्रकारिता के बारे में बात करते हुए DMRC के प्रिंसिपल एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर अनुज दयाल ने कहा कि आज पत्रकारिता वो नहीं है, जो पहले हुआ करती थी. आज के समय में पत्रकारिता एक व्यवसाय बन गई है. अधिकांश मीडिया संस्थान बिजनेस हाउस द्वारा चलाए जा रहे हैं. इस फील्ड में पैसा भी ज्यादा नहीं है. ज़्यादातर पत्रकार कॉन्ट्रैक्ट बेसिस पर हैं. आज पत्रकार पहले जैसी स्थिति में नहीं हैं. DMRC पर वापस लौटते हुए उन्होंने कहा कि मुझे यहां इसलिए नियुक्त किया गया था क्योंकि डॉक्टर ईश्रीधरन द्वारा निर्मित कोकण रेलवे लाइन को लेकर गोवा सेक्शन में मीडिया से जुड़ी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा था. गोवावासी नहीं चाहते थे कि मेट्रो या ट्रेन उनके वातावरण को प्रभावित करे. इस समय इस विषय पर काफी कुछ लिखा जा रहा था. लेकिन हम मजबूती से अपना पक्ष रखने में कामयाब रहे.

नुक्कड़ नाटकों से पहुंचाई अपनी बात
अनुज दयाल के मुताबिक, ईश्रीधरन की नजर में मीडिया की छवि बेहद नकारात्मक थी. उनका कहना था कि किसी भी गलत लेख पर तुरंत पत्रकार के खिलाफ केस किया जाए. लेकिन बाद में उन्होंने महसूस किया कि एक कम्यूनिकेटर होना चाहिए, क्योंकि दिल्ली संचार का केंद्र है. सभी मीडिया हाउस दिल्ली में हैं इसलिए आप PRO के बिना काम नहीं कर सकते. दिल्ली मेट्रो प्रोजेक्ट हमारे लिए बेहद चुनौतीपूर्ण था. 90% लोगों का मानना था कि दिल्ली मेट्रो कभी अस्तित्व में नहीं आ पायेगी. इसे सफेद हाथी तक कहा गया. मैं PR टीम में अकेला था, कोई साथ नहीं जुड़ना चाहता था. करीब 10 साल तक मैंने ये डिपार्टमेंट 3 से 4 लोगों के साथ ही चलाया. लेकिन हम सभी ने कड़ी मेहनत की. हमने मेट्रो को लेकर लोगों को इतना कुछ बताया कि वो बेसब्री से उसका इंतजार करने लगे. जब हमने दिल्ली मेट्रो का छोटा सेक्शन खोला तो लोगों को लगा कि दिल्ली की परिवहन और प्रदूषण की समस्या खत्म हो जाएगी. यह दिल्ली के सामाजिक और आर्थिक रूप से सबसे पिछड़ा इलाकों में से एक था. यहां लोगों से कम्युनिकेशन करना आसान नहीं था, क्योंकि वहां केवल एक दो उर्दू अखबार ही आते थे. इसलिए हमने हिंदी, पंजाबी और उर्दू में नुक्कड़ नाटक किए. 

बिना विज्ञापन ही कर डाला कमाल
उन्होंने कहा - हमने ट्रेड फेयर में मेट्रो के बारे में बताया. लोगों ने रेल के बारे में सुना था, लेकिन मेट्रो उनके लिए बिल्कुल नया कांसेप्ट था. वो नहीं जानते थे कि एस्केलेटर क्या होता है, टोकन कैसे लिया जाता है. लोगों को मेट्रो स्टेशन के अंदर जाने में भी डर लगता था. इसलिए हमने उनकी मदद के लिए स्टेशन और मेट्रो के अंदर भी वॉलेंटियर तैनात किए. हर चीज का कम्युनिकेशन किया. जिस दिन मेट्रो खुलनी थी, उससे एक दिन पहले रात से लोग स्टेशन पर इकठ्ठा हो गए. अनुमान से ज्यादा भीड़ के चलते हमारे ऑटोमाटिक गेट, टोकन सिस्टम सब ध्वस्त हो गए थे. हालांकि, हमने पेपर टिकट भी बना लिए थे. अगले दिन हमने विज्ञापन निकालकर लोगों से मेट्रो की सवारी न करने की अपील की. उन्हें समझाया कि मेट्रो हमेशा के लिए है, इतनी बड़ी संख्या में न आएं. पहले दिन करीब 12 लाख लोग आए, जबकि क्षमता 2 लाख लोगों की थी. अनुज दयाल ने बताया कि DMRC विज्ञापन नहीं देती, हम बिना किसी विज्ञापन के न्यूजपेपर स्टोरी के माध्यम से लोगों तक पहुंचे और असंभव लगने वाले प्रोजेक्ट को सफल करके दिखाया.


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