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नीतिगत ब्याज दरों पर RBI का फैसला शेयर बाजार को क्यों नहीं आया पसंद?

आरबीआई ने एक बार फिर सस्ते कर्ज की उम्मीद को झटका देते हुए रेपो रेट को यथावत रखा है, इससे शेयर बाजार में गिरावट आई है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 2 years ago

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के नीतिगत ब्याज दरों में बदलाव न करने के फैसले से शेयर बाजार नाखुश है. यह लगातार 9वां मौका है जब RBI ने रेपो रेट को यथावत रखा है. बाजार को उम्मीद थी कि महंगाई के मोर्चे पर आंकड़ों में आए सुधार के मद्देनजर रिजर्व बैंक नीतिगत ब्याज दरों में कुछ राहत दे सकता है. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. लिहाजा उम्मीद के टूटने के साथ ही बाजार में गिरावट तेज हो गई.    

दबाव में हैं ये इंडेक्स
RBI द्वारा रेपो रेट में कोई बदलाव न किए जाने से बैंक, ऑटो, फाइनेंशियल सर्विसेज और रियल्टी इंडेक्स दबाव में हैं. इनके अधिकांश शेयरों में लाली छाई हुई है. यदि केंद्रीय बैंक नीतिगत ब्याज दरों में कमी करता, तो लोन सस्ते होने का रास्ता खुलता. ऐसे में इन सेक्टर्स को अच्छा फायदा होता, जिसकी संभावना फिलहाल खत्म हो गई है. इस वजह से  उनके इंडेक्स दबाव में दिखाई दे रहे हैं. 

पहले से महंगा है लोन
पिछले काफी समय से रेपो रेट में कमी की आस लगाई जा रही है, क्योंकि RBI पहले ही कई बार इसमें इजाफा करके लोन महंगा कर चुका है. लोन महंगा होने से लोगों की परचेजिंग पावर सीमित हुई है और इन सेक्टर्स तक आने वाले धन का फ्लो प्रभावित हुआ है. इसलिए इन्हें रिजर्व बैंक का यह फैसला पसंद नहीं आया है. वैसे, ये कुछ हद तक पहले ही स्पष्ट था कि इस बार भी नीतिगत ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा.

ऐसा है पूरा गणित
चलिए अब रेपो रेट न घटाने के पीछे RBI का पूरा गणित भी समझ लेते हैं. महंगाई सीधे तौर पर डिमांड और सप्लाई के अंतर की वजह से चढ़ती है और इस अंतर की एक वजह है पर्चेजिंग पावर बढ़ना. यदि आपके हाथ में ज्यादा पैसा होगा, तो आप खुलकर खर्च करेंगे. इस खर्च के चलते डिमांड बढ़ेगी और यदि सप्लाई पूरी नहीं हो पाई तो महंगाई का चक्का तेजी से घूमेगा. यहीं से RBI की जिम्मेदारी शुरू होती है. ऐसी स्थिति में RBI रेपो रेट बढ़ाकर या पहले से बढ़ी हुईं दरों को यथावत रखकर यह कोशिश करता है कि आपके हाथ में अतिरिक्त पैसा न पहुंचे. जब ज्यादा पैसा नहीं होगा, तो आप ज्यादा खर्च नहीं करेंगे. न डिमांड बढ़ेगी और न मांग और आपूर्ति के बीच अंतर बढ़ेगा. 

संभावना को किया खत्म
इसे दूसरी तरह से भी समझते हैं. ब्याज दरें कम होने से बाजार में अतिरिक्त लिक्विडिटी बढ़ जाती है. कहने का मतलब है कि लोग बिना ज़रूरत के सामान खरीदने के लिए लोन आदि लेने लगते हैं. इससे डिमांड में एकदम से इजाफा होता है, सप्लाई सीमित होने की वजह यह महंगाई का रूप ले लेता है. ऐसे में यदि RBI रेपो रेट बढ़ाता है तो बैंक कर्ज महंगा करते हैं, जिससे लिक्विडिटी या अतिरिक्त पैसा घटने लगता है. ऐसे में लोग जो बिना जरूरत के सामान खरीदने लगते हैं, उनकी खरीदारी कम हो जाएगी और महंगाई पर लगाम लग जाएगी. रेपो रेट को यथावत रखकर RBI ने सस्ते कर्ज की संभावना को खत्म किया है.  

कारगर नहीं है नीति?
RBI का मानना है कि बाजार से लिक्विडिटी कम करने से Artificial Demand को कंट्रोल करने में मदद मिलती है. इससे मांग घटती है, जो महंगाई को नियंत्रित करने का काम करती है. वैसे ये फ़ॉर्मूला केवल भारत ही नहीं अमेरिका जैसे देशों में भी अपनाया जाता है. हालांकि, ये बात अलग है कि कई एक्सपर्ट्स इसे ज्यादा कारगर नहीं मानते. उनका कहना है कि पैसे और महंगाई के बीच का ये रिश्ता ऐसा नहीं है, जिसे रेपो रेट में बदलाव से नियंत्रित किया जा सकता है. बता दें कि रेपो रेट वह दर होती है जिस पर RBI बैंकों को कर्ज देता है. बैंक इस पैसे से कस्टमर्स को LOAN देते हैं. ऐसे रेपो रेट बढ़ने का मतलब होता है कि बैंकों को मिलने वाला कर्ज महंगा हो जाएगा और इसकी भरपाई वो ग्राहकों से करेंगे. इसके उलट रेपो रेट में कमी का फायदा बैंक ग्राहकों को दे सकते हैं, ऐसे में लोन सस्ता होने की उम्मीद बढ़ जाती है.


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