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NSE के CEO आशीष कुमार चौहान का बयान, कहा- अमेरिकी डॉलर बनाए रखेगा अपनी ताकत
वैश्विक वित्तीय बाजार बड़े बदलावों से गुजर रहे हैं, और वोलाटिलिटी (उतार-चढ़ाव) अब असामान्य नहीं बल्कि आम बात हो गई है.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago
सिंगापुर में हुए एक हालिया पैनल डिस्कशन में NSE के MD & CEO, आशीष कुमार चौहान ने ग्लोबल बाजारों की बदलती ताकत, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की बदलती भूमिका और टेक्नोलॉजी द्वारा पूंजीवाद (Capitalism) के नए रूप पर अपनी राय रखी.
प्रगति की पहचान है वॉलटिलिटी (उथल-पुथल)
चौहान ने बताया कि बाजार में होने वाली तेजी-गिरावट (वॉलटिलिटी) कोई खराबी नहीं, बल्कि आर्थिक जीवन का हिस्सा है. उन्होंने इसे दिल की धड़कन से जोड़ा—अगर धड़कन रुक जाए, तो जीवन भी रुक जाएगा. इसी तरह, अगर बाजार पूरी तरह स्थिर हो जाए, तो विकास भी रुक जाएगा.
बाजार में उथल-पुथल तब ज्यादा होती है जब उम्मीदें हकीकत से ज्यादा आगे निकल जाती हैं. जब लोग ज्यादा उम्मीदें लगा लेते हैं और सच्चाई अलग होती है, तो करेक्शन (सुधार) बहुत तेज और दर्दनाक हो सकता है. चौहान ने कहा, "बाजार लोगों, समाजों और देशों के आपसी संबंधों से चलता है." आजकल पारंपरिक आर्थिक आंकड़ों से ज्यादा असर राजनीतिक घटनाओं (Geopolitics) का पड़ता है. उन्होंने चेतावनी दी—"अब भू-राजनीति (Geopolitics) ही अर्थव्यवस्था (Economy) को कंट्रोल कर रही है."
'W' वाली संस्थाओं का पतन
चौहान का सबसे चौंकाने वाला बयान यह था कि बड़े अंतरराष्ट्रीय संगठन अब कमजोर हो रहे हैं. उन्होंने कहा—"UN खत्म, WTO खत्म, WHO खत्म. जो भी 'W' से शुरू होता है, वह खत्म हो रहा है." मतलब, दुनिया अब नियमों से नहीं, बल्कि आपसी समझौतों से चल रही है.
अमेरिका, जो पहले इन वैश्विक संस्थाओं को संभालता था, अब खुद पहचान के संकट से जूझ रहा है. पहले अमेरिका दुनिया की अर्थव्यवस्था को संभालता था, लेकिन अब वह पीछे हट रहा है. ऐसे में चीन और भारत जैसी उभरती शक्तियों को आगे आना होगा. लेकिन चौहान ने यह भी चेताया कि यह बदलाव आसान नहीं होगा और इसमें कई उतार-चढ़ाव आएंगे.
‘कैपिटल के बिना कैपिटलिज्म’ का नया दौर
चौहान ने एक नया और दिलचस्प विचार पेश किया: "कैपिटल के बिना कैपिटलिज्म". पारंपरिक रूप से, आर्थिक विकास के लिए बड़े निवेश की जरूरत होती थी. प्रसिद्ध दार्शनिक कार्ल मार्क्स ने कहा था कि पूंजी (कैपिटल) से और ज्यादा पूंजी बनती है, लेकिन अब तकनीक ने इस सोच को बदल दिया है.
चौहान ने कहा, "आज आपको संपत्ति (वेल्थ) बनाने के लिए बहुत ज्यादा पूंजी की जरूरत नहीं है." उन्होंने बताया कि AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस), ब्लॉकचेन और डिजिटल प्लेटफॉर्म जैसे नए तकनीकी साधन कंपनियों को बहुत कम निवेश में तेजी से आगे बढ़ने का मौका देते हैं. उन्होंने भारत के स्टार्टअप इकोसिस्टम का उदाहरण दिया, जहां पिछले एक साल में NSE पर 200 से ज्यादा छोटे IPO (माइक्रो-IPO) लिस्ट हुए हैं. यह दिखाता है कि अब आर्थिक विकास के लिए पारंपरिक बड़े निवेश की उतनी जरूरत नहीं रही.
लंबी अवधि के लिए बाजार में हैं भारतीय निवेशक
चौहान ने यह गलत धारणा दूर करने की कोशिश की कि भारत का स्टॉक मार्केट सिर्फ शॉर्ट-टर्म ट्रेडर्स से भरा हुआ है. उन्होंने बताया, "110 मिलियन (11 करोड़) बाजार भागीदारों में से केवल 2% ही डेरिवेटिव्स में सक्रिय रूप से ट्रेडिंग करते हैं. बाकी अधिकांश निवेशक लंबी अवधि के लिए निवेश करते हैं."
इस लॉन्ग-टर्म इन्वेस्टमेंट मानसिकता का एक बड़ा आधार SIP (सिस्टेमेटिक इन्वेस्टमेंट प्लान) है. इसमें लाखों छोटे निवेशक हर महीने नियमित रूप से पैसा लगाते हैं. भारत में 50 मिलियन (5 करोड़) से ज्यादा लोग SIP के जरिए निवेश कर रहे हैं. SIP ने भारतीय बाजार को स्थिर बनाए रखने में बड़ी भूमिका निभाई है और यह दिखाता है कि देश में अनुशासित निवेश (Disciplined Investing) की संस्कृति तेजी से बढ़ रही है.
साइबर युद्ध और डिजिटल युद्ध का मैदान
जैसे-जैसे वित्तीय बाजार डिजिटल होते जा रहे हैं, वैसे-वैसे वे बड़े साइबर खतरों का सामना कर रहे हैं. चौहान ने खुलासा किया कि केवल NSE (नेशनल स्टॉक एक्सचेंज) ही हर दिन 40 से 100 मिलियन साइबर हमलों का सामना करता है. उन्होंने चेतावनी दी, "हमलावरों को सिर्फ दस साल में एक बार सफल होना होता है, लेकिन हमें हर दिन सफल होना जरूरी है."
इन चुनौतियों को और बढ़ा रहा है डीपफेक टेक्नोलॉजी, चौहान ने अपना एक अनुभव साझा किया, जहां उनका डीपफेक वीडियो बनाया गया था, जिसमें ऐसा दिखाया गया कि वे WhatsApp ग्रुप्स में स्टॉक टिप्स दे रहे हैं. इस तरह की गलत जानकारी (misinformation) का तेजी से फैलना वित्तीय सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा बनता जा रहा है. इससे निपटने के लिए नियामकों (regulators) और वित्तीय संस्थानों को लगातार सतर्क रहना जरूरी है.
अमेरिकी डॉलर का भविष्य
क्या अमेरिकी डॉलर दुनिया की प्रमुख मुद्रा बना रहेगा? इस सवाल पर चौहान को नहीं लगा कि इसका कोई मजबूत विकल्प मौजूद है. उन्होंने कहा, "द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, अमेरिका ने बहुत सोच-समझकर खुद को ब्रिटिश पाउंड की जगह वैश्विक रिजर्व मुद्रा (reserve currency) के रूप में स्थापित किया. आज कोई और देश इस भूमिका के लिए तैयार नहीं है."
चीन की अर्थव्यवस्था मजबूत होने के बावजूद, वहां वैश्विक रिजर्व मुद्रा के लिए जरूरी वित्तीय पारदर्शिता नहीं है. जब तक कोई और देश मजबूत आर्थिक और राजनीतिक ढांचा तैयार नहीं करता, तब तक डॉलर अपनी स्थिति बनाए रखेगा—योजना के तहत नहीं, बल्कि किसी और विकल्प के न होने की वजह से.
बदलाव के दौर में दुनिया
पैनल चर्चा में चौहान ने दुनिया की एक साफ तस्वीर पेश की, जो बदलाव के दौर से गुजर रही है. पुरानी ताकतें कमजोर हो रही हैं और तकनीक वित्तीय मॉडल को पूरी तरह बदल रही है, जिससे पूंजी बाजार (capital markets) का भविष्य पहले से कहीं ज्यादा अनिश्चित हो गया है. लेकिन उन्होंने निवेशकों को याद दिलाया कि वोलाटिलिटी (बाजार में उतार-चढ़ाव) प्रगति की कीमत है.
इस उथल-पुथल से निकलने का तरीका है अनुकूलता (adaptability). चौहान ने कहा कि वित्तीय दुनिया उन लोगों की नहीं है जो बदलाव का विरोध करते हैं, बल्कि उनकी है जो इसे पहले से समझते हैं और खुद को ढाल लेते हैं. इतिहास गवाह है कि जो लोग बदलाव को अपनाते हैं, वही भविष्य का निर्माण करते हैं.
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