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मंदी के दौर में भी अडिग रहने के लिए भारत को उठाने होंगे ये कदम

आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (ओईसीडी) की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि 2023-24 का वित्तीय सत्र वैश्विक मंदी का रहेगा.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago

  • अजय शुक्ला, वरिष्ठ पत्रकार

अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (आईएमएफ) की प्रमुख क्रिस्टलीना जार्जीवा का एक बयान न सिर्फ भारत बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था को लेकर चिंता बढ़ाने वाला है. उन्होंने कहा कि इस साल दुनिया की एक तिहाई अर्थव्यवस्था मंदी का शिकार होगी. चीन, अमेरिका और यूरोप में नरमी की आशंका के बीच 2023 पिछले साल के मुकाबले अधिक चुनौतीपूर्ण होगा. रूस-यूक्रेन युद्ध खत्म होते नहीं दिखता. बढ़ती मुद्रास्फीति, उच्च ब्याज दर और चीन में कोरोना संकट वैश्विक अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव डाल रहा है. उन्होंने बताया कि जिन देशों में मंदी नहीं भी है, वहां भी करोड़ों लोग मंदी से प्रभावित होंगे. 

चिंता की लकीरें
इन वैश्विक हालात के बीच भारत में बढ़ती बेरोजगारी और महंगाई चिंता की लकीरें बढ़ा रही हैं. देश में बेरोजगारी दर दिसंबर, 2022 में बढ़कर 8.3 फीसदी के उच्चस्तर पर पहुंच गई है. यह 2022 में सबसे ऊंचा आंकड़ा है. सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकनॉमी के मुताबिक, नवंबर में बेरोजगारी की दर आठ फीसदी थी, जबकि सितंबर में यह सबसे कम 6.43 फीसदी थी. वहीं अगस्त में यह 8.28 फीसदी पर थी, जो इस साल का दूसरा सबसे ऊंचा आंकड़ा था. दिसंबर में शहरी बेरोजगारी दर 10 फीसदी थी. वहीं ग्रामीण बेरोजगारी दर 7.5 फीसदी थी. राज्यों में हरियाणा में सबसे अधिक 37.4 फीसदी रही. दूसरे नंबर पर राजस्थान (28.5 फीसदी), फिर दिल्ली (20.8 फीसदी), बिहार (19.1 फीसदी) और झारखंड (18 फीसदी) का नंबर बेरोजगारी में आता है.

एसोचैम का दावा 
इन सब के बावजूद, उद्योग जगत की उम्मीदें सुखद हैं. उद्योग मंडल एसोचैम ने दावा किया कि मजबूत उपभोक्ता मांग, कंपनियों के अच्छे प्रदर्शन और मुद्रास्फीति में नरमी के साथ देश की अर्थव्यवस्था के 2023 में वैश्विक स्तर पर कठिन दौर से बाहर निकलने और मजबूत प्रदर्शन करने की उम्मीद है.  उसने कहा कि वैश्विक मांग में नरमी का जो जोखिम है, उसे हमारी घरेलू मांग बेअसर करेगी. हमने पिछले साल 2022 में देखा है कि विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों में बिकावली और मौजूदा चिंताओं के बावजूद घरेलू निवेशकों ने बाजार में उत्साह दिखाया है. डेट प्रतिफल से प्रतिस्पर्धा, चीन में कोविड संक्रमण बढ़ने, मूल्यांकन में तेजी, भूराजनीतिक तनाव और दर वृद्धि से जुड़ी आशंकाओं ने निवेशकों को सतर्क किया है. जिससे विदेशी निवेशक से कम उत्साह की आशंका बनी हुई है. आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (ओईसीडी) की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि 2023-24 का वित्तीय सत्र वैश्विक मंदी का रहेगा मगर भारत इस दौर में भी 6.6 फीसदी की वृद्धि दर के साथ सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में होगा. यह खबर हमें राहत देती है. वैश्विक ऊर्जा संकट की स्थिति में आशंकित वैश्विक मंदी में भारत अपने मूल उत्पादनों के बेहतर प्रदर्शन के सहारे खड़ा रहेगा, जैसे कोरोना महामारी के दौर में था.

घटता विदेशी मुद्रा भंडार
पूंजी बाजार की बात करें तो, पहली छमाही में निवेश के शीर्ष 10 क्षेत्रों में से 6 में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की रफ्तार सुस्त पड़ गई थी. इस दौरान प्रत्यक्ष विदेशी इक्विटी 14 फीसदी घटकर 29.9 अरब डॉलर रह गया था. विदेशी मुद्रा भंडार लगातार कम होकर 562.808  अरब डॉलर रह गया है. विदेशी मुद्रा आस्तियां भी घटकर 498.49 अरब डॉलर रह गईं. भारत के स्वर्ण भंडार के मूल्य घट कर 40.969 अरब डॉलर रह गया है. वहीं राजस्व वसूली की एक अच्छी खबर वित्त मंत्रालय से आई, जिसने बताया कि जीएसटी संग्रह सालाना आधार पर 15 फीसदी बढ़कर 1.49 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो गया. दिसंबर 2022 के दौरान एकत्रित सकल जीएसटी राजस्व 1,49,507 करोड़ रुपये है. इसमें सीजीएसटी 26,711 करोड़ रुपये, एसजीएसटी 33,357 करोड़ रुपये, आईजीएसटी 78,434 करोड़ रुपये और उपकर 11,005 करोड़ रुपये शामिल हैं. शुद्ध कॉरपोरेट कर संग्रह वर्ष 2021-22 में 7.12 लाख करोड़ रुपये रहा. मौजूदा बाजार भाव पर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) 236.64 लाख करोड़ रुपये था. इस तरह जीडीपी के मुकाबले शुद्ध कॉरपोरेट कर संग्रह 3.01फीसदी रहा. जीडीपी के मुकाबले कॉरपोरेट कर संग्रह के पिछले पांच साल के आंकड़ों से पता चलता है कि यह अनुपात 2018-19 में सबसे अधिक था. उस साल शुद्ध कॉरपोरेट कर संग्रह 6.63 लाख करोड़ रुपये, यानी जीएसटी का 3.51 फीसदी था.

यह भी चिंता का विषय 
हमारे लिए रुपये की गिरती दशा चिंता का विषय लगातार बनी हुई है. अंतरबैंक विदेशी मुद्रा विनिमय बाजार में नये वर्ष के पहले कारोबारी सत्र में अमेरिकी मुद्रा डॉलर के मुकाबले रुपया गिरावट के साथ 82.75 प्रति डॉलर पर रहा. वजह, कच्चे तेल की कीमत बढ़त की ओर होने और विदेशी पूंजी की बाजार से निकासी के कारण निवेशकों की धारणा प्रभावित होने से रुपये में गिरावट आई. भारतीय रिजर्व बैंक ने 1 दिसंबर को डिजिटल रुपये की शुरुआत की, जिसे केंद्रीय बैंक की डिजिटल मुद्रा (सीबीडीसी) के नाम से भी जाना जाता है. 

नकली करेंसी का चलन
आरबीआई ने चार अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों को डिजिटल रुपये का प्रायोगिक परीक्षण करने के लिए अधिकृत किया है. भुगतान के लिए नकदी जमा करने के बजाय लोग व्यक्तियों और संस्थाओं के साथ डीआर से अपना हिसाब करने में सक्षम होंगे. इसके माध्यम से यह कोशिश होगी कि नकली करेंसी को बाजार में कम किया जा सके. यह एक अच्छी पहल है जिससे कारोबारी लेनदेन में कोई दिक्कत न रहे. देश में नकली भारतीय करेंसी नोटों का चलन नोटबंदी के बाद काबू नहीं किया जा सका है. नेशनल क्राइम कंट्रोल ब्यूरो की एक रिपोर्ट के अनुसार, नोटबंदी के बाद देश में 245.33 करोड़ रुपये के नकली नोटों जब्त किये जा चुके हैं. आरबीआई की 2021-22 की वार्षिक रिपोर्ट से पता चलता है कि पिछले वर्ष की तुलना में 500 और 2,000 रुपये मूल्यवर्ग के पकड़े गए नकली नोटों में दोगुना बढ़ोत्तरी हुई है. 

गंभीर संकट में देश
वैश्विक आर्थिक संकटों के बीच हमारे देश के लिए यह सुखद है कि राजस्व वसूली बढ़ी है मगर देश के लोगों की भोजन के लिए सरकार पर निर्भरता यह संकेत देती है कि देश गंभीर संकट के दौर में है. 81 करोड़ लोग सरकार से मिलने वाले मुफ्त अनाज के सहारे जीवन जीने को विवश हैं. मनरेगा मजदूरों को हम न काम दे पा रहे हैं और न ही उनकी दिहाड़ी. बेरोजगारी लगातार बढ़ रही है, जो हमारी नाकामी को दर्शाती है. ऐसे में अर्थव्यवस्था के आंकड़े कुछ पूंजीपतियों के सहारे अच्छे दिखते हैं जबिक उन पूंजीपतियों का कारोबार सार्वजनिक संपत्तियों और नीतियों के कारण है. ऐसे में वास्तविक जरूरत समान प्रतिस्पर्धा और रोजगार के अधिकतम अवसर पैदा करने की है. अगर ऐसा होता है, तभी प्राप्तियां और खर्च में सही संतुलन बन पाएगा. यदि ऐसा हुआ तभी मंदी के दौर में भी भारत अडिग खड़ा रहेगा.


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