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राजनीतिक दलों की कमाई के इस सोर्स पर सुप्रीम कोर्ट ने चलाई कैंची, कही ये बात
2018 में बनाई गई इस योजना के तहत कोई भी ईकाई इस बॉन्ड को खरीद सकती है. इन बॉन्ड को वही पार्टी या राजनीतिक दल स्वीकार कर सकता था जिसे पिछले चुनाव में एक प्रतिशत वोट मिले हों.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 2 years ago
जल्द ही लोकसभा चुनाव का ऐलान हो सकता है लेकिन उससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्टोरल बॉन्ड को लेकर बड़ा फैसला लिया है. कोर्ट ने इसे असंवैधानिक बताया है और कहा है कि वोटर का अधिकार है कि वो जाने कि आखिर देश की पार्टियों को फंडिंग कौन कर रहा है. सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी बॉन्ड स्कीम को अवैध बताते हुए इस पर रोक लगा दी है. कोर्ट ने ये भी कहा कि ये सूचना के अधिकार का उल्लंघन है.
सुप्रीम कोर्ट ने इस पर और क्या कहा
सुप्रीम कोर्ट ने इस योजना को असंवैधानिक बताते हुए चुनाव आयोग से पिछले पांच सालों में राजनीतिक दलों को की गई फंडिंग की जानकारी भी मांग ली है. साथ ही चुनाव आयोग को पिछले पांच सालों की जानकारी एसबीआई से जुटाकर अपनी वेबसाइट पर डालने को कहा है, जिससे लोगों को ये पता चल सके कि आखिर किस राजनीतिक दल को किसने कितना चंदा दिया. इस फैसले को इंडस्ट्री के लिए भी एक झटका माना जा रहा है.
आखिर क्यों लाई गई थी ये योजना
राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे में पारदर्शिता लाने के मकसद से इस योजना को लाया गया था. 2018 में तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इस योजना को लेकर एक अहम बयान भी दिया था. उन्होंने कहा था कि इलेक्टोरल बॉन्ड की योजना चुनावों में होने वाली फंडिंग में पारदर्शिता लाने के लिए लाई गई है.
आखिर क्या होते हैं इलेक्टोरल बॉन्ड?
राजनीतिक दलों को दिए जाने वाले चंदे में पारदर्शिता लाने के मकसद से इलेक्टोरल बॉन्ड की ये योजना लाई गई थी. इसके जरिए कोई भी व्यक्ति, कॉर्पोरेट और अन्य संस्थाएं बॉन्ड खरीदकर राजनीतिक दलों को चंदा दे देती थी और राजनीतिक दल इस बॉन्ड को भुनाकर रकम हासिल कर सकते थे. इस योजना के अंतर्गत एसबीआई की 29 शाखाओं को अधिकृत किया गया था. इनमें दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई गांधीनगर, चंडीगढ़, पटना, रांची, गोवाहाटी, भोपाल, जयपुर और बेंगलुरु शामिल थे.
इसकी खूबी पर सुप्रीम कोर्ट ने उठाया सवाल
इस इलेक्टोरल बॉन्ड में कोई भी डोनर अपनी पहचान छिपाते हुए एक करोड़ रुपये तक मूल्य के इलेक्टोरल बॉन्ड खरीदकर सरकार को डोनेट कर सकता है. इसका फायदा ये भी था कि इसमें पहचान छिपने के साथ साथ टैक्स में भी राहत मिल जाती है. लेकिन इसकी शर्त यही थी कि ये उन्हीं राजनीतिक दलों को दिए जा सकते थे जो पिछले विधानसभा या लोकसभा चुनाव में 1 प्रतिशत वोट लाए हों.
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