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340 अरब डॉलर के एल्गोरिदम का झूठ जिसने भारत की अर्थव्यवस्था की कहानी बदल दी

एक निजी विदेशी एल्गोरिद्म ने चुपचाप भारत की अर्थव्यवस्था से जुड़ी सबसे बड़ी सुर्खियों में से एक गढ़ दी और किसी ने उसकी जांच तक नहीं की.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 hour ago

पलक शाह

जून 2026 में पेरिस स्थित आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (OECD) ने अपनी 'एशिया कैपिटल मार्केट्स रिपोर्ट 2026' प्रकाशित की, जिसमें दावा किया गया कि पिछले 12 महीनों के दौरान भारत में 340 अरब डॉलर का क्रिप्टोकरेंसी निवेश (इनफ्लो) आया. यह राशि भारत की सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 9 प्रतिशत बताई गई. इस दावे का पूरा आधार केवल Chainalysis था, जो अमेरिका की एक निजी ब्लॉकचेन एनालिटिक्स कंपनी है. यह कंपनी सरकारों को निगरानी (सर्विलांस) सॉफ्टवेयर बेचती है और इसकी कार्यप्रणाली (मेथडोलॉजी) का कभी स्वतंत्र ऑडिट नहीं हुआ है.

कुछ ही दिनों में इस आंकड़े को भारत के क्रिप्टो एक्सचेंज लॉबी ने व्यापक रूप से प्रचारित किया और यह उस समय चर्चा का हिस्सा बन गया, जब संसद की एक समिति क्रिप्टोकरेंसी नियमन पर सुनवाई करने वाली थी, जिसमें भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को अपने सतर्क रुख का बचाव करना था.

लेकिन BW की जांच में सामने आया कि 340 अरब डॉलर का यह आंकड़ा भारत में आई वास्तविक पूंजी को नहीं दर्शाता. यह केवल ब्लॉकचेन पर दर्ज कुल लेनदेन (ग्रॉस ऑन-चेन ट्रांजैक्शन वॉल्यूम) को मापता है, जिसमें एक ही पैसा कई बार अलग-अलग एक्सचेंजों के जरिए घूमने से आंकड़ा बढ़ जाता है. इसका भारत के आधिकारिक भुगतान संतुलन (Balance of Payments), विदेशी मुद्रा भंडार या सरकार के किसी भी आधिकारिक वित्तीय रिकॉर्ड से कोई मेल नहीं है.

यदि वास्तव में एक वर्ष में 340 अरब डॉलर क्रिप्टोकरेंसी के माध्यम से भारत में आए होते, तो यह देश की GDP का लगभग 9 प्रतिशत होता. यह भारत में आए कुल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) से चार गुना से भी अधिक होता. यह आधुनिक भारतीय आर्थिक इतिहास में दर्ज सबसे बड़े पूंजी प्रवाहों में शामिल होता. यह आज के मूल्य के हिसाब से मार्शल प्लान से भी बड़ा और 1997 के एशियाई वित्तीय संकट के बाद किसी भी उभरते एशियाई बाजार में एक वर्ष के सबसे बड़े विदेशी पूंजी प्रवाह के बराबर होता.

ऐसी स्थिति में रुपये की विनिमय दर पर असर दिखता. भारतीय रिजर्व बैंक को आपात बैठकें बुलानी पड़तीं. संसद जवाब मांगती. वित्त मंत्रालय को आधिकारिक बयान जारी करने पड़ते. लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ.

फिर भी न्यूयॉर्क स्थित एक निजी एल्गोरिद्म ने यह घोषित कर दिया कि ऐसा हुआ था और भारत के लगभग पूरे वित्तीय मीडिया ने इस पर भरोसा कर लिया.

OECD की एशिया कैपिटल मार्केट्स रिपोर्ट 2026 जून में प्रकाशित हुई. कुछ ही घंटों के भीतर भारत के लगभग सभी प्रमुख बिजनेस मीडिया संस्थानों में एक जैसी सुर्खियां दिखाई देने लगीं कि जून 2024 से जून 2025 के बीच भारत में 340 अरब डॉलर का क्रिप्टो निवेश आया, जो GDP का 9 प्रतिशत है और एशिया में सबसे अधिक है. इस आंकड़े का हवाला विश्लेषकों ने दिया, क्रिप्टो एक्सचेंजों ने इसे साझा किया, नीति विशेषज्ञों ने सोशल मीडिया पर प्रसारित किया और देखते ही देखते इसे आर्थिक तथ्य के रूप में स्वीकार कर लिया गया.

लेकिन किसी ने रिपोर्ट का फुटनोट नहीं देखा.

रिपोर्ट के डेटा सेक्शन में एक छोटा-सा उल्लेख था कि यह पूरा आंकड़ा **Chainalysis** से लिया गया है. यह न्यूयॉर्क में पंजीकृत एक निजी ब्लॉकचेन एनालिटिक्स कंपनी है, जिसकी अधिकतम वैल्यूएशन 8.6 अरब डॉलर रही है. इसके राजस्व का बड़ा हिस्सा अमेरिकी संघीय एजेंसियों जैसे FBI, IRS, DEA, DOJ और दर्जनभर अन्य सरकारी संस्थाओं के साथ किए गए निगरानी संबंधी अनुबंधों से आता है.

यह कहानी इस बारे में है कि एक ऐसा आंकड़ा, जिसका वास्तविक अर्थ शायद वही नहीं है जो बताया गया, कैसे एक निजी एल्गोरिद्म से निकलकर OECD की रिपोर्ट तक पहुंचा और फिर वहां से भारत की आर्थिक सोच का हिस्सा बन गया. यह सब ठीक उस समय हुआ, जब क्रिप्टो नीति पर देश में एक महत्वपूर्ण बहस चल रही थी.

समय महज संयोग नहीं था

2 जुलाई 2026 को. यानी भारतीय मीडिया में OECD की रिपोर्ट के व्यापक रूप से प्रसारित होने के सिर्फ चार दिन बाद. संसद की वित्त संबंधी स्थायी समिति ने क्रिप्टोकरेंसी नियमन पर बैठक बुलाई. पहली बार भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने समिति के सामने सीधे अपना पक्ष रखा. RBI, जो लगातार और खुलकर भारत में क्रिप्टोकरेंसी को औपचारिक मान्यता देने का विरोध करता रहा है, उसकी आमने-सामने बैठक CoinDCX और CoinSwitch जैसे क्रिप्टो एक्सचेंजों के प्रतिनिधियों से हुई. ये कंपनियां लंबे समय से नियामकीय स्पष्टता यानी व्यवहारिक रूप से क्रिप्टो को औपचारिक स्वीकृति दिलाने के लिए प्रयास कर रही हैं.

340 अरब डॉलर का आंकड़ा समिति की बैठक शुरू होने से पहले ही वहां पहुंच चुका था.

इस प्रकाशन के अनुरोध पर OECD रिपोर्ट की समीक्षा करने वाले और संस्थागत निवेशकों के लिए पूंजी प्रवाह पर नजर रखने वाले एक वरिष्ठ अर्थशास्त्री ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर कहा, "इस तरह का आंकड़ा पहले से तय निष्कर्ष (Fait Accompli) जैसा तर्क बन जाता है. यह नियामकीय बहस को 'क्या हमें इसकी अनुमति देनी चाहिए?' से बदलकर 'जब यह पहले ही हमारी GDP का 9 प्रतिशत है तो इसे कैसे नियंत्रित किया जाए?' पर ले आता है. यह बहुत बड़ा बदलाव है. और यदि यह आंकड़ा ही पद्धतिगत रूप से टिकाऊ नहीं है, तो इसके आधार पर बनाया गया पूरा नीतिगत दबाव ढह जाता है."

बैठक से जुड़े लोगों के अनुसार, समिति के सामने RBI का रुख पहले की तरह सतर्क ही रहा. लेकिन OECD की विश्वसनीयता के साथ आया 340 अरब डॉलर का आंकड़ा सार्वजनिक विमर्श में अपना असर छोड़ चुका था. इससे केंद्रीय बैंक को एक ऐसे संस्थान के रूप में पेश किया गया जो एक कथित अटल आर्थिक वास्तविकता का विरोध कर रहा हो.

हितों का पीछा करें

पत्रकारिता में जब कोई बड़ा दावा तेजी से फैलता है और कोई उसकी जांच नहीं करता, तो पहला सवाल हमेशा यही होता है. इससे फायदा किसे होता है?

सबसे पहले Chainalysis को देखें. जिस कंपनी ने यह मूल आंकड़ा तैयार किया, वह कोई शोध संस्थान नहीं है. यह एक व्यावसायिक कंपनी है, जिसकी वार्षिक आवर्ती आय (Annual Recurring Revenue) करीब 25 करोड़ डॉलर है. इसके 1,500 से अधिक सरकारी एजेंसियां ग्राहक हैं और 2022 में अपने उच्चतम स्तर 8.6 अरब डॉलर की वैल्यूएशन से गिरकर अब इसकी अनुमानित वैल्यू करीब 2.5 अरब डॉलर रह गई है. यानी लगभग 70 प्रतिशत की गिरावट. कंपनी अभी तक लाभ में भी नहीं पहुंची है.

Chainalysis का कारोबारी मॉडल एक सरल सिद्धांत पर आधारित है. जितनी अधिक सरकारें क्रिप्टोकरेंसी को एक बड़े, गंभीर और संभावित रूप से जोखिमपूर्ण आर्थिक क्षेत्र के रूप में देखेंगी, उतनी ही उन्हें ब्लॉकचेन निगरानी और अनुपालन (Compliance) सॉफ्टवेयर की जरूरत पड़ेगी. भारत के क्रिप्टो बाजार को GDP के 9 प्रतिशत के बराबर बताने वाली हर सुर्खी, Chainalysis के लिए एक बिक्री दस्तावेज जैसी है. यह हर नियामक, हर वित्तीय खुफिया इकाई और हर कानून प्रवर्तन एजेंसी के लिए सीधा संदेश है कि यह बाजार इतना बड़ा है कि इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता और इसकी निगरानी के लिए उनके उपकरण जरूरी हैं.

यह जरूरी नहीं कि कंपनी ने जानबूझकर यह आंकड़ा गढ़ा हो. समस्या सिर्फ इतनी है कि उसने ऐसी कार्यप्रणाली तैयार की हो, जो अपने ढांचे के कारण बहुत बड़े आंकड़े पैदा करती हो और वही कार्यप्रणाली बाद में किसी प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय संस्था की रिपोर्ट की अदृश्य नींव बन जाए.

भारत के एक नियामक निकाय के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी ने, जिन्होंने पृष्ठभूमि की शर्त पर बात की, कहा, "इसी वजह से क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों, वित्तीय बेंचमार्क और बाजार संबंधी डेटा उपलब्ध कराने वाली संस्थाओं का स्वतंत्र ऑडिट कराया जाता है. जब किसी निजी संस्था के व्यावसायिक हित किसी विशेष निष्कर्ष से सीधे जुड़े हों, तो उसकी कार्यप्रणाली को केवल उसके स्वयं के प्रमाणन के आधार पर स्वीकार नहीं किया जा सकता. विश्वसनीय आंकड़े इसी तरह काम नहीं करते. यह हैरानी की बात है कि OECD जैसी संस्था ने इस डेटा को बिना किसी स्पष्ट स्वतंत्र सत्यापन के स्वीकार कर लिया."

भारत का क्रिप्टो एक्सचेंज उद्योग भी 340 अरब डॉलर के इस आंकड़े को व्यापक रूप से प्रचारित करने का अपना कारण रखता है. CoinDCX और CoinSwitch जैसी कंपनियां संसद की वित्त समिति के सामने नियामकीय सामान्यीकरण की मांग कर चुकी हैं. उनके लिए सबसे मजबूत तर्क वही है, जो यह आंकड़ा प्रस्तुत करता है. यानी भारत की क्रिप्टो अर्थव्यवस्था पहले से ही विशाल है, गहराई तक स्थापित हो चुकी है और सक्रिय रूप से काम कर रही है. ऐसे में प्रतिबंध या अत्यधिक सख्त नियम व्यावहारिक नहीं होंगे. 340 अरब डॉलर की यह सुर्खी उनके लिए लॉबिंग का प्रभावी माध्यम बन जाती है. इसमें कोई लागत नहीं आती और यह OECD जैसी संस्था की विश्वसनीयता के साथ पहले से तैयार रूप में मिल जाती है.

अब OECD की भूमिका भी देखिए. पिछले तीन वर्षों से यह संस्था **Crypto-Asset Reporting Framework (CARF)** को विकसित और बढ़ावा दे रही है. यह एक बहुपक्षीय कर रिपोर्टिंग व्यवस्था है, जिसके तहत सदस्य देशों के क्रिप्टो एक्सचेंजों को सीमा पार लेनदेन संबंधी डेटा साझा करना होगा. भारत ने अप्रैल 2027 तक CARF लागू करने की प्रतिबद्धता जताई है. ऐसे में OECD का भी संस्थागत हित इसी बात में है कि क्रिप्टो बाजार को बड़ा, जटिल और वैश्विक रूप से परस्पर जुड़ा हुआ बताया जाए, ताकि उसी ढांचे की आवश्यकता साबित हो सके, जिसे OECD बढ़ावा दे रहा है. भारत में 340 अरब डॉलर का आंकड़ा ठीक इसी कहानी को मजबूत करता है.

इन तथ्यों में कहीं भी किसी समन्वित साजिश का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है. लेकिन यह निश्चित रूप से प्रोत्साहनों (Incentives) की ऐसी संरचना दिखाते हैं, जिसमें एक बेहद संदिग्ध आंकड़ा बिना किसी गंभीर जांच के व्यापक रूप से फैल गया. जिन पक्षों के हित इससे जुड़े थे, उन्होंने इसे उत्साहपूर्वक अपनाया और जिस स्तर की जांच किसी इतने बड़े वित्तीय आंकड़े पर सामान्य रूप से होनी चाहिए थी, वह कभी नहीं हुई.

यह आंकड़ा वास्तव में क्या मापता है

Chainalysis पूंजी (Capital) को नहीं मापता. यह "ऑन-चेन वैल्यू रिसीव्ड" (On-chain Value Received) नामक एक मापदंड का उपयोग करता है. इसका अर्थ है कि किसी देश के उपयोगकर्ताओं से जुड़े ब्लॉकचेन पतों (Addresses) पर पहुंची कुल क्रिप्टोकरेंसी का मूल्य. इस अनुमान को कंपनी एक्सचेंज वेबसाइटों पर आने वाले वेब ट्रैफिक के पैटर्न के आधार पर तैयार करती है.

कंपनी की अपनी प्रकाशित कार्यप्रणाली में लिखा है.

"हम विभिन्न प्रकार की क्रिप्टोकरेंसी सेवाओं और प्रोटोकॉल के लिए देशों के लेनदेन की मात्रा का अनुमान, उन सेवाओं और प्रोटोकॉल की वेबसाइटों पर आने वाले वेब ट्रैफिक के पैटर्न के आधार पर लगाते हैं."

यानी कंपनी यह देखती है कि कौन लोग क्रिप्टो एक्सचेंजों की वेबसाइटों पर जा रहे हैं. फिर उसी ट्रैफिक के आधार पर लेनदेन का अनुमान लगाती है और IP एड्रेस के जरिए उसे संबंधित देशों से जोड़ देती है.

असल समस्या डेटा जुटाने के तरीके में नहीं है. समस्या इस बात में है कि व्यवहार में "वैल्यू रिसीव्ड" का अर्थ क्या होता है. हर बार जब वही क्रिप्टोकरेंसी किसी नए पते पर पहुंचती है, तो उसे फिर से गिना जाता है. यानी वही पैसा बार-बार गिना जाता है.

भारतीय खुदरा निवेशकों के सामान्य ट्रेडिंग व्यवहार को समझिए. कोई निवेशक एक एक्सचेंज पर बिटकॉइन खरीदता है. बेहतर कीमत पाने के लिए उसे दूसरे एक्सचेंज में भेजता है. फिर सुरक्षा के लिए उसे USDT में बदल देता है. इसके बाद उस USDT को किसी DeFi लेंडिंग प्रोटोकॉल में स्थानांतरित करता है और अंत में उसे वापस किसी एक्सचेंज में ले आता है. इस पूरी प्रक्रिया में मूल निवेश सिर्फ 10 लाख रुपये का था. लेकिन उससे "वैल्यू रिसीव्ड" की चार या पांच अलग-अलग घटनाएं दर्ज हो जाती हैं. वास्तविक पूंजी अब भी 10 लाख रुपये ही रहती है, जबकि रिकॉर्ड की गई "वैल्यू रिसीव्ड" 40 से 50 लाख रुपये तक पहुंच जाती है.

यदि लाखों भारतीय ट्रेडर 12 महीनों तक हर दिन इस तरह कई लेनदेन करें, तो केवल पैसे के बार-बार घूमने (Velocity Effect) के कारण "वैल्यू रिसीव्ड" का कुल आंकड़ा वास्तविक निवेश से चार या पांच गुना तक बढ़ सकता है. लेकिन 340 अरब डॉलर के इस दावे को प्रकाशित करने वालों में से किसी ने भी यह गणना नहीं की और न ही Chainalysis से इसका स्पष्टीकरण मांगा.

Chainalysis ने अपनी ही रिपोर्ट में स्वीकार किया है कि उसका विश्लेषण "OTC डेस्क, हवाला जैसे अनौपचारिक बाजारों या नकद आधारित क्रिप्टो दुकानों के माध्यम से होने वाली गतिविधियों को शामिल नहीं करता."

दूसरे शब्दों में, 340 अरब डॉलर का यह आंकड़ा एक साथ दो तरह की त्रुटि करता है. एक ओर यह औपचारिक एक्सचेंजों पर होने वाले लेनदेन को Velocity Effect के कारण जरूरत से ज्यादा दिखाता है, वहीं दूसरी ओर अनौपचारिक बाजार की गतिविधियों को पूरी तरह नजरअंदाज कर देता है. इसलिए यह भारत की क्रिप्टो अर्थव्यवस्था का कोई सतर्क या कम अनुमान नहीं है, बल्कि दोनों दिशाओं में गलत माप है.

VPN की समस्या इस स्थिति को और जटिल बना देती है. भारत में 2024 में दूरसंचार नियामकों द्वारा Binance पर रोक लगाए जाने और वैश्विक एक्सचेंजों तक पहुंच समय-समय पर सीमित किए जाने के बाद, क्रिप्टो ट्रेडरों के बीच VPN का उपयोग सामान्य बात बन चुका है. जब कोई भारतीय उपयोगकर्ता सिंगापुर के VPN सर्वर के जरिए किसी सिंगापुर स्थित एक्सचेंज से जुड़ता है, तो संभव है कि Chainalysis उस पूरे लेनदेन को सिंगापुर के खाते में जोड़ दे. यदि ट्रैफिक की पहचान गलत होती है, तो भारत का आंकड़ा कम हो जाएगा. यदि पहचान सही होती है, तो बढ़ जाएगा. लेकिन इस त्रुटि का आकलन संभव नहीं है, क्योंकि Chainalysis ने कभी भी अपने फॉल्स पॉजिटिव और फॉल्स नेगेटिव की दर सार्वजनिक नहीं की है. बल्कि अदालत में उसने यह भी स्वीकार किया है कि वह इनका व्यवस्थित रिकॉर्ड नहीं रखती.

अमेरिका में Chainalysis की कार्यप्रणाली को चुनौती देने वाले वकील टॉर एकेलैंड ने कंपनी के उपकरणों को "जंक साइंस, जिसका संघीय अदालत में कोई स्थान नहीं होना चाहिए" बताया था.

2022 में Chainalysis की जांच प्रमुख एलिजाबेथ बिस्बी से शपथ के तहत पूछा गया कि क्या कंपनी ने अपने Reactor सॉफ्टवेयर के लिए त्रुटि की सीमा (Margin of Error) की गणना की है. उन्होंने जवाब दिया कि उन्हें ऐसी किसी गणना की जानकारी नहीं है.

एक प्रतिस्पर्धी एनालिटिक्स कंपनी CipherTrace ने विशेष परीक्षण परिस्थितियों में Chainalysis की मुख्य क्लस्टरिंग तकनीक में 64 प्रतिशत तक की विसंगति पाई थी. आज तक Chainalysis की देशों के आधार पर डेटा आवंटित करने की कार्यप्रणाली का कोई स्वतंत्र, सहकर्मी-समीक्षित (Peer Reviewed) सत्यापन प्रकाशित नहीं हुआ है.

फिर भी OECD ने इसी कंपनी के आंकड़ों को आर्थिक तथ्य के रूप में उद्धृत किया.

वह साधारण जांच जो पूरी बहस खत्म कर देती है

कार्यप्रणाली पर बहस करने से भी आसान एक परीक्षण है. इसे करने में केवल 30 सेकंड लगते हैं.

वित्त वर्ष 2024-25 में भारत को 81 अरब डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) प्राप्त हुआ. यह आंकड़ा भारत सरकार ने जारी किया, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने सत्यापित किया, वाणिज्य मंत्रालय के आधिकारिक आंकड़ों में प्रकाशित हुआ और वित्त मंत्रालय ने प्रेस विज्ञप्ति के जरिए इसकी घोषणा की. भारत में आने वाले विदेशी निवेश का प्रत्येक रुपया विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (FEMA) के तहत दर्ज किया जाता है, जहां हर विदेशी पूंजी प्रवाह की अनिवार्य रिपोर्टिंग होती है.

इसी वर्ष विदेशों में काम कर रहे भारतीयों ने 135 अरब डॉलर की रिकॉर्ड धनराशि (Remittances) देश भेजी. यह आंकड़ा भी RBI ने जारी किया और बैंकिंग प्रणाली के माध्यम से प्रत्येक लेनदेन के आधार पर दर्ज किया गया. ये दोनों आंकड़े भारत की अर्थव्यवस्था में सबसे अधिक निगरानी वाले पूंजी प्रवाह का प्रतिनिधित्व करते हैं. दोनों को मिलाकर कुल राशि 216 अरब डॉलर होती है.

इसके विपरीत, OECD का दावा है कि Chainalysis के आंकड़ों के अनुसार इसी अवधि में भारत को क्रिप्टोकरेंसी के जरिए 340 अरब डॉलर प्राप्त हुए. यानी यह 340 अरब डॉलर भारत के पूंजी खाते (Capital Account) में कहीं दर्ज नहीं हुआ. इसके लिए FEMA के तहत कोई रिपोर्टिंग नहीं हुई. यह RBI की विदेशी मुद्रा निगरानी प्रणाली की नजर से भी पूरी तरह बच गया, जबकि यह प्रणाली सीमा पार होने वाले हर बड़े पूंजी प्रवाह पर बेहद बारीकी से नजर रखती है. इतना ही नहीं, इस कथित निवेश का रुपये की विनिमय दर, भारत के विदेशी मुद्रा भंडार, मुद्रा आपूर्ति या कर संग्रह पर भी कोई स्पष्ट प्रभाव नहीं पड़ा.

एक अंतरराष्ट्रीय संस्थागत निवेशक के लिए उभरते बाजारों में पूंजी प्रवाह पर नजर रखने वाले अर्थशास्त्री ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर कहा, "यदि आप किसी गंभीर मैक्रोइकोनॉमिस्ट से कहें कि भारत की GDP का 9 प्रतिशत हिस्सा एक ही माध्यम से एक वर्ष में देश में आया और केंद्रीय बैंक को इसकी भनक तक नहीं लगी, तो वह सीधा कहेगा कि यह आंकड़ा गलत है. बस. यह कार्यप्रणाली की बहस नहीं है. यह साधारण अंकगणित का सवाल है."

संप्रभुता का सवाल

अब कार्यप्रणाली और प्रोत्साहनों की बहस से थोड़ा पीछे हटकर देखिए कि वास्तव में यहां हुआ क्या है.

भारत की आर्थिक कहानी. यानी देश की अपनी वित्तीय स्थिति और बड़े पैमाने पर अनियमित परिसंपत्ति वर्ग (क्रिप्टोकरेंसी) के प्रति उसकी समझ. एक ऐसे निजी अमेरिकी एल्गोरिद्म द्वारा तय की जा रही है, जिसका संचालन एक निजी कंपनी करती है. भारत का कोई नियामक उसका ऑडिट नहीं कर सकता. कोई भारतीय अदालत उसे अपनी कार्यप्रणाली सार्वजनिक करने का आदेश नहीं दे सकती. संसद उसे जवाबदेह नहीं ठहरा सकती. इस डेटा को सूचना के अधिकार (FOI) के तहत भी प्राप्त नहीं किया जा सकता और न ही स्वतंत्र रूप से सत्यापित किया जा सकता है. लेकिन OECD की मुहर लगने के बाद इसे भारत के अधिकांश संपादकों ने अंतिम और निर्विवाद सत्य मान लिया.

यह पूरी व्यवस्था असहज रूप से परिचित लगती है.

2008 के वैश्विक वित्तीय संकट से पहले भी क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां. जो स्वयं निजी कंपनियां थीं और जिनके व्यावसायिक हित उनके निष्कर्षों से सीधे जुड़े थे. उन्होंने ऐसे वित्तीय उत्पादों को AAA रेटिंग दे दी थी, जो वास्तव में बेहद जोखिमपूर्ण थे. उनकी कार्यप्रणाली भी निजी थी. उन्हें भी प्रतिष्ठित वित्तीय संस्थानों का समर्थन प्राप्त था. अंतर केवल इतना है कि इस बार परिसंपत्ति वर्ग नया है, कार्यप्रणाली पहले से भी अधिक अपारदर्शी है और जिस देश को उसकी अपनी अर्थव्यवस्था की कहानी सुनाई जा रही है, वह भारत है. दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था. जो इस समय इस महत्वपूर्ण बहस के बीच खड़ी है कि क्रिप्टोकरेंसी को कैसे और किस सीमा तक विनियमित किया जाए. RBI जहां इसका लगातार विरोध करता रहा है, वहीं क्रिप्टो उद्योग इसे वैधता दिलाने के लिए सक्रिय रूप से प्रयास कर रहा है.

इस प्रकाशन के अनुरोध पर रिपोर्ट की समीक्षा करने वाले एक ब्लॉकचेन शोधकर्ता ने कहा, "इस पूरे मामले में संप्रभुता (Sovereignty) का पहलू लगभग पूरी तरह गायब रहा है. एक अपारदर्शी विदेशी एल्गोरिद्म ने प्रभावी रूप से भारत के सबसे अधिक उद्धृत आर्थिक आंकड़ों में से एक तैयार कर दिया. यदि यही आंकड़ा भारत के राजकोषीय घाटे, चालू खाते या महंगाई से संबंधित होता और इसे किसी निजी अमेरिकी कंपनी ने बिना स्वतंत्र ऑडिट के तैयार किया होता, तो भारी विरोध होता. लेकिन क्योंकि मामला क्रिप्टोकरेंसी का है, इसलिए लगभग सभी ने इसे बिना सवाल स्वीकार कर लिया."

वास्तव में सच क्या है

यह सच है कि भारत में क्रिप्टोकरेंसी का बाजार बड़ा और सक्रिय है. इस बात पर कोई विवाद नहीं है. लाखों भारतीय डिजिटल परिसंपत्तियों में कारोबार करते हैं. विशेषकर युवा शहरी निवेशकों के बीच डॉलर में निवेश की इच्छा और प्रवासी भारतीयों (NRI) के सीमा पार धन हस्तांतरण के कारण स्टेबलकॉइन का उपयोग लगातार बढ़ रहा है. भारत के साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर (I4C) द्वारा दर्ज हवाला-से-क्रिप्टो नेटवर्क वास्तव में कानून प्रवर्तन एजेंसियों के लिए एक गंभीर चुनौती है. आयकर विभाग द्वारा क्रिप्टो ट्रेडरों को भेजे गए 44,000 नोटिस भी इस बात का संकेत हैं कि इस क्षेत्र में वास्तविक और आंशिक रूप से अघोषित कारोबार हो रहा है.

भारत की वास्तविक क्रिप्टो अर्थव्यवस्था. यानी पहली बार रुपये को डिजिटल परिसंपत्तियों में बदला गया वास्तविक निवेश और वास्तव में लगाई गई पूंजी. संभवतः 20 से 50 अरब डॉलर के बीच रही होगी. यह भी एक बड़ी राशि है. यह नियामकों के लिए एक वास्तविक चुनौती और कर प्रशासन के लिए गंभीर प्राथमिकता का विषय है. यह अपने आप में एक महत्वपूर्ण कहानी है.

लेकिन यह 340 अरब डॉलर नहीं है.

और 30 अरब डॉलर तथा 340 अरब डॉलर के बीच का अंतर कोई मामूली गणना त्रुटि नहीं है. यह एक बढ़ते खुदरा निवेश बाजार और पूरी अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाली असाधारण घटना (Existential Macroeconomic Event) के बीच का अंतर है. यह एक सामान्य नीतिगत चुनौती और पहले से तय हो चुके निष्कर्ष (Fait Accompli) के बीच का अंतर है. यह "भारत को क्रिप्टोकरेंसी के नियमन पर गंभीरता से विचार करना चाहिए" और "भारत चाहे या न चाहे, वह पहले ही एक क्रिप्टो अर्थव्यवस्था बन चुका है" जैसी दो बिल्कुल अलग कहानियों के बीच का अंतर है.

340 अरब डॉलर वाली यही दूसरी कहानी ठीक उसी समय सामने आती है, जब भारत की संसद, भारतीय रिजर्व बैंक और वित्तीय नीति निर्माता यह तय कर रहे हैं कि क्रिप्टोकरेंसी के साथ आगे क्या किया जाए. यह OECD की विश्वसनीयता के साथ प्रस्तुत होती है. इसे उन क्रिप्टो एक्सचेंजों द्वारा बढ़ावा दिया जाता है, जिनका इस परिणाम में प्रत्यक्ष व्यावसायिक हित है. और इसकी पूरी नींव ऐसे आधार पर टिकी है, जो किसी भी गंभीर सवाल का सामना नहीं कर सकती.

वह सवाल जो कभी पूछा ही नहीं गया

जब से यह रिपोर्ट सार्वजनिक चर्चा में आई है, भारत के किसी बड़े वित्तीय प्रकाशन ने Chainalysis से यह नहीं पूछा कि व्यवहार में “ऑन-चेन वैल्यू रिसीव्ड” का अर्थ क्या है. किसी ने OECD से यह नहीं पूछा कि उसने Velocity Effect से बढ़े हुए लेनदेन के आंकड़े को “क्यूम्युलेटिव इन्वेस्टमेंट” कैसे बताया. किसी ने 340 अरब डॉलर की तुलना भारत के आधिकारिक पूंजी खाते (Capital Account) के आंकड़ों से नहीं की और न ही इस दावे की व्यावहारिक असंभवता पर सवाल उठाया. किसी ने यह भी नहीं पूछा कि जिस कंपनी ने यह आंकड़ा तैयार किया, क्या उसका बड़े आंकड़े दिखाने में व्यावसायिक हित जुड़ा हुआ है.

आंकड़े वैश्विक स्तर पर संयोग से नहीं फैलते. वे इसलिए फैलते हैं क्योंकि उनके इर्द-गिर्द मौजूद प्रोत्साहनों (Incentives) की संरचना उनके प्रसार को पुरस्कृत करती है और उनकी जांच को हतोत्साहित करती है. हर एक्सचेंज जिसने यह सुर्खी साझा की, हर विश्लेषक जिसने इसका हवाला दिया, हर संपादक जिसने बिना किसी चेतावनी के इसे प्रकाशित किया. उन सभी ने एक छोटा-सा निर्णय लिया. और उन छोटे निर्णयों के सामूहिक प्रभाव ने एक निजी तौर पर निर्मित आंकड़े को आर्थिक सत्य का दर्जा दिला दिया.

340 अरब डॉलर किसी भी सार्थक अर्थ में वह राशि नहीं है, जो भारत को प्राप्त हुई. यह वह राशि है, जो एक एल्गोरिद्म ने कहा कि भारत को मिली. ऐसी डिजिटल परिसंपत्ति में, जिसे मुद्रा नहीं माना जाता. ऐसी कार्यप्रणाली के आधार पर, जिसका कभी स्वतंत्र ऑडिट नहीं हुआ. ऐसी कंपनी द्वारा प्रकाशित, जो सरकारों के इसी विश्वास से लाभ कमाती है. और फिर ऐसे सूचना तंत्र द्वारा दोहराई गई, जिसने विश्वसनीय स्रोत और सत्यापित तथ्य के बीच का अंतर मिटा दिया.

यह केवल क्रिप्टोकरेंसी की कहानी नहीं है. यह इस बात की कहानी है कि आर्थिक वास्तविकता कैसे निर्मित की जाती है.

प्रकाशन से पहले Chainalysis और OECD दोनों से टिप्पणी मांगी गई थी. OECD ने कोई जवाब नहीं दिया. Chainalysis ने कहा, “संपर्क करने के लिए धन्यवाद. इस सप्ताह हमारे पास स्टाफ की कमी है और आपके प्रश्नों की समीक्षा के लिए हमें अतिरिक्त समय चाहिए.”

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
 


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RBI की छमाही वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट (Financial Stability Report) के अनुसार, पश्चिम एशिया में अंतरिम शांति समझौते के बाद भू-राजनीतिक तनाव से जुड़े जोखिमों में कमी आई है.

5 hours ago

बाजार की कमजोर शुरुआत के संकेत, GIFT Nifty फिसला, आज इन शेयरों में दिख सकती है हलचल

मंगलवार को कारोबार के अंत में सेंसेक्स 249.70 अंक गिरकर 76,478.67 अंक पर बंद हुआ. वहीं, निफ्टी 50, 80.50 अंक की गिरावट के साथ 23,865.75 अंक पर बंद हुआ.

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बड़ी खबरें

सरकार पर बढ़ा वित्तीय दबाव, दो महीनों में राजकोषीय घाटा 1.62 लाख करोड़ रुपये पहुंचा

राजस्व संग्रह में गिरावट और बढ़े सरकारी खर्च से बढ़ा घाटा. हालांकि पूंजीगत निवेश की रफ्तार बरकरार रही

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Komerz ने खरीदा ब्रिटेन का NOUGHTY, AI के दम पर ग्लोबल ब्यूटी मार्केट में एंट्री

करीब 6.4 मिलियन पाउंड मूल्य के इस अधिग्रहण में नकद और शेयर, दोनों शामिल हैं. यह Komerz द्वारा किए गए अधिग्रहणों की श्रृंखला का हिस्सा है, जिनका कुल मूल्य अब 50 मिलियन पाउंड से अधिक हो चुका है.

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340 अरब डॉलर के एल्गोरिदम का झूठ जिसने भारत की अर्थव्यवस्था की कहानी बदल दी

एक निजी विदेशी एल्गोरिद्म ने चुपचाप भारत की अर्थव्यवस्था से जुड़ी सबसे बड़ी सुर्खियों में से एक गढ़ दी और किसी ने उसकी जांच तक नहीं की.

1 hour ago

पश्चिम एशिया में शांति से घटी आर्थिक चिंताएं, लेकिन कच्चे तेल और AI शेयरों पर बरकरार जोखिम: RBI

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5 hours ago

शेयरों से मुंह मोड़ सरकारी बॉन्ड की ओर बढ़े विदेशी निवेशक, जून में ₹55,518 करोड़ का रिकॉर्ड निवेश

नेशनल सिक्योरिटीज डिपॉजिटरी लिमिटेड के आंकड़ों के मुताबिक, जून में सोमवार तक विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने ऋण बाजार में 55,518 करोड़ रुपये का शुद्ध निवेश किया.

5 hours ago