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कृतज्ञता, विरासत और उद्देश्य में अंकित एक मील का पत्थर

आज जब मैं अपनी पहली पुस्तक, “Perils of the Health Infodemic,” को प्रस्तुत करने के लिए आगे बढ़ रहा हूं, तो यह क्षण अत्यंत गहन और अर्थपूर्ण प्रतीत होता है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 9 months ago

2026 की शुरुआत वास्तव में अत्यंत रोमांचक रही है, सिर्फ इसलिए नहीं कि एक पुस्तक पूरी होकर प्रकाशित हुई है, बल्कि इसलिए कि यह मेरे जीवन और पेशेवर यात्रा के सबसे अर्थपूर्ण मील के पत्थरों में से एक के अनावरण का प्रतीक है.
पूरी विनम्रता और ईमानदारी के साथ, मैं यह पुस्तक अपने माता-पिता को समर्पित करता हूं, जो मेरी शक्ति, सहनशीलता और उद्देश्य के शाश्वत स्रोत रहे हैं.

मेरी माता, स्वर्गीय श्रीमती संध्या श्रीवास्तव अडिग सहनशीलता, निःस्वार्थ प्रेम और आत्मिक प्रार्थना की एक शांत प्रतिमूर्ति थीं. वह शायद मेरी पत्नी दिव्या के अलावा एकमात्र ऐसी आत्मा थीं, जो निरंतर और मौन रूप से मेरे कल्याण, समृद्धि और सफलता के लिए प्रार्थना करती रहीं. मुझ पर उनका विश्वास आज भी, उनकी शारीरिक अनुपस्थिति में भी, मेरा मार्गदर्शन करता है.

मेरे पिता, स्वर्गीय प्रो. रमेश चंद्र श्रीवास्तव, जिनका जीवन शिक्षण के प्रति उनके प्रेम और ज्ञान के प्रसार के उनके मिशन में गहराई से रचा-बसा था. संविदा विधि (Law of Contract) के प्रति उनका जुनून ही वह प्रेरक शक्ति बना, जिसने उन्हें अपने सत्तर के दशक के उत्तरार्ध में एक पुस्तक लिखने के लिए प्रेरित किया. कैंसर (मल्टीपल मायलोमा) से जूझते हुए भी वे अपने उद्देश्य से कभी विचलित नहीं हुए. उन्होंने अपना महाग्रंथ, “Principles of Law of Contract,” पूर्ण किया, जो Bloomsbury द्वारा प्रकाशित किए जाने योग्य एक उत्कृष्ट कृति है. उनकी अंतिम इच्छा अपने छात्रों, न्यायपालिका और परिवार के लिए एक विरासत छोड़ जाने की रोग से उनका देहांत होने से ठीक पहले पूरी हो गई. वह क्षण आज भी मेरे लिए साहस, प्रतिबद्धता और योगदान की परिभाषा तय करता है.

जीवन का हर चरण एक मील का पत्थर होता है. मेरे लिए, हर दिन एक मील का पत्थर है.

अब जब मैं अपनी दूसरी पुस्तक, “Patience of a Patient,” पर काम शुरू कर रहा हूं, जो स्वास्थ्य सेवा में मेरे लगभग तीन दशकों के अनुभव और 5,000 से अधिक मरीजों व परिवारों के साथ मेरी बातचीत और मार्गदर्शन से प्रेरित है, तो मैं गहराई से आत्मचिंतन करता हूं. हर पेशेवर उपलब्धि और व्यक्तिगत कृतज्ञता का हर क्षण मुझे जीवन को और सुंदर दृष्टि से देखने की सीख देता है. यह पूछने के लिए कि हमें कैसे याद किया जाएगा, और हम कौन-सी विरासत छोड़ जाएंगे.

अपने माता-पिता से मैंने जो सीखा है, वह सरल होते हुए भी अत्यंत गहन है:

कभी हार न मानें.
अंतिम क्षण तक कर्मशील बने रहें.
लगातार योगदान करते रहें हमेशा, और हमेशा सकारात्मक रूप से.

क्योंकि आपकी यात्रा स्वयं आपकी प्रेरणा बन जाती है. और मील के पत्थर और भी अनेक हमेशा आपकी प्रतीक्षा करेंगे, जब तक आप जीवन नामक इस मार्ग पर प्रेम और जुनून के साथ आगे बढ़ते रहेंगे.

इस यात्रा ने मुझे कुछ सबक सिखाए हैं:
आप सभी को खुश नहीं रख सकते. हर कर्म सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रकार की प्रतिक्रियाएं लाता है. वास्तव में मायने यह रखता है कि आप किस पक्ष को चुनते हैं. यदि आपके दिए गए प्रेम का प्रतिदान हमेशा न मिले, तो निराश न हों. आपकी वास्तविक जिम्मेदारी स्वीकृति नहीं कर्म है. आगे बढ़ते रहें. बड़े मील के पत्थरों की ओर निर्माण करते रहें.

युवा पीढ़ी के लिए एक शब्द मेरे पिता के जीवन के उत्तरार्ध से गहराई से प्रेरित:
आप कई काम करना पसंद कर सकते हैं, लेकिन अपना समय उन लोगों या गतिविधियों पर व्यर्थ न करें जो वास्तव में मायने नहीं रखते. आपके पास केवल एक जीवन है. इसे उद्देश्य के साथ जिएं. व्यक्तिगत और पेशेवर मील के पत्थरों के बीच संतुलन बनाएं, लेकिन हर क्षण को ऐसे जिएं जैसे वही आपका अंतिम क्षण हो. हर पल अनमोल है, इसे पूरी तरह जिएं.

मैंने अपने पिता के जीवन के अंतिम दस वर्षों को बहुत निकट से देखा. कैंसर से जूझते हुए भी, उन्होंने अपने हर जाग्रत क्षण को उसी कार्य में लगाया जिसे वे सबसे अधिक प्रेम करते थे. अपने छात्रों को ज्ञान प्रदान करना. यदि कक्षाओं में नहीं, तो फोन पर अक्सर दिन में 10–12 घंटे. वे अपनी पुस्तक को पूरा करने में पूरी तरह डूबे रहे, जो उनके अंतिम वर्षों की आधारशिला बनी और जिसके माध्यम से उन्होंने एक असाधारण विरासत को दर्ज किया 3,000 से अधिक न्यायाधीशों को आकार देने और 10,000 से अधिक विधि छात्रों के जीवन को प्रभावित करने वाली विरासत.

मैं स्वयं को जीवन के इस विशाल तालाब में एक बहुत छोटी मछली मानता हूं. जो कुछ भी मैंने हासिल किया है, वह परिश्रम, दृढ़ता और हर दिए गए क्षण के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण से संभव हुआ है. मैं अभी भी इस तालाब में तैरना सीख रहा हूं. लेकिन यदि मुझे याद किया जाए, तो एक ऐसे तैराक के रूप में, जिसने कभी हार नहीं मानी, जिसने रिकॉर्ड तोड़ने का प्रयास किया, जिसने कुछ परीक्षाएं पास कीं और कई में असफल रहा, फिर भी हर सफलता और हर असफलता को गर्व, गरिमा और ईमानदारी के साथ जिया.

सबसे बढ़कर, मैं अपने माता-पिता द्वारा छोड़ी गई विरासत को आगे बढ़ाना चाहता हूं, अपने पुत्र सिद्धांत, अपनी पुत्री सिद्धि, और उन सभी के लिए जिनके साथ मैं काम करता हूं और जिनके साथ जीवन साझा करता हूं. जीवन ईश्वर का एक अनमोल उपहार है, जिसे पूरी ऊर्जा, जुनून और उद्देश्य के साथ जिया जाए तभी वह जीने योग्य बनता है.

डॉ. स्वदीप श्रीवास्तव, अतिथि लेखक
(डॉ. स्वदीप HEAL Foundation के संस्थापक; HEAL HEALTH CONNECT के संस्थापक एवं मेंटर हैं. वे Pacific OneHealth के सह-संस्थापक और अध्यक्ष भी हैं.)

 


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