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विश्व MSME दिवस: डिजिटल, निर्यात और नवाचार के दम पर बदल रही भारत के छोटे कारोबारों की तस्वीर

भारतीय MSME क्षेत्र पहले की तुलना में अधिक डिजिटल, अधिक संगठित, अधिक महत्वाकांक्षी और वैश्विक बाजारों से जुड़ा हुआ बन रहा है.

रितु राणा 3 months ago

भारत का MSME (सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम) क्षेत्र आज एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है. पारंपरिक और स्थानीय स्तर तक सीमित रहने वाले छोटे कारोबार अब डिजिटल तकनीक, ई-कॉमर्स, निर्यात और वैश्विक बाजारों की मदद से नई ऊंचाइयों तक पहुंच रहे हैं. देश के करीब 6 करोड़ MSME भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन चुके हैं और लगभग 1 ट्रिलियन डॉलर का आर्थिक मूल्य सृजित करते हैं, जो देश की जीडीपी में करीब 30 प्रतिशत योगदान देता है. विश्व MSME दिवस के अवसर पर भारतीय MSME क्षेत्र में उभरते कुछ प्रमुख रुझान छोटे कारोबारों की बदलती तस्वीर को स्पष्ट करते हैं. तो आइए इस रिपोर्ट पर एक नजर डालते हैं.

भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूत नींव बने MSME

देश के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम रोजगार, उत्पादन और निर्यात के प्रमुख स्रोत बन चुके हैं. MSME क्षेत्र न केवल लाखों परिवारों की आय का आधार है, बल्कि देश की आर्थिक वृद्धि को भी गति दे रहा है. उद्यम पोर्टल पर पंजीकृत MSME की संख्या 6.8 करोड़ से अधिक हो चुकी है, जो वर्ष 2025 की शुरुआत की तुलना में 18 प्रतिशत अधिक है. यह दर्शाता है कि यह क्षेत्र पहले की तुलना में अधिक संगठित और औपचारिक होता जा रहा है.

निर्यात और विनिर्माण में रिकॉर्ड बढ़ोतरी

पिछले पांच वित्तीय वर्षों में MSME निर्यात तीन गुना बढ़कर 12 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है. वर्तमान में देश के कुल निर्यात में इस क्षेत्र की हिस्सेदारी लगभग 46 प्रतिशत है. भारत का विनिर्माण क्षेत्र वैश्विक बाजार में अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज करा रहा है. छोटे शहरों के उद्यमी अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं. अशिर्वाद ओवरसीज के महेंद्र केवलानी ने छोटे शहर से निर्यात आधारित कारोबार स्थापित किया और ई-कॉमर्स की मदद से वैश्विक बाजारों तक पहुंच बनाई. वहीं, डॉगसी च्यू के संस्थापक भूपेंद्र खानाल ने हिमालयी याक के दूध से बनने वाले चुरपी उत्पाद को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई. हिमालय के 125 गांवों से प्राप्त प्राकृतिक सामग्री पर आधारित यह ब्रांड आज 30 से अधिक देशों में मौजूद है और लगभग 260 करोड़ रुपये का वार्षिक कारोबार कर रहा है.

ई-कॉमर्स बना विकास का नया इंजन

भारत का ई-कॉमर्स बाजार आने वाले वर्षों में MSME के लिए बड़ा अवसर बनकर उभर रहा है. अनुमान है कि वर्ष 2030 तक देश का ई-कॉमर्स बाजार 70-80 अरब डॉलर से बढ़कर 180-200 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है. विशेषज्ञों का मानना है कि इस अतिरिक्त वृद्धि में लगभग आधा योगदान MSME क्षेत्र का होगा. डिजिटल प्लेटफॉर्म और ऑनलाइन मार्केटप्लेस छोटे कारोबारों को सीधे ग्राहकों तक पहुंचने का अवसर दे रहे हैं.

हस्तशिल्प और पारंपरिक कारोबार को मिली नई पहचान

भारतीय कारीगर अर्थव्यवस्था भी डिजिटल बदलाव का लाभ उठा रही है. पूर्व विज्ञापन पेशेवर अनिंदिता चौधरी ने पुणे में इकोसर्व इंडिया की स्थापना की. यह उद्यम कौना, शीतलपाटी, बांस, वाटर हायसिंथ, सुपारी के पत्तों और जूट जैसी प्राकृतिक सामग्रियों से उत्पाद तैयार करता है और लगभग 30 कारीगरों को रोजगार देता है. साथ ही इकोसर्व इंडिया प्राकृतिक फाइबर आधारित उत्पादों के माध्यम से सिंगल-यूज प्लास्टिक का टिकाऊ विकल्प उपलब्ध करा रही है. वहीं, मनु गुलाटी द्वारा स्थापित लूप्स एन नॉट्स अब ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए वैश्विक ग्राहकों तक पहुंच बना चुका है. इससे स्पष्ट होता है कि डिजिटल बाजार भारतीय हस्तशिल्प को नई पहचान दे रहे हैं.

फूड प्रोसेसिंग और होमवेयर सेक्टर में बढ़े अवसर

फूड प्रोसेसिंग क्षेत्र में सूक्ष्म और लघु उद्यमों को मिलने वाला ऋण मध्यम उद्यमों की तुलना में अधिक तेजी से बढ़ा है. इससे इस क्षेत्र में वित्तीय संस्थानों का बढ़ता भरोसा दिखाई देता है. मध्य प्रदेश के आनंद कश्यप ने इंजीनियरिंग का करियर छोड़कर ऑर्गेनिक आनंद की स्थापना की. स्थानीय किसानों से प्राप्त सामग्री से बने अचार, पापड़ और पारंपरिक खाद्य उत्पादों के जरिए उनका कारोबार शुरू हुआ. बाद में प्रशिक्षण और बाजार तक पहुंच मिलने के बाद उनका मासिक कारोबार 10 लाख रुपये से अधिक हो गया. लवली बबीश की बीटरूट्स इको लिविंग ने अपसाइकिल किए गए नारियल के खोल और प्राकृतिक सामग्रियों से बने उत्पादों के जरिए 25 गुना वृद्धि दर्ज की.

महिला उद्यमिता तेजी से बढ़ रही

महिला उद्यमी भारतीय MSME क्षेत्र की नई ताकत बनकर उभर रही हैं. प्रेरणा अग्रवाल की समाख्या सस्टेनेबल अल्टरनेटिव्स तीन हजार से अधिक कारीगरों और पशुपालकों के नेटवर्क के साथ काम करती है और टिकाऊ वस्त्र तथा लाइफस्टाइल उत्पाद तैयार करती है. अरुणा दारा की अपना ग्रीन प्रोडक्ट्स ने पांच राज्यों में 13 उत्पादन इकाइयां स्थापित कर करीब 300 महिलाओं को रोजगार दिया है. इकोसर्व इंडिया में काम करने वाले कारीगरों में लगभग 90 प्रतिशत महिलाएं हैं. एक रिपोर्ट के अनुसार, महिलाओं का डिजिटल मैच्योरिटी इंडेक्स 57.4 है, जबकि पुरुषों का 57.7. यह बताता है कि डिजिटल क्षमता के मामले में लैंगिक अंतर तेजी से कम हो रहा है. 

डिजिटलीकरण की रफ्तार अभी भी चुनौती

हालांकि MSME क्षेत्र में डिजिटल बदलाव तेजी से हो रहा है, लेकिन यह समान रूप से नहीं बढ़ रहा है. भारत का डिजिटल मैच्योरिटी इंडेक्स 2023 में 56.6 से बढ़कर 2025 में 58.0 हो गया है. इसके बावजूद केवल 12 प्रतिशत MSME ही पूर्ण डिजिटल परिपक्वता हासिल कर पाए हैं.  यह आंकड़ा दर्शाता है कि छोटे कारोबारों के सामने अभी भी तकनीकी क्षमता और डिजिटल अपनाने की चुनौती मौजूद है.

वॉलमार्ट वृद्धि कार्यक्रम की अहम भूमिका

वर्ष 2019 से वॉलमार्ट वृद्धि कार्यक्रम देशभर के 1.15 लाख से अधिक MSME को डिजिटल क्षमताएं, व्यावसायिक कौशल और बाजार तक पहुंच उपलब्ध कराने में मदद कर चुका है. वॉलमार्ट के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट, जनरल मर्चेंडाइजिंग एंड फैशन सोर्सिंग, अवनीश गुप्ता ने कहा, "भारत का जीवंत नवाचार इकोसिस्टम और यहां के MSME की विकास क्षमता हमें लगातार प्रेरित करती है. अनेक सूक्ष्म उद्यमों को आगे बढ़ने के लिए आवश्यक जानकारी, आधुनिक उपकरणों और बाजार तक पहुंच हासिल करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है. इन उद्यमियों को महत्वपूर्ण व्यावसायिक कौशल और बाजार तक पहुंच उपलब्ध कराकर हमने उन्हें अपने कारोबार को टिकाऊ तरीके से स्थापित करने और उसका विस्तार करने में मदद की है."

निष्कर्ष

भारतीय MSME क्षेत्र पहले की तुलना में अधिक डिजिटल, अधिक संगठित, अधिक महत्वाकांक्षी और वैश्विक बाजारों से जुड़ा हुआ बन रहा है. विनिर्माण और निर्यात, डिजिटल कारोबार, महिला उद्यमिता, फूड प्रोसेसिंग और सस्टेनेबिलिटी जैसे पांच प्रमुख रुझान आने वाले वर्षों में देश के छोटे कारोबारों की दिशा तय करेंगे.

विश्व MSME दिवस पर यह स्पष्ट दिखाई देता है कि भारत के छोटे कारोबार अब केवल स्थानीय बाजारों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे वैश्विक स्तर पर अपनी नई पहचान बनाने की ओर तेजी से आगे बढ़ रहे हैं.
 


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