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PC ज्वैलर को कर्ज से उबारने की कहानी: बैंकों ने प्रमोटर्स के मुकाबले पांच गुना ज्यादा कीमत चुकाई

जहां सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने भारी नुकसान उठाते हुए 29.20 रुपये प्रति शेयर की कीमत पर कर्ज को शेयरों में बदला, वहीं प्रमोटर परिवार ने 5.62 रुपये प्रति शेयर के भाव पर निवेश किया और अब कर्जमुक्त कंपनी में पहले से ज्यादा हिस्सेदारी के साथ बाहर आया.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 hour ago

पलक शाह

प्रमोटर्स को फायदा, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को नुकसान

पीसी ज्वैलर के कर्ज को इक्विटी में बदलने के समझौते की पूरी कहानी

पीसी ज्वैलर का कहना है कि वह कर्जमुक्त हो गई है. कंपनी की ओर से दाखिल दस्तावेज बताते हैं कि ऐसा कैसे हुआ. एसबीआई के नेतृत्व में 14 कर्जदाताओं, जिनमें ज्यादातर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक थे, ने करीब 1,510 करोड़ रुपये के कर्ज को शेयरों में बदल दिया, जबकि उस समय उन शेयरों का बाजार मूल्य लगभग आधा था. इस बीच, प्रमोटर परिवार ने बैंकों की कीमत के पांचवें हिस्से पर भुगतान करके अपनी हिस्सेदारी बढ़ा ली.

25 सितंबर, 2026 को पीसी ज्वैलर ने स्टॉक एक्सचेंजों को बताया कि उसने एसबीआई के नेतृत्व वाले कर्जदाता समूह के सभी 14 बैंकों का भुगतान कर दिया है और उन्हें उनके 'अनापत्ति सह बकाया-मुक्ति सह रिहाई' पत्र मिल गए हैं. कंपनी ने इसे अपने कारोबार में बदलाव और सुधार की कहानी बताया. हालांकि, कंपनी के दस्तावेज बताते हैं कि कर्जदाताओं को किस तरह भुगतान किया गया.

2023 तक कंपनी पर बैंकों का 3,400 करोड़ रुपये से अधिक का कर्ज था और करीब 3,466 करोड़ रुपये के डिफॉल्ट की खबर सामने आई थी. दिसंबर 2023 में एसबीआई ने नई दिल्ली स्थित पीसी ज्वैलर की दो संपत्तियों पर कब्जा कर लिया. इसी वित्त वर्ष के दौरान एसबीआई ने राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (NCLT) में दिवाला याचिका भी दायर की. दिवाला प्रक्रिया के तहत डिफॉल्ट करने वाले प्रमोटर कंपनी का नियंत्रण खो सकते हैं, क्योंकि दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता की धारा 29A ऐसे प्रमोटर्स को कंपनी को दोबारा खरीदने के लिए बोली लगाने से रोकती है.

एसबीआई ने मामले को उसके अंतिम नतीजे तक नहीं पहुंचाया. मार्च 2024 में उसने कंपनी के एकमुश्त निपटान प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया. 30 अप्रैल, 2024 को एनसीएलटी ने याचिका वापस लेने की अनुमति दे दी.

सबसे बड़ा सवाल

30 सितंबर, 2024 को हुए समझौते के दो हिस्से थे: किस्तों में नकद भुगतान और कर्ज के एक हिस्से को शेयरों में बदलना. 17 मार्च, 2025 को 14 बैंकों को 29.20 रुपये प्रति शेयर की दर से 51.71 करोड़ शेयर आवंटित किए गए. इसके जरिए 1,509.97 करोड़ रुपये का कर्ज निपटाया गया.

 बैंक                                       शेयरों के जरिए निपटाया गया कर्ज 
 भारतीय स्टेट बैंक                     515.81 करोड़ रुपये              
 यूनियन बैंक ऑफ इंडिया           242.35 करोड़ रुपये              
 पंजाब नेशनल बैंक                    204.30 करोड़ रुपये              
 इंडियन बैंक                            101.47 करोड़ रुपये              
 बैंक ऑफ इंडिया                      86.82 करोड़ रुपये               
 इंडियन ओवरसीज बैंक              85.16 करोड़ रुपये               
 केनरा बैंक                               81.69 करोड़ रुपये               

शेयर आवंटन के समय इस शेयर का भाव करीब 14.40 रुपये बताया गया था. इस कीमत पर बैंकों को मिले शेयरों का मूल्य लगभग 745 करोड़ रुपये था. यानी निपटाए गए कर्ज और उस दिन बाजार में शेयरों के मूल्य के बीच करीब 765 करोड़ रुपये का अंतर था. यह अंतर केवल कर्ज को शेयरों में बदलने की कीमत के कारण था. इसमें निपटान के नकद हिस्से में किसी भी तरह की कटौती शामिल नहीं है.

कंपनी की ओर से दाखिल दस्तावेज में केवल इतना कहा गया है कि 29.20 रुपये की कीमत सेबी के पूंजी निर्गम संबंधी नियमों के अध्याय V के तहत निर्धारित कीमत से कम नहीं थी.

दस्तावेज यह नहीं बताते कि जिन कर्जदाताओं ने कर्ज लेने वाली कंपनी को दिवाला अदालत तक पहुंचाया था, उन्होंने बाजार भाव से लगभग दोगुनी कीमत पर शेयर क्यों स्वीकार किए.

प्रमोटर्स ने किस कीमत पर खरीदे शेयर

बैंकों ने 29.20 रुपये प्रति शेयर चुकाए. प्रमोटर परिवार ने 5.62 रुपये प्रति शेयर का भुगतान किया.

जुलाई 2024 में, निपटान समझौते पर हस्ताक्षर होने से पहले, कंपनी के बोर्ड ने 56.20 रुपये प्रति शेयर की दर से 2,705 करोड़ रुपये के शेयर वारंट को मंजूरी दी थी. एक के बदले 10 शेयर के स्टॉक स्प्लिट के बाद यह कीमत 5.62 रुपये प्रति शेयर रह गई. रिपोर्टों के अनुसार, प्रमोटर समूह की हिस्सेदारी करीब 850 करोड़ रुपये थी. जनवरी से अप्रैल 2026 के बीच प्रमोटर समूह से जुड़े तीन शेयरधारकों ने वारंट को करीब 82 करोड़ शेयरों में बदला. इनमें बलराम गर्ग (HUF), पूजा गर्ग और न्यू ट्रैक गारमेंट्स प्राइवेट लिमिटेड शामिल थे.

उन्होंने कितना भुगतान किया: करीब 463 करोड़ रुपये

बैंकों की कीमत पर इन्हीं शेयरों को खरीदने में कितना खर्च होता: करीब 2,404 करोड़ रुपये.

जनवरी में वारंट को शेयरों में बदलने की प्रक्रिया से ही प्रमोटर समूह की हिस्सेदारी 36.85% से बढ़कर 40.94% हो गई. मार्च के अंत तक यह करीब 41% पहुंच गई. बाद में अन्य निवेशकों को शेयर आवंटित होने के बाद अब समूह के पास 39.10% हिस्सेदारी है. 17 अक्टूबर को 16.28 रुपये के बंद भाव के आधार पर इसका मूल्य 6,200 करोड़ रुपये से अधिक है. जिस एसबीआई ने कंपनी को दिवाला अदालत तक पहुंचाया था, उसके पास मार्च 2025 तक कंपनी की 2.70% हिस्सेदारी थी.

प्रमोटर समूह के अलावा 31 अन्य निवेशकों को भी 5.62 रुपये प्रति शेयर की दर से शेयर आवंटित किए गए थे.

बैंकों ने क्या छोड़ा

कर्ज चुकाए जाने के बाद कर्जदाताओं ने गिरवी रखी गई संपत्तियों और अन्य प्रतिभूतियों को मुक्त कर दिया है. अब कर्ज की किसी भी कमी की भरपाई उन संपत्तियों से नहीं की जा सकती. पीसी ज्वैलर ने यह खुलासा नहीं किया है कि समझौते के तहत कुल कितना नकद भुगतान किया गया, बैंकों के बीच इसका बंटवारा कैसे हुआ या किस्तों का भुगतान किस समय-सारणी के अनुसार किया गया. बैंकों ने भी यह नहीं बताया है कि उन्होंने कितनी रकम को बट्टे खाते में डाला. कंपनी के कर्ज का ज्यादातर हिस्सा सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के पास था.

ऑडिट में अब भी उठाए गए सवाल

पीसी ज्वैलर के ऑडिटरों ने कंपनी के खातों पर कुछ आपत्तियां दर्ज की हैं. वित्त वर्ष 2018-19 में निर्यात ग्राहकों को दी गई 513.65 करोड़ रुपये की छूट में से 183.16 करोड़ रुपये के लिए विदेशी मुद्रा लेनदेन संभालने वाले बैंक की मंजूरी नहीं है. निर्यात ग्राहकों से लंबे समय से बकाया रकम पर संभावित नुकसान के लिए कुल 281.40 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है. ऑडिटरों ने कहा है कि वे इस पर टिप्पणी नहीं कर सकते कि यह प्रावधान पर्याप्त है या नहीं.

कंपनी ने विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (FEMA) के तहत आवेदन किया है, ताकि निर्यात से प्राप्त रकम को वापस लाने में हुई देरी को माफ किया जा सके. वित्त वर्ष 2025-26 में कंपनी ने करीब 710 करोड़ रुपये का मुनाफा दर्ज किया. यह वह साल था, जब निपटान के कारण कंपनी को ब्याज लागत से काफी हद तक राहत मिली.

कंपनी का पक्ष

जुलाई 2024 में शेयर वारंट की घोषणा के समय प्रबंध निदेशक बलराम गर्ग ने कहा था कि जुटाई गई रकम का करीब 75% हिस्सा बैंक कर्ज चुकाने में इस्तेमाल किया जाएगा. 5.62 रुपये प्रति शेयर की कीमत सेबी के तय फॉर्मूले के आधार पर निर्धारित की गई थी, जब शेयर का कारोबार काफी निचले स्तर पर हो रहा था. यदि समझौता नहीं होता, तो दिवाला प्रक्रिया के तहत कर्जदाताओं को इससे भी कम रकम मिल सकती थी.

हालांकि, इनमें से कोई भी बात इस सवाल का जवाब नहीं देती कि कर्जदाताओं ने प्रमोटर्स की कीमत से पांच गुना अधिक कीमत क्यों चुकाई.

जिन सवालों के जवाब नहीं मिले

अब इन सवालों के जवाब एसबीआई और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को देने हैं:

- 29.20 रुपये प्रति शेयर की कीमत को किसने मंजूरी दी और किस मूल्यांकन के आधार पर?
- कर्जदाता समूह को वास्तव में कितना नकद भुगतान मिला?
- प्रत्येक बैंक ने कितनी रकम बट्टे खाते में डाली?
- क्या जारी की गई प्रतिभूतियों में प्रमोटर्स की कोई व्यक्तिगत गारंटी भी शामिल थी, जिसे बाद में मुक्त कर दिया गया? कंपनी की वार्षिक रिपोर्ट में केवल उसकी सहायक कंपनी लग्जरी प्रोडक्ट्स ट्रेंडसेटर की कॉरपोरेट गारंटी का उल्लेख है.

पीसी ज्वैलर अब कर्जमुक्त है और उसके प्रमोटर्स के पास डिफॉल्ट से पहले की तुलना में कंपनी की अधिक हिस्सेदारी है. बैंकों के पास कर्ज से मुक्ति के पत्र, कंपनी में छोटी अल्पांश हिस्सेदारी और कागजों पर दर्ज ऐसी कमी रह गई है, जिसका उन्होंने अब तक खुलासा नहीं किया है.

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और द मार्केट माफिया: क्रॉनिकल ऑफ इंडियाज हाई-टेक स्टॉक मार्केट स्कैंडल एंड द कैबल दैट वेंट स्कॉट-फ्री तथा द कैबल दैट वेंट स्कॉट-फ्री के निडर लेखक हैं. उनकी चर्चित खोजपरक रिपोर्टिंग ने भारत के वित्तीय बाजारों के अंधेरे पक्ष को उजागर किया है.

मुंबई में करीब दो दशकों तक जमीनी स्तर पर रिपोर्टिंग करने वाले पलक ने धन, सत्ता और नियमन के बीच के संबंधों की गहराई से पड़ताल करके अपनी पहचान बनाई है. उनकी रिपोर्टें भारत के प्रमुख वित्तीय समाचार पत्रों और प्रकाशनों, जिनमें द इकोनॉमिक टाइम्स, बिजनेस स्टैंडर्ड, द फाइनेंशियल एक्सप्रेस और द हिंदू बिजनेस लाइन शामिल हैं, में प्रकाशित हुई हैं. उनकी पैनी रिपोर्टिंग ने कई अहम मुद्दों पर विमर्श को आकार दिया है और कॉरपोरेट जगत में हलचल पैदा की है.

19 वर्ष की उम्र में अपराध पत्रकारिता की ओर आकर्षित हुए पलक ने जल्द ही महसूस किया कि 1980 के दशक में मुंबई में होने वाले गैंगवार की जगह संगठित अपराध के अधिक आधुनिक और जटिल रूप ने ले ली है. अब कॉरपोरेट इमारतों के भीतर सफेदपोश अपराध की योजनाएं बनाई जा रही थीं. इसी अनुभव ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित किया, जहां उन्होंने भारत की 'सफेद धन' वाली अर्थव्यवस्था की जटिल कार्यप्रणाली को समझने में वर्षों बिताए.

शेयर बाजार में हेरफेर से लेकर नियामकीय खामियों तक, पलक का काम उच्च वित्तीय जगत की चमकदार सतह के पीछे छिपे उन समूहों को उजागर करता है, जो पर्दे के पीछे से व्यवस्था को प्रभावित करते हैं. सच्चाई सामने लाने का उनका जुनून और उन कड़ियों को जोड़ने की क्षमता, जिन्हें दूसरे लोग नजरअंदाज कर देते हैं, उन्हें भारतीय पत्रकारिता की एक मजबूत आवाज बनाती है. वे यथास्थिति को चुनौती देने और खुद को कानून से ऊपर समझने वाले लोगों को बेनकाब करने से नहीं हिचकते.)


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