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अपनी स्याही से कई दशक तक राज करने वाले कैमलिन के प्रमुख का निधन, शोक में इंडस्ट्री
कैमलिन कंपनी की प्रतीक पहले घोड़ा हुआ करता था लेकिन बाद में इसे ऊंट कर दिया गया. हालांकि कंपनी ने अपना नाम 1908 तक नहीं बदला.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago
1980-90 के दौर में बाजार में दो कंपनियों की ही स्याही की प्रतिस्पर्धा हुआ करती थी.एक ओर चेलपार्क कंपनी की स्याही की धूम थी तो दूसरी ओर कैमलिन इंक की अपनी खासियत और अपना बाजार हुआ करता था.इन दोनों ही कंपनियों ने स्टेशनरी में खूब धूम मचाई. लेकिन देर रात कैमलिन को इस मुकाम पर पहुंचाने वाले सुभाष दांडेकर का मुंबई में निधन हो गया. सुभाष दांडेकर ने कैमलिन को जापान की कंपनी कोकुयो को बेच दिया था. उनके निधन पर इंडस्ट्री से लेकर महाराष्ट्र के पूर्व सीएम देवेन्द्र फणनवीस ने दुख जताया है.
कौन थे सुभाष दांडेकर?
कैमलिन की शुरुआत आजादी से पहले 1931 में हुई थी. कंपनी की शुरुआत सुभाष दांडेकर और उनके भाई जीपी दांडेकर ने की थी. कैमलिन ने सबसे पहले स्याही पाउडर की शुरुआत की. इसे कंपनी ने हार्स ब्रैंड नाम दिया गया. इसके बाद दोनों भाईयों ने कंपनी के प्रोडक्ट का विस्तार किया और चॉक, स्टांप पेड और गोंद के बाजार में एंट्री ली. इसके बाद 1960 में जब कंपनी सुभाष दांडेकर के हाथों में आई तो उन्होंने इसकी सफलता को और चार चांद लगा दिए. सुभाष दांडेकर ने ग्लासगो से कलर कैमिस्ट्री में डिग्री हासिल की और भारत में रंगों की शुरुआत की. इसके लिए उन्होंने पहले लैब बनाई उसके बाद भारत के बाजार के अनुसार रंग बनाने शुरू कर दिए. कंपनी को विस्तार देने से वो यही नहीं रूके, 1962 में उन्होंने फिर विस्तार किया और आर्ट मार्केट में एंट्री ली.
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बाजार में इस वर्ष हुई लिस्ट
कैमलिन की सफलता आर्ट मार्केट की शुरुआत के साथ थमा नहीं बल्कि और आगे बढ़ा. 1974 में कंपनी ने वूडन पेंसिल की शुरुआत की. इसके बाद वो सफर आया जब कंपनी बाजार में लिस्ट हो गई . ये वर्ष 1987 था जब कंपनी को ये उपलब्धि मिली.कंपनी का सफर आगे बढ़ता रहा और 1989 में कैमलिन ने जापान की कंपनी के साथ एक टेक डील की. इसके बाद 21वीं सदी की शुरुआत में कंपनी ने वर्ष 2002 में अपनी बड़ी हिस्सेदारी कोकुयो को बेच दी.
पहले ब्रैंड का प्रतीक हुआ करता था घोड़ा
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, कैमलिन कंपनी की प्रतीक पहले घोड़ा हुआ करता था लेकिन बाद में इसे ऊंट कर दिया गया. हालांकि कंपनी ने अपना नाम 1908 तक नहीं बदला. सुभाष दांडेकर ने कहीं सुना था जब महात्मा गांधी की हत्या हुई थी तो एक कलाकार को गांधी जी का चित्र बनाने काम दिया गया था. लेकिन जब कलाकार ने उस तस्वीर को बनाने के लिए सामाग्री मांगी तो उसे विंसर न्यूटन रंग और कैनवास उपलब्ध कराए गए. इस पर सुभाष दांडेकर को बेहद दुख हुआ और उन्होंने कहा कि ये बेहद दुखद बात है कि स्वदेशी आंदोलन के जनक महात्मा गांधी की तस्वीर बनाने के लिए विदेशी सामान का इस्तेमाल किया जा रहा है.
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