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दादरी से मुंबई तक मालगाड़ियों की रफ्तार बढ़ी, ₹73,000 करोड़ का पश्चिमी DFC राष्ट्र को समर्पित
2,800 किलोमीटर लंबे कॉरिडोर से माल परिवहन में समय और लागत घटने की उम्मीद, दादरी से मुंबई के जवाहरलाल नेहरू पोर्ट तक रेल कनेक्टिविटी हुई मजबूत
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 4 hours ago
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को करीब ₹73,000 करोड़ की लागत से तैयार पश्चिमी समर्पित माल ढुलाई गलियारे (Western Dedicated Freight Corridor) को राष्ट्र को समर्पित किया. उत्तर प्रदेश के दादरी से महाराष्ट्र के जवाहरलाल नेहरू पोर्ट अथॉरिटी (JNPA) तक फैला यह कॉरिडोर देश के माल परिवहन नेटवर्क के लिए बड़ा बदलाव माना जा रहा है. इसके पूरा होने से उत्तर भारत के औद्योगिक क्षेत्रों और पश्चिमी तट के प्रमुख बंदरगाहों के बीच माल की आवाजाही तेज होने के साथ लॉजिस्टिक्स लागत घटने की उम्मीद है.
20 साल बाद पूरा हुआ बड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट
पश्चिमी DFC करीब 2,800 किलोमीटर लंबा है और इसकी योजना को औपचारिक रूप से वर्ष 2005 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल में शुरू किया गया था. इस परियोजना ने करीब दो दशकों में तीन प्रधानमंत्रियों के कार्यकाल देखे. इसके साथ ही देश के दो प्रमुख समर्पित माल ढुलाई गलियारों को पूरा करने का लक्ष्य हासिल हो गया है.
इससे पहले पंजाब और बिहार से पश्चिम बंगाल तक जुड़ने वाला पूर्वी समर्पित माल ढुलाई गलियारा अक्टूबर 2023 में पूरा हुआ था. पूर्वी DFC पर करीब ₹51,000 करोड़ खर्च हुए हैं. दोनों कॉरिडोर की कुल लागत लगभग ₹1.24 लाख करोड़ रही है.
30 घंटे की जगह 10-12 घंटे में पूरी होगी यात्रा
पश्चिमी DFC पर मालगाड़ियों की अधिकतम गति 100 किलोमीटर प्रति घंटा निर्धारित की गई है. अधिकारियों के मुताबिक, जहां सामान्य रेलवे ट्रैक पर 100 किलोमीटर की दूरी तय करने में करीब छह घंटे लगते हैं, वहीं DFC पर यही दूरी औसतन ढाई घंटे में पूरी की जा सकती है.
प्रधानमंत्री मोदी के मुताबिक, एक ट्रक को जिस यात्रा में करीब 30 घंटे लगते हैं, वही दूरी DFC के जरिए 10-12 घंटे में पूरी की जा सकती है. इससे माल ढुलाई की गति बढ़ने के साथ कारोबारियों के लिए परिवहन लागत में भी कमी आने की उम्मीद है.
मुंद्रा, कांडला और पिपावाव के साथ JNPA की कनेक्टिविटी मजबूत
पश्चिमी DFC को देश के प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों और बंदरगाहों को जोड़ने वाली अहम कड़ी माना जा रहा है. यह मुंद्रा, कांडला, पिपावाव और JNPA जैसे प्रमुख बंदरगाहों को उत्तर और उत्तर-पश्चिम भारत के औद्योगिक केंद्रों से जोड़ता है. विशेष रूप से JNPA से जुड़ने वाला अंतिम महत्वपूर्ण हिस्सा लंबे समय से परियोजना की सबसे बड़ी बाधाओं में शामिल था. अब इसके पूरा होने से देश के सबसे बड़े सरकारी कंटेनर बंदरगाहों में शामिल JNPA को उत्तर भारत से सीधे और तेज रेल संपर्क का फायदा मिलेगा.
कंटेनर ढुलाई में डबल-स्टैक ट्रेन से बढ़ेगी क्षमता
कॉरिडोर के पूरा होने से कंटेनर ट्रेन ऑपरेटरों को भी बड़ा फायदा मिलने की उम्मीद है. JNPA तक डबल-स्टैक कंटेनर ट्रेन चलने से अतिरिक्त क्षमता उपलब्ध होगी और बंदरगाह पर कंटेनरों के टर्नअराउंड में भी सुधार आ सकता है. हालांकि, विशेषज्ञों के मुताबिक वास्तविक लागत बचत अनुमान से कम रह सकती है. कंटेनर ट्रेन ऑपरेटर एसोसिएशन के अध्यक्ष मनीष पुरी के अनुसार, मौजूदा नियमों और कंटेनरों के वजन एवं आकार से जुड़ी पाबंदियों के कारण डबल-स्टैकिंग का पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा है.
उनके मुताबिक, डबल-स्टैक कंटेनरों के लिए ट्रेन की गति भी 65-70 किलोमीटर प्रति घंटा तक सीमित हो सकती है, जबकि सिंगल-स्टैक ट्रेनें 100 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से चल सकती हैं.
फीडर रूट और पोर्ट क्षमता में सुधार की जरूरत
विशेषज्ञों का कहना है कि DFC से अधिकतम लाभ हासिल करने के लिए सिर्फ मुख्य कॉरिडोर को तेज करना पर्याप्त नहीं होगा. बंदरगाहों को DFC से जोड़ने वाले फीडर रूट और सामान्य रेलवे नेटवर्क से DFC के इंटरचेंज पॉइंट को भी बेहतर करना होगा.
इसके अलावा, JNPA पर बढ़ने वाले कंटेनर यातायात को संभालने की क्षमता भी महत्वपूर्ण होगी. बढ़ते रेल यातायात के साथ अगर बंदरगाह पर भीड़ बढ़ती है तो DFC से मिलने वाला समय लाभ प्रभावित हो सकता है.
लॉजिस्टिक्स क्षेत्र के लिए गेमचेंजर बनने की उम्मीद
पश्चिमी और पूर्वी DFC के पूरा होने से देश में माल ढुलाई के लिए अलग रेल नेटवर्क तैयार हो गया है. इसका उद्देश्य मालगाड़ियों को यात्री ट्रेनों से अलग करके तेज, भरोसेमंद और अधिक कुशल परिवहन उपलब्ध कराना है.
पश्चिमी DFC खास तौर पर उत्तर भारत के औद्योगिक क्षेत्रों को पश्चिमी तट के बंदरगाहों से जोड़कर निर्यात-आयात कारोबार को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है. इससे माल ढुलाई का समय कम होने, लॉजिस्टिक्स लागत घटने और उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ने की उम्मीद है.
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