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आंकड़ों के खेल पर भारी पड़ रहे वास्तविक हालात

आरबीआई की रिपोर्ट बताती है कि 16 दिसंबर को समाप्त सप्ताह के दौरान अपना विदेशी मुद्रा भंडार 57.1 करोड़ डॉलर घटकर 563.499 अरब डॉलर रह गया है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago

आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (ओईसीडी) की रिपोर्ट पर भरोसा करें, तो 2023-24 का वित्तीय सत्र वैश्विक मंदी का रहेगा, मगर भारत इस दौर में भी 6.6 फीसदी की वृद्धि दर के साथ सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में होगा. यह खबर निश्चित रूप से हम सभी को राहत देती है. इसका आधार रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भारत का प्रदर्शन और आधार उत्पादन का संतुलित रहना है. वैश्विक ऊर्जा संकट की स्थिति में आशंकित वैश्विक मंदी में भारत अपने मूल उत्पादनों के बेहतर प्रदर्शन के सहारे खड़ा रहेगा, जैसे कोरोना महामारी के दौर में था. वैश्विक मांग में गिरावट और मुद्रास्फीति का दबाव बना रहेगा मगर जी20 की अध्यक्षता और तेल उसका मददगार बनेगा, जिससे सऊदी अरब के बाद दूसरी सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बनेगा. 

आत्मघाती अर्थ नीतियां 
इस खबर के साथ ही एक सच यह भी है कि जब दुनिया वैश्विक मंदी की चौखट पर खड़ी हो, तब प्रदर्शित करने की होड़ में भारत आत्मघाती अर्थ नीतियां अपनाकर संकट की दिशा में बढ़ता दिखता है. हम जिस तेल को निर्यात करके विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं, असल में वो ट्रेडिंग के सिवाय कुछ नहीं है. रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदकर दूसरे देशों को बेचने का धंधा रूस के हालात खराब होने पर कमजोर पड़ेगा. इसका मुनाफा सार्वजनिक क्षेत्र को उतना नहीं है, जितना निजी रिफाइनरी चलाने वाली कंपनियों को. भारत कुल खपत का महज 10 से 12 फीसदी कच्चा तेल पैदा कर पाता है. रूस से 30 फीसदी कच्चा तेल खरीदकर दुनियाभर में बेचने में निजी कंपनियों के खाते में बड़ा मुनाफा जा रहा है. देश में कोर सेक्टर का उत्पादन लगातार गिर रहा है. वजह, देश के बाहर से सस्ता माल आ रहा है. भारत की खपत भी घटी है. नतीज़ा, उत्पादन 7 से गिरकर 4 फीसदी पर आ चुका है.

बिचौलिए की भूमिका में भारत 
मौजूदा दौर में भारत की अर्थव्यवस्था विदेशी आयात और कर्ज पर टिकी है. देश के निर्यात का करीब 42 फीसदी हिस्सा उस रूसी तेल पर निर्भर है, जो यहां से कुछ देशों को निर्यात किया जा रहा है. यानी भारत बिचौलिए की भूमिका में है. रूस ने अपना तेल उत्पादन घटाने का फैसला किया है. इन हालात में सस्ते तेल का लाभ आमजन को न देने से पैदा हुआ संकट और भी बढ़ने की आशंका है. मौजूदा स्थिति ये है कि रूस का सस्ता न मिले और चीन अपने यहां से जरूरी सामान का निर्यात कम कर दे या रोक दे, तो हमारे देश के सामने संकट बढ़ जाएगा. ऐसे में आमजन मंदी के दौर में आत्मघाती कदम उठाने को मजबूर होंगे. हमारी उम्मीद सिर्फ इन अनुमानों पर टिकी है कि वित्तीय वर्ष 2023-24 में सकल घरेलू उत्पाद की बढ़ोत्तरी की दर धीमी होने पर भी 5.7 फीसदी रहेगी. वजह, निर्यात और घरेलू मांग में वृद्धि होना है. वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि के करीब तीन-चौथाई के लिए जिम्मेदार होगा, जबकि अमेरिका और यूरोप में तेजी से गिरावट आ रही है. कोविड महामारी के आर्थिक बदहाली के पिछले दो साल से हम तुलना करके खुश होते हैं मगर यह उम्मीदों भरा नहीं है. हम सोच रहे थे कि भारत का उद्योग जगत तेजी और उत्साह से वापसी करेगा, मगर ऐसा नहीं हो पाया है. अडानी, अंबानी और वेदांत जैसी कंपनियां नए निवेश प्रस्तावों के साथ वित्त वर्ष 2023 की पहली दो तिमाहियों में उत्साह जगाने में सफल रहीं, मगर अधिकतर भारतीय कंपनियां मंदी का शिकार हो रही हैं. आपूर्ति में रुकावट, ब्याज दरों में बढ़ोत्तरी और कमजोर मांग के कारण आर्थिक बदहाली से वो उबर नहीं पा रही हैं, जिससे कोर सेक्टर का प्रदर्शन निराशाजनक है.

विदेशी निवेश की रफ्तार सुस्त
कंपनियों के हालात 2022 की जुलाई-सितंबर की तिमाही में बिगड़ने लगे थे, यह गिरावट अप्रैल-जून, 2020 के बाद पहली बार देखी गई थी. वैश्विक हालात और घरेलू दबावों के कारण पर्याप्त निवेश नहीं आ पाये. देश में निवेश के लिए संकेत देने वाला सकल नियत पूंजी सृजन वित्त वर्ष 2022-23 की दूसरी तिमाही में थोड़ा बढ़कर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 29.6 फीसदी हो गया, जो पहली तिमाही में 29.2 फीसदी था. कारण, विभिन्न उत्पादों एवं सेवाओं की मांग पूरी तरह पटरी पर नहीं आई है. एक बार फिर कोरोना महामारी का संकट दस्तक दे रहा है, जो फार्मा को छोड़कर अन्य उद्योगों को डराने का काम करता है. यही कारण है कि नीलसनआईक्यू की रिपोर्ट कहती है कि बढ़ती लागत से निपटने के लिए और ग्राहकों की पसंद-नापसंद का ध्यान रखते हुए कंपनियां ज्यादातर उत्पाद छोटे पैक में उतार रही हैं. जिससे पहली छमाही में निवेश के शीर्ष 10 क्षेत्रों में से 6 में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की रफ्तार सुस्त पड़ गई. वाणिज्य मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार अप्रैल-सितंबर के दौरान प्रत्यक्ष विदेशी इक्विटी निवेश 14 प्रतिशत घटकर 26.9 अरब डॉलर रह गया. सीएमआईई के मुताबिक उपलब्ध पूंजीगत व्यय का आंकलन बताता है कि चालू वित्तीय वर्ष की दूसरी तिमाही में निजी क्षेत्र से 3.1 लाख करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव आए हैं. यह रकम निजी क्षेत्र के 2.1 से 2.5 लाख करोड़ रुपये के औसत तिमाही निवेश प्रस्तावों से अधिक है रही मगर सार्वजनिक क्षेत्र में हालात ठीक नहीं हैं.

कम हो रहा है विदेशी मुद्रा भंडार
आरबीआई की यह रिपोर्ट चिंता पैदा करती है कि विदेशी मुद्रा भंडार कम हो रहा है. 16 दिसंबर 2022 को समाप्त सप्ताह के दौरान अपना विदेशी मुद्रा भंडार 57.1 करोड़ डॉलर घटकर 563.499 अरब डॉलर रह गया है. इस तेज गिरावट को रोकने के लिए रिजर्व बैंक ने काफी मात्रा में डॉलर बाजार में बेचे. इसका प्रभाव देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ा है. इस दौरान देश के सोने के भंडार में भी गिरावट आई है. 16 दिसंबर 2022 को समाप्त सप्ताह के दौरान स्वर्ण भंडार के मूल्य में 15 करोड़ डॉलर की कमी आई. अब अपने स्वर्ण भंडार का मूल्य घट कर 40.579 अरब डॉलर रह गया है. इससे पहले 9 दिसंबर को समाप्त हुए सप्ताह में भी स्वर्ण भंडार का मूल्य 29.6 करोड़ डॉलर घटा था. यह स्थिति भी अच्छे संकेत नहीं देती है. यही नहीं फॉरेन करेंसी असेट भी इस दौरान घटा है. कुल विदेशी मुद्रा भंडार में विदेशी मुद्रा आस्तियां (FCA) काफी अहम होता है. जो बीते सप्ताह में यह 50 करोड़ डॉलर घटकर 499.624 अरब डॉलर रह गया है.

उम्मीदों को धूमिल करता आंकलन
संपूर्ण स्थिति का आंकलन हमारी उम्मीदों को धूमिल कर देता है. जब कोर सेक्टर का उत्पादन गिर रहा होगा. जब तमाम उद्योगों में एकाधिकार की स्थिति बन रही होगी. स्वस्थ प्रतिस्पर्धा घटने से कारोबारी माहौल खत्म होगा. तब उद्योगों में रोजगार भी घटेंगे और आमदनी भी. महंगाई को काबू करने के लिए सरकार जो उपाय करेगी, वो उद्योगों के लिए उलट साबित होंगे. ऐसे में आयात बढ़ेगा और व्यापार घाटा भी. यह संकट की आशंका को प्रबल करता है और झूठे आश्वासनों उम्मीदों के आंकड़ों को तोड़ता है.


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