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महंगाई के नाम पर फिर सख्ती दिखाएगा RBI या इस बार पूरी होगी सस्ते कर्ज की आस?

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मॉनेटरी पॉलिसी कमिटी की तीन दिवसीय बैठक का कल अंतिम दिन है. इसमें नीतिगत ब्याज दरों पर फैसला लिया जाएगा.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 2 years ago

पिछले काफी समय से नीतिगत ब्याज दरों में कमी की उम्मीद लगाई जा रही है, लेकिन अब तक यह पूरी नहीं हो पाई है. दरअसल, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने कई समीक्षा बैठकों में रेपो रेट को यथावत रखने का फैसला लिया है, जिसकी वजह से महंगाई के मौसम में लोन सस्ता होने की उम्मीद  परवान नहीं चढ़ पाई है. अब देखने वाली बात यह होगी कि क्या कल भी RBI रेपो रेट को यथावत रखता है या उसमें कोई कमी की जाएगी.   

इस वजह से उम्मीद कम
भारतीय रिजर्व बैंक की 6 सदस्यों वाली मॉनेटरी पॉलिसी कमिटी (MPC) की तीन दिवसीय बैठक 8 अगस्त को खत्म हो रही है. इसी दिन बैठक में किए गए फैसलों की जानकारी दी जाएगी. एक्सपर्ट्स का मानना है कि रेपो रेट में कमी की उम्मीद बेहद कम है. खाद्य महंगाई से जुड़े जोखिम को लेकर RBI नीतिगत ब्याज दरों को लेकर सतर्क रुख अपना सकता है. मौसमी कारणों के चलते खाद्य महंगाई (Food Inflation) के बढ़ने का दबाव बना हुआ है. इसलिए संभावना कम है कि RBI सस्ते लोन की दिशा में कोई कदम उठाए. 

8 बार से बदलाव नहीं
आरबीआई ने मई 2022 से फरवरी 2023 के बीच रेपो रेट में 2.5 प्रतिशत इजाफा करके इसे 6.5 प्रतिशत कर दिया था. इसके बाद से हुईं MPC की पिछली आठ बैठकों में ब्याज दर में किसी तरह का बदलाव नहीं किया है. बता दें कि रेपो रेट (Repo Rate) वह दर होती है, जिस पर आरबीआई बैंकों को कर्ज देता है. वहीं, रिवर्स रेपो रेट उस दर को कहते हैं जिस पर बैंकों को आरबीआई के पास पैसा रखने पर ब्याज मिलता है. जब रेपो रेट में बढ़ोत्तरी होती है, तो बैंकों के लिए कर्ज महंगा हो जाता है और वो ग्राहकों के कर्ज को भी महंगा कर देते हैं. यानी वह अपना बढ़ा बोझ ग्राहकों पर लाद देते हैं. बैंक केवल नए लोन ही महंगे नहीं करते, बल्कि पुराने लोन भी महंगे कर देते हैं, जिससे आपकी EMI बढ़ जाती है.

क्या है RBI की जिम्मेदारी?
आरबीआई को केंद्र की तरफ से खुदरा महंगाई दो प्रतिशत घट-बढ़ के साथ चार प्रतिशत पर बनाए रखने की जिम्मेदारी मिली हुई है. चढ़ते दामों के चलते RBI को 2022-23 में शर्मसार होना पड़ा था. अब तक के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ था कि RBI को महंगाई नियंत्रित न करने पाने के लिए सरकार को स्पष्टीकरण देना पड़ा. दरअसल, रिजर्व बैंक अधिनियम के तहत अगर महंगाई के लिए तय लक्ष्य को लगातार तीन तिमाहियों तक हासिल नहीं किया जाता, तो RBI को केंद्र सरकार के समक्ष स्पष्टीकरण देना होता है. उसे बताना होता है कि महंगाई नीचे नहीं आने के क्या कारण है और उसने अब तक क्या कदम उठाए हैं.


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