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डॉ. बिबेक देबरॉय के साथ एक युग का हो गया अंत, अपने पीछे छोड़ गए एक नई विरासत

1 नवंबर को हमने सिर्फ एक विद्वान को ही नहीं बल्कि एक मार्गदर्शक और एक सहयोगी को भी खो दिया. बिबेक देबरॉय का निधन हमारे लिए एक अपूरणीय क्षति है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 2 years ago

डॉ. बिबेक देबरॉय जैसे लोग बहुत ही कम होते हैं, जो इतना बड़ा और हमेशा याद रहने वाला योगदान छोड़ते हैं. कुछ लोग उन्हें पद्मश्री सम्मान प्राप्त करने वाले, एक बेहतरीन लेखक, और एक ऐसे अर्थशास्त्री के रूप में याद करेंगे, जो संस्कृत और प्राचीन ग्रंथों का गहरा ज्ञान रखते थे. लेकिन हमारे लिए, जिन्हें उनसे सीखने का मौका मिला, बिबेक दा सिर्फ एक चेयरमैन या सलाहकार नहीं थे; वे सच्चे गुरु, एक मार्गदर्शक थे. अपने गुरु का भारत के विकास और सांस्कृतिक धरोहर में असाधारण योगदान को याद कर, उनके बिना गहरी उदासी महसूस हो रही है, एक दुख जो हमेशा मेरे साथ रहेगा. इस दुख के साथ, मैं उनकी बातों और प्रेरणा को भी अपने साथ रखूंगा, जो हमें भारत के विकास और बेहतर भविष्य की कल्पना करने के लिए प्रेरित करती है.

एक अर्थशास्त्री के रूप में, उन्होंने वर्तमान नीति की दिशा बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, उन्होंने 2017 से लेकर अपने निधन तक प्रधानमंत्री कार्यालय के आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष के रूप में सेवा की. उनके शब्दों ने उनसे बातचीत करने वालों में ज्ञान का संचार किया, और उन्होंने अपने गहरे विचारों को सभी के साथ साझा किया, खासकर युवा सोच वाले लोगों के साथ, जिनसे वे हमेशा प्रेरित होते थे. उनके आर्थिक विचार भारत की वृद्धि और विकास की दिशा से परे थे, एक विषय जिस पर उन्होंने हमेशा जोर दिया, और उन्होंने राज्य सरकारों की महत्वपूर्ण भूमिका को उजागर किया. उन्हें विश्वास था कि राज्य स्तर पर केंद्रित दृष्टिकोण विकासात्मक चुनौतियों का प्रभावी ढंग से समाधान करने और भारत के विकसित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ने के लिए जरूरी है.

यह उनके योगदान में भी दिखता है, जब उन्होंने भारत की प्रतिस्पर्धा रोडमैप के एक महत्वपूर्ण स्टीयरिंग समिति सदस्य के रूप में काम किया. उन्होंने यह बताया कि असली आर्थिक प्रतिस्पर्धा व्यवसायों और सरकार की नीतियों से बने व्यापक ढांचे से आती है. उनके अनुसार, असली प्रगति के लिए सुधारों और भारत के विभिन्न क्षेत्रों की गहरी समझ जरूरी है. उनका दृष्टिकोण स्पष्ट था: भारत की विकास की दिशा को बेहतर बनाने के लिए, सभी क्षेत्रों में उत्पादकता बढ़ानी होगी और हर राज्य की विशेषताओं को समझना होगा. उन्होंने कहा कि राज्यों को खास उद्योगों को प्रोत्साहन देने के बजाय एक ऐसा माहौल बनाना चाहिए जो सभी के लिए फायदेमंद हो. डॉ. देबरॉय ने अक्सर इस बात पर चर्चा की कि आधुनिक प्रतिस्पर्धा में ऐसे तरीकों को बदलने की जरूरत है. इसलिए, हर राज्य को अपनी ताकतों को पहचानकर उत्पादकता बढ़ाने के लिए सही माहौल तैयार करना चाहिए.

उनके आर्थिक विचारों ने दशकों तक सार्वजनिक नीति की चर्चा को आकार दिया, लेकिन उनकी बौद्धिक विरासत उनके गहरे जुनून से भी जुड़ी हुई थी, जिसे उन्होंने भारत की सांस्कृतिक धरोहर को समृद्ध करने के लिए अपनाया. उन्होंने महाभारत का संपूर्ण अनुवाद दस खंडों में किया और उसके बाद वाल्मीकि रामायण का अनुवाद तीन खंडों में किया, जो पेंगुइन क्लासिक्स के लिए था. उन्होंने इन प्राचीन ग्रंथों को विद्वता और कहानीकार के अंदाज में प्रस्तुत किया, जिससे उनके गहरे दर्शन को बरकरार रखते हुए इन्हें युवाओं के लिए भी सुलभ बना दिया. यह उनके उस दृढ़ संकल्प को दर्शाता है, जो हमारी प्राचीन ज्ञान को आधुनिक पाठकों तक पहुंचाने के लिए था, उनका यह कार्य हमारी सांस्कृतिक धरोहर की समृद्धि का प्रमाण है. 

अपने करियर में मैंने बिबेक दा के साथ अक्सर ऐसे चर्चाओं में भाग लिया है, जिनमें रहने योग्य और समावेशी शहर बनाने की जरूरत पर बात होती थी. शहरीकरण पर हमारी बातचीत से मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला और उनके समाज सुधार और भारत में बेहतर जीवन स्तर के लिए उनके दृष्टिकोण को समझने का मौका मिला. मैं हमेशा उनके इस समर्पण से प्रभावित रहा हूँ कि वे सभी निवासियों के जीवन को बेहतर बनाने वाले जीवंत शहरी वातावरण बनाने के प्रति कितने प्रतिबद्ध थे. अपनी किताब "द एज ऑफ अवेकनिंग" की प्रस्तावना और 2047 के लिए भारत प्रतिस्पर्धात्मकता रोडमैप में उन्होंने अक्सर "Citius, Altius, Fortius" (तेज़, ऊँचा, मज़बूत) के नारे का जिक्र किया. यह इस बात को रेखांकित करता है कि हमारे राष्ट्रीय सफर में प्रगति कितनी महत्वपूर्ण है. उनका मानना था कि हमें उत्कृष्टता प्राप्त करने के लिए निरंतर प्रयास करना चाहिए, और यह उत्कृष्टता सही समय पर रणनीतिक कदम उठाने से ही संभव है.

उनके साथ मेरा आखिरी सहयोग किताब "ज्योतिर्लिंगम" में था, जिसे पेंगुइन ने सितंबर 2024 में प्रकाशित किया. हालांकि हमें इस काम को औपचारिक रूप से लॉन्च करने का मौका नहीं मिला, लेकिन इस यात्रा में हमने शिव के बारे में अपने विचार साझा किए और अध्यात्म पर अपने व्यक्तिगत अनुभवों और समझ को खोजा, यह अनुभव मेरे लिए जीवन बदलने वाला था. विषय के प्रति उनकी गहरी समझ और जुनून ने इस किताब को साथ में लिखने की हमारी राह को रोशन किया.

बिबेक दा, आपको खोना मेरे लिए केवल व्यक्तिगत क्षति नहीं है, बल्कि मैंने अपने गुरु को खो दिया है—एक अद्वितीय मार्गदर्शक, जिसने हमें बौद्धिक रूप से प्रेरित किया और हमारे दिलों और दिमागों को छू लिया. उनके साथ काम करने का सम्मान पाने वाले सभी के लिए, बिबेक दा का जाना सिर्फ एक विदाई नहीं है; यह एक भावुक याद दिलाता है कि सच्चा प्रभाव उस प्यार और सम्मान से मापा जाता है जो किसी के जाने के बाद भी बना रहता है.

अपने अंतिम कॉलम में, जो उनके निधन के बाद प्रकाशित हुआ, उन्होंने लिखा कि उनका जाना एक व्यक्तिगत नुकसान होगा, न कि सामाजिक. जब मैं अपने प्रिय मित्र के जाने का दुख मना रहा हूं, तो यह कहना दुखदायी है कि उन्होंने अपनी अनुपस्थिति से जो गहरा खालीपन छोड़ा है, उसे बहुत कम आंका. हमारा दुख, आखिरकार, प्यार है जो लगातार बना रहता है—उनकी बुद्धि, आदर्शों, और मार्गदर्शन के लिए, साथ ही जिस तरह से उन्होंने हमें बेहतर विचारक और भारत के विकास यात्रा में अधिक जिम्मेदार योगदानकर्ता बनाया.

जब तक हमारी अगली मुलाकात नहीं होती, आप पवित्र ज्योतिर्लिंग में मिल गए हैं. आपकी यात्रा एक गहरा याद दिलाती है कि हमारी संस्कृति में मृत्यु अंत नहीं है. यह बस एक बदलाव है, एक शारीरिक रूप को छोड़ना, और उसी मुक्ति में असली स्वतंत्रता है. शिव की तरह, जो विनाश और पुनर्जन्म के चक्र को व्यक्त करते हैं, आपकी आत्मा, विचार, और विचारधाराएं मेरे समझ को रोशन करते रहेंगे, मुझे गहरी स्पष्टता और मुक्ति की ओर मार्गदर्शन करते रहेंगे. जब तक हम फिर से नहीं मिलते, मैं उस ज्ञान को साझा करूंगा जो आपने उदारता से दिया है, क्योंकि आपकी आत्मा जीवित है. मैं आपके शिक्षाओं को आगे बढ़ाऊंगा और अपने प्रयासों और सेवाओं के माध्यम से आपकी याद को सम्मानित करने की कोशिश करूंगा. ओम नमः शिवाय.

(अतिथि लेखक- अमित कपूर, अध्यक्ष और सीईओ, भारत काउंसिल ऑन कॉम्पेटिटिवनेस)


 


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