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अडानी पर लगे आरोप भारतीयों के बारे में क्या कहते हैं? इस लेख में जानिए

यह दिखाता है कि हम एक ऐसे माहौल को स्वीकार कर चुके हैं जहां व्यापार में नैतिकता और "कैसे" काम किया गया, इस पर ध्यान नहीं दिया जाता.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

पिछले कुछ सालों में अडानी का नाम कई विवादों में आया है. ऑस्ट्रेलिया (कारमाइकल प्रोजेक्ट), म्यांमार (यंगून प्रोजेक्ट), बांग्लादेश (पावर सप्लाई), केन्या (पावर सप्लाई और एयरपोर्ट), श्रीलंका (सोलर पावर), और अब अमेरिका में भी उनके प्रोजेक्ट चर्चा में हैं. इसके अलावा, पिछले साल हिंडनबर्ग रिसर्च रिपोर्ट ने भी उन पर गंभीर आरोप लगाए थे. फिर भी भारत में, अडानी को लगभग भगवान जैसा माना जाता है, उनके खिलाफ सवाल उठाना गलत समझा जाता है. 

नेता, मीडिया, आईटी सेल, विश्लेषक, वित्तीय समुदाय और कई सामान्य नागरिक, यहां तक कि बड़े कॉरपोरेट्स के अधिकारी भी, उनकी जबरदस्त समर्थन में खड़े होते हैं. हाल ही में, भारत के एक बड़े और शोर मचाने वाले न्यूज चैनल के एंकर ने चिल्लाते हुए कहा, "अमेरिका अपनी हद में रहे... अडानी का भारत में जो भी काम है, वह अमेरिका या उसकी गुप्त संस्थाओं का मामला नहीं है." भारत की किसी भी जांच एजेंसी ने अब तक अडानी के खिलाफ कुछ गलत नहीं पाया है. यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त विशेषज्ञ समिति ने भी हिंडनबर्ग के आरोपों में कुछ खास नहीं देखा. 

लेकिन अब अमेरिका के न्याय विभाग (DoJ) और SEC ने भारत में रिश्वत की डीलिंग के सबूत जैसे मोबाइल, लैपटॉप और पावरपॉइंट प्रेजेंटेशन के जरिए आरोप लगाए हैं. सरकारों के पास जांच के लिए कई तकनीकी साधन (जैसे पेगासस) होते हैं, लेकिन यह सब सिर्फ तब काम करता है जब जांच के लिए सच्ची इच्छाशक्ति हो. अमेरिका में राष्ट्रपति हर्बर्ट हूवर और एलियट नेस ने संगठित अपराध को खत्म करके कानून व्यवस्था बहाल की थी, उन्होंने एन्‍रॉन, वर्ल्‍डकॉम, बर्नी मैडॉफ और वायरेकॉर्ड जैसे बड़े घोटालों का पर्दाफाश किया.  

वहीं, बांग्लादेश के एक हाई कोर्ट ने अडानी पावर के साथ हुए पावर सप्लाई एग्रीमेंट की समीक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का एक पैनल बनाया है. केन्या की एक कोर्ट ने हाल ही में अडानी के साथ $750 मिलियन की पावरलाइन डील को सस्पेंड कर दिया. अगर भारत की एजेंसियां और कोर्ट समय रहते सही कदम उठाते, तो इस अंतरराष्ट्रीय बदनामी को रोका जा सकता था. इससे न केवल जवाबदेही सुनिश्चित होती, बल्कि यह भी दिखता कि सत्ता का अत्यधिक केंद्रीकरण कितनी बड़ी समस्या है.

हमने शायद ऐसे कारोबारी माहौल और तौर-तरीकों को सामान्य मान लिया है, जहां "कैसे" काम किया गया, इस पर ध्यान नहीं दिया जाता. अब सिर्फ नतीजा मायने रखता है, न कि इसे पाने का तरीका. हमारी न्याय व्यवस्था में फैसले आने में सालों लगते हैं, और इस दौरान कई कमजोरियों का फायदा उठाकर सही तरीके से जवाबदेही तय करना मुश्किल हो जाता है. बांग्लादेश और केन्या की अदालतों ने जो सार्वजनिक हित में साफ दिख रहा था, उसे समझ लिया, लेकिन हमारी अदालतें और नियामक ऐसा नहीं कर पाए. 

हालांकि, मैं मानता हूं कि अडानी विवाद का भारत की राजनीतिक और आर्थिक स्थिति पर असर बढ़ा-चढ़ाकर बताया जा रहा है. भारत इतना बड़ा है कि एक कारोबारी समूह से समझौता नहीं किया जा सकता. हमारे पास इंफोसिस, विप्रो, टाटा, महिंद्रा जैसे दूसरे बड़े समूह भी हैं, लेकिन अडानी ग्रुप के कारण भारत की कारोबारी नैतिकता और ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस की साख जरूर खराब हो सकती है. इससे हमें उन देशों की श्रेणी में डाल दिया जाएगा जहां बड़ी कंपनियाँ और राजनीति आपस में जुड़े रहते हैं, जैसे कुछ समय पहले दक्षिण कोरिया और जापान में होता था. 

अमेरिका में भी 1864 में "क्रेडिट मोबिलियर" घोटाला हुआ था, जहाँ सार्वजनिक सेवाओं के निर्माण में खर्च बढ़ाकर राजनेताओं को रिश्वत दी गई थी. लेकिन समय के साथ वहाँ सख्त कानून बने और आर्थिक व्यवस्था को सुधारने के लिए बड़े कदम उठाए गए. भारत ने भी आज़ादी के बाद प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्था बनाने और भाई-भतीजावाद को रोकने की कोशिश की थी, लेकिन अब कुछ क्षेत्रों में हम फिर पीछे जा रहे हैं, इस प्रवृत्ति को रोकना जरूरी है. राजनीतिक रूप से, मौजूदा समय में, प्रधानमंत्री मोदी के सामने कोई मजबूत विपक्षी नेता नहीं है. ऐसे में यह मुद्दा वोटर्स के लिए बड़ा नहीं बनेगा, क्योंकि हमारा समाज अब सार्वजनिक जीवन में गलत तरीकों को सही मानने लगा है. नैतिकता का स्तर काफी गिर गया है और ऐसा लगता है कि अब किसी को इसकी परवाह नहीं है. 

कुछ अधिकारियों ने मुझसे कहा कि अडानी का मामला तो बस रिश्वत का ही है, तो इसमें इतना हंगामा क्यों हो रहा है? अगर नैतिकता को ताकत और मुनाफे के लिए कुर्बान कर दिया जाए, तो आगे चलकर सिर्फ रिश्वतखोरी के मामलों से ज्यादा नुकसान होगा. अभी के लिए, अडानी ग्रुप को पश्चिमी देशों में फंड जुटाने में मुश्किल हो सकती है. अगर उन्हें फंड मिलता भी है, तो उधारी महंगी होगी और इसका असर बिजली के दाम पर पड़ेगा. 

अडानी ने पहले भी ऐसे झटकों का सामना किया है और उनकी क्षमता को कम नहीं आंका जा सकता, लेकिन अमेरिका की DoJ और SEC जैसी संस्थाओं की कार्रवाई को संभालना हिंडनबर्ग रिपोर्ट जितना आसान नहीं होगा. फिर भी, अगर अमेरिका में माहौल बदला, तो वे जुर्माने और बड़े निवेश के जरिए इस मामले से निकल सकते हैं. उनकी कार्यक्षमता और जोखिम उठाने की हिम्मत को कम नहीं आंका जा सकता। ऐसा व्यक्ति गिरकर भी खड़ा हो जाता है. हमारे समाज और आदर्श समाज के बीच इतनी खाई है कि समझदार लोग, जो नैतिकता को लचीला मानते हैं, इसका फायदा उठाते रहेंगे, यह हमेशा से होता आया है. 

भारत बदल रहा है... और हमें इसे स्वीकार करना ही होगा. 

(लेखक- प्रबल बसु रॉय, लंदन बिजनेस स्कूल के स्लोन फेलो और एक बोर्ड मेंबर हैं.)
 


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