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बिना किसी ठोस समाधान के तीसरी तिमाही चुनौतीपूर्ण होगी!

चंद दिनों-महीनों में महंगाई कम होने से सार्थक हल नहीं निकलने वाला, इसके लिए स्थाई समाधान की जरूरत है, जो सिर्फ सरकार ही कर सकती है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago

लंबे अंतराल बाद गुरुवार को अखबारों में सुखद खबर पढ़ने को मिली कि नवंबर 2022 में महंगाई घटी है. वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय ने बुधवार को बताया कि ‘नवंबर 2022 में मुद्रास्फीति की दर 5.85 फीसदी पर आ गई. वजह बनी, खाद्य पदार्थों, मूल धातुओं, कपड़ा, रसायन, रासायनिक उत्पाद और कागज से बने उत्पादों के दामों में गिरावट. नवंबर 2022 से पहले मुद्रास्फीति का निचला स्तर फरवरी 2021 में रहा था, जब डब्ल्यूपीआई मुद्रास्फीति 4.83 फीसदी पर थी. हाल में जारी आंकड़े बताते हैं कि खुदरा मुद्रास्फीति 11 महीनों में पहली बार, नवंबर 2022 में नीचे 5.88 फीसदी रही थी. 

कोर सेक्टर के उत्पादन में गिरावट
पिछले साल दिसंबर में खुदरा महंगाई दर 5.59 फीसदी थी, तब से ये लगातार 6 फीसदी से ऊपर बनी हुई थी. नतीजतन आरबीआई ने लगातार पांच बार रेपो रेट में बढ़ोत्तरी कर इसे 6.25 फीसदी पर पहुंचा दिया. दिसंबर 2022 में आरबीआई ने रेपो रेट में 35 बेसिस पॉइंट यानी 0.35 फीसदी की बढ़ोत्तरी की थी. इस खबर के साथ एक चिंताजनक खबर यह थी कि कोर सेक्टर के उत्पादन में गिरावट आई है. सांख्यिकी मंत्रालय के अनुसार, इस साल अक्टूबर 2022 में भारत के औद्योगिक उत्पादन सूचकांक में 4 फीसदी की कमी आई है. पिछले 2 सालों में यह भारत का सबसे खराब प्रदर्शन है. पिछले 26 महीनों की यह सबसे बड़ी मासिक गिरावट है. 

वित्त मंत्री सीतारमण की खीज
सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, आईआईपी में यह गिरावट विनिर्माण क्षेत्र के उत्पादन में कमी और खनन एवं बिजली उत्पादन के क्षेत्रों के कमतर प्रदर्शन के कारण है. पिछले साल अक्टूबर में आईआईपी में 4.2 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई थी, वहीं औद्योगिक उत्पादन में इससे पहले अगस्त 2020 में 7.1 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई थी. जब महंगाई दर कम हो रही हो मगर उत्पादन में गिरावट दर्ज की जा रही हो, तो यह चिंता का विषय बन जाता है. वजह, जब औद्योगिक उत्पादन का गिरना आर्थिक गतिविधियों का कम होना माना जाता है. इसका असर न सिर्फ अर्थव्यवस्था के लिए संकट का संकेत है बल्कि रोजगार के लिए भी. सोमवार को संसद में डॉलर के मुकाबले गिरते रुपए को लेकर जब कांग्रेस सांसद अनुमुला रेवंत रेड्डी के एक सवाल पर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण इस तरह खीझ गईं कि कह दिया, संसद में कुछ लोग देश की बढ़ती अर्थव्यवस्था से जलते हैं. भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है, लेकिन विपक्ष को इससे दिक्कत है. भारत के विकास पर सभी को गर्व होना चाहिए, लेकिन कुछ लोग इसे मजाक के रूप में लेते हैं. 

मजबूत नहीं है हमारी अर्थव्यवस्था
सीतारमण का यह बयान, उनके दर्द को बयां कर रहा था, क्योंकि रेपो रेट के बूते महंगाई काबू करने की कोशिशों से कोई स्थाई हल नहीं निकलने वाला. नवंबर महीने में महंगाई दर कम होने के बाद भी औद्योगिक उत्पादन गिरना यह संकेत देता है कि देशवासियों की अर्थव्यवस्था मजबूत नहीं है. वो खरीददारी और उपभोग में कटौती कर रहे हैं, जिससे मांग कम पड़ी है. प्राकृतिक कारणों से भी महंगाई कम हुई है. इसकी एक वजह नई फसलों का उत्पादन बाजार में आना भी रहा. ज्यों ही इसका संतुलन बिगड़ा, हालात फिर बिगड़ेंगे. वैसे भी वैश्विक हालात ये हैं कि भारत भुखमरी सूचकांक में 122 देशों की लिस्ट में 107वें स्थान पर खड़ा है. सरकार हालात सुधारने पर बजट खर्च करने के बजाय अरबों रुपये के इश्तेहारों और रईसी के खर्चों में रुपये खर्चने में व्यस्त है. देश में कम आर्थिक गतिविधियां भावी संकट का भी सूचकांक होती हैं.

प्रयासों की नहीं दी कोई जानकारी
वित्त मंत्री ने संसद में यह भी बताया कि पिछले पांच सालों के दौरान बैंकों से कर्ज लेने वाले कुछ पूंजीपतियों ने जब उसे नहीं चुकाया तो सरकार ने उसे बट्टे खाते (एनपीए) में डाल दिया. इसकी वसूली के लिए सरकार के स्तर पर क्या प्रयास किये गये, इस बारे में उन्होंने कोई जानकारी नहीं दी. यह चिंताजनक है क्योंकि भारत की अर्थव्यवस्था पर लगातार कर्ज का बोझ बढ़ता जा रहा है. सरकार न तो वक्त पर राज्यों की राजस्व हिस्सेदारी दे पा रही है और न ही बढ़ते कर्ज को कम कर पा रही है. रोजगार संकट गंभीर बीमारी में तब्दील हो चुका है. बेरोजगारी दर नवंबर माह में बढ़कर 8.0 फीसदी पर पहुंच गई है, जो अर्थव्यवस्था के लिए संकट बढ़ाने वाला है. इसका कोई जवाब उनके पास नहीं था. 

स्थायी समाधान जरूरी
चंद दिनों-महीनों में महंगाई कम होने से सार्थक हल नहीं निकलने वाला, इसके लिए स्थाई समाधान की जरूरत है, जो सिर्फ सरकार ही कर सकती है. बढ़ती महंगाई और रुपए पर दबाव के चलते भारत का चालू खाते का घाटा इस साल की तीसरी तिमाही में 10 साल के अधिकतम पर जा सकता है. घरेलू स्तर पर उत्पादन लागत बढ़ना, उपभोक्ता की जेब पर भारी पड़ रहा है. इस बारे में अर्थशास्त्री रघुराम राजन कह चुके हैं कि अगला साल बहुत मुश्किल भरा है, जहां निर्यात में भारी गिरावट आएगी, जिससे व्यापार घाटा रिकॉर्ड होगा. उनके मुताबिक, भारत की विकास दर 5.2 फीसदी से भी कम होगी. अभी भी जो हालात मौजूद हैं, उस अर्थव्यवस्था में अगर असंगठित क्षेत्र को भी शामिल करके देखें, तो वास्तविक विकास दर 1.5 फीसदी के स्तर पर ही पहुंचती है.

नीतियों को प्रभावी बनाया जाए
अर्थव्यवस्था को लेकर सरकार को अभी भी क्या करने की जरूरत है और उसे किन बातों पर जोर देना चाहिए? यह वास्तविक चिंता का विषय है. जरूरत इस बात की है कि नीतियों को प्रभावी बनाने पर ध्यान केंद्रित किया जाए. एकाधिकार वाले पूंजीवाद पर लगाम लगाई जाये, क्योंकि बाजार में मुक्त प्रवेश कहीं अधिक सार्थक प्रतिस्पर्धा मुहैया कराता है. स्टार्टअप कुछ हद तक तकनीकी कारोबारों तक सिमट गए हैं. इसके लिए सरकार को कारोबार में प्रवेश को सार्थक तरीके से बेहतर चाहिए. सरकारी क्षेत्र काफी बड़ा है, जिनका इस्तेमाल सामंजस्य बनाकर करना होगा. केवल विनिवेश के बूते कुछ नहीं हो सकता है. बीमार उद्यमों को रोगमुक्त करना चाहिए, जो अधिक रोजगार उपलब्ध करा सकने में सहयोग कर सकें. यह दीर्घकालिक प्रयास होता है, जिस पर अधिक ध्यान देने की जरूरत सदैव रहती है.


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