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Weekend Special: नरेश गोयल ने जिस 'जेट' को अपने दम पर संवारा, उसे खुद कैसे बर्बाद किया?

2004 में बाजार के 40% हिस्से पर जेट का ही कब्जा था, लेकिन जब नए प्लेयर आए तो नरेश गोयल एक अलग ही रणनीति पर काम करने लगे.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago

किसी जमाने में नरेश गोयल की गिनती सबसे सफल बिजनेसमैन में होती थी. एविएशन सेक्टर में उनका खासा दबदबा था. उनकी कंपनी जेट एयरवेज आसमान में उम्मीदों की उड़ान भर रही थी, लेकिन फिर कुछ ऐसा हुआ कि जेट एयरवेज आसमान से सीधे जमीन पर आ गिरी. और इसी के साथ नरेश गोयल की सफलता की कहानी लिखने वाले अखबार उनकी खामियों पर लिखने लगे. गोयल जेट एयरवेज से जुड़े हर शख्स के लिए हीरो से जीरो बन गए.  

अब भी मुश्किलों में जेट 
नरेश गोयल के नेतृत्व में जेट एयरवेज मुश्किलों के भंवर में फंसी थी, उससे अभी तक बाहर नहीं निकल पाई है. कंपनी को नया मालिक जरूर मिल गया है, लेकिन आसमान में फिर से उड़ान भरने की उसकी हसरत अभी भी अधूरी है. गोयल ने बड़ी मेहनत से जेट एयरवेज को खड़ा किया था, उसे हवाई यात्रियों की पहली पसंद बनाया था, लेकिन उसके क्रैश होने की कहानी भी खुद उन्होंने ही लिख डाली. 

अनसुनी की सलाह 
आर्थिक संकट के चलते जेट एयरवेज का कामकाज 17 अप्रैल 2019 को बंद हो गया था. इससे पहले नरेश गोयल ने कंपनी को बचाने के लिए खूब हाथ-पैर मारे, लेकिन सफलता नहीं मिली. उन्होंने अपने फाइनेंशियल एडवाइजर्स से लेकर तमाम एक्सपर्ट्स से राय मांगी, ताकि संकट से कंपनी को बचाया जा सके. उस वक्त, कुछ एडवाइजर्स ने उन्हें पीछे हटकर नए निवेशकों को मौका देने की सलाह दी. उस दौर में टाटा ग्रुप ने जेट में इन्वेस्ट करने में दिलचस्पी दिखाई थी, मगर गोयल ने किसी सलाह पर ध्यान नहीं दिया. गोयल अपने मन की करते रहे और कंपनी बंद होने की दहलीज पर पहुंच गई. हर दिन बढ़ते कर्ज के साथ आखिरकार एक दिन ऐसा आया, जब जेट एयरवेज के विमान केवल शो-पीस बनकर रह गए. 

पनपने लगा अहंकार 
जानकार मानते हैं कि गोयल ने एक नहीं, कई गलतियां की. उनकी एक गलती यह भी थी कि जिन लोगों को उन्होंने हायर किया, उन पर भरोसा नहीं दिखाया. उन्हें 'मैं' से ज्यादा प्यार हो गया था. नरेश गोयल मानने लगे थे कि उनके मुंह से निकली हर बात सही होती है और उसे काटा नहीं जा सकता. गोयल मानने लगे थे कि वो ही जेट एयरवेज हैं. सीधे शब्दों में कहें तो अहंकार उनमें तेजी से पनपने लगा था. हालांकि, वह बातचीत में माहिर थे और इस वजह से कई छोटे-मोटे संकट से जेट को आसानी से निकालकर ले गए.    

यह मौका भी गंवाया
एक रिपोर्ट की मानें तो कारोबार बंद करने से कुछ दिन पहले तक जेट एयरवेज को हर दिन 21 करोड़ का नुकसान हो रहा था. 2017 में डेल्टा एयरलाइन ने भी जेट में कुछ स्टेक खरीदने में दिलचस्पी दिखाई थी. अबू धाबी की सरकारी एयरलाइन कंपनी एतिहाद पहले से ही जेट की पार्टनर थी, मगर नरेश गोयल सौदेबाजी में उलझे रहे. डेल्टा ने गोयल को स्टेक लेने के लिए 300 रुपए प्रति शेयर का ऑफर दिया, लेकिन गोयल 400 रुपए प्रति शेयर से नीचे आने को तैयार नहीं थे. जबकि कंपनी के शेयर 400 रुपए से नीचे ही ट्रेड कर रहे थे. एक्सपर्ट्स मानते हैं कि अगर उस वक्त गोयल ने सही फैसला लिया होता, तो शायद जेट के सिर से कर्ज का बोझ कुछ कम हो जाता.

IPO के पैसे से खरीदे प्लेन
2004 में बाजार के 40% हिस्से पर जेट का ही कब्जा था, लेकिन जब नए प्लेयर मार्केट में आए तो नरेश गोयल एक अलग ही रणनीति पर काम करने लगे. इंडिगो और स्पाइस जेट को टक्कर देने के लिए वह पहले सस्ते की जंग में फंसे, फिर उन्होंने 2007 में 1450 करोड़ रुपए में एयर सहारा को खरीदा. इस डील के साथ ही कंपनी फाइनेंशियल और लीगल सहित तमाम तरह की मुश्किलों में फंस गई. इतना ही नहीं, गोयल ने IPO का पैसा कर्ज का बोझ कम करने के बजाए नए प्लेन ऑर्डर करने में खर्च कर दिया. 

महंगे विमान, कम सीट
2012 में जब किंगफिशर बंद हुई, तो नरेश गोयल के पास एक मौका था किंगफिशर के गलत फैसलों से सीख लेने का पर उन्होंने यह मौका भी गंवा दिया. कंपनी के कर्ज में दबे होने के बावजूद उन्होंने 10 एयरबस A330 और बोइंग 777 प्लेन का ऑर्डर दे दिया. गोयल के इस कदम से केवल जेट का खर्चा ही बढ़ा. बात यहीं खत्म नहीं होती. गोयल ने इन जहाजों में सीट भी कम रखी. एक रिपोर्ट बताती है कि ग्लोबल प्रैक्टिस में जहां 400 सीटें होती हैं, वहीं इसमें सिर्फ 308 सीटें थीं. यानी एक तरह से उन्होंने कमाई पर खुद कैंची चला दी.

सहते रहे फर्स्टक्लास का बोझ
जेट के विमानों में फर्स्टक्लास की 8 सीटें थीं, जिनसे कमाई न के बराबर हो रही थी. ऐसे में अधिकारियों ने उन्हें इन सीट्स को सामान्य सीट्स में बदलने की सलाह दी थी, लेकिन गोयल ने इसे अनसुना कर दिया. यही एक गलती जेट एयरवेज के चेयरमैन और फाउंडर के रूप में गोयल बार-बार करते रहे - अधिकारियों पर भरोसा नहीं करना. कहा जाता है कि गोयल को एयर सहारा से डील नहीं करने की सलाह दी गई थी, इसके बावजूद उन्होंने करोड़ों खर्च का सौदा कर डाला. इस तरह 1992 में जिस कंपनी को उन्होंने उम्मीदों के साथ शुरू किया, उसे नंबर वन की पोजीशन दिलवाई, उसे खुद ही बर्बाद कर दिया. 
 


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