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टाटा सन्स ने खारिज की नोएल टाटा की आपत्ति, एन. चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति को बताया वैध
चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति पर टाटा सन्स ने अपना रुख स्पष्ट कर दिया है, लेकिन इससे टाटा सन्स और टाटा ट्रस्ट्स के बीच विवाद समाप्त नहीं हुआ है.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 hour ago
टाटा सन्स और टाटा ट्रस्ट्स के बीच एन. चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति को लेकर विवाद और गहरा गया है. टाटा सन्स ने टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा की आपत्तियों को खारिज करते हुए कहा है कि चंद्रशेखरन को पांच साल के नए कार्यकाल के लिए चेयरमैन नियुक्त करने का 17 सितंबर का बोर्ड फैसला कंपनी के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन और लागू कानून के अनुरूप है. कंपनी ने इस रुख के समर्थन में वरिष्ठ कानूनी विशेषज्ञों की राय का भी हवाला दिया है.
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, टाटा सन्स के कंपनी सेक्रेटरी सुप्रकाश मुखोपाध्याय ने 24 सितंबर को नोएल टाटा को पत्र भेजकर कंपनी का पक्ष रखा. इसमें कहा गया कि बोर्ड ने बहुमत से चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति का फैसला लिया है और यह प्रस्ताव वैध है. हालांकि, इस मामले में टाटा ट्रस्ट्स का रुख इससे अलग है और विवाद अब आर्टिकल 118 और 121 की व्याख्या को लेकर केंद्रित हो गया है.
आर्टिकल 118 को लेकर है मुख्य विवाद
नोएल टाटा की आपत्ति का एक प्रमुख आधार टाटा सन्स के आर्टिकल 118 से जुड़ा है. यह प्रावधान टाटा ट्रस्ट्स के पास कंपनी की 40 फीसदी या उससे अधिक हिस्सेदारी होने की स्थिति में चेयरमैन के चयन के लिए विशेष प्रक्रिया का प्रावधान करता है.
टाटा सन्स का कहना है कि आर्टिकल 118 में दी गई प्रक्रिया नए चेयरमैन की पहली नियुक्ति के लिए है और मौजूदा चेयरमैन की पुनर्नियुक्ति पर लागू नहीं होती. कंपनी ने इसी आधार पर चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति को वैध बताया है.
तीन कानूनी विशेषज्ञों की राय का हवाला
अपने जवाब में टाटा सन्स ने वरिष्ठ अधिवक्ता सुदीप्तो सरकार, पूर्व मुख्य न्यायाधीश यू.यू. ललित और पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज बी.एन. श्रीकृष्ण की कानूनी राय का हवाला दिया है. कंपनी के मुताबिक, इन रायों में 17 सितंबर के बोर्ड फैसले को वैध माना गया है.
विवाद आर्टिकल 121 के तहत वोटिंग प्रक्रिया को लेकर भी है. रिपोर्टों के मुताबिक, चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति के प्रस्ताव पर टाटा ट्रस्ट्स के दो नामित निदेशकों की राय अलग-अलग थी. नोएल टाटा ने प्रस्ताव का विरोध किया, जबकि वेणु श्रीनिवासन ने समर्थन किया. चंद्रशेखरन ने मतदान से खुद को अलग रखा था. इसके बाद कास्टिंग वोट का इस्तेमाल कर प्रस्ताव को मंजूरी दी गई.
पूर्व CJI यू.यू. ललित की राय के मुताबिक, वोट बराबर होने की स्थिति में कास्टिंग वोट का इस्तेमाल किया जा सकता था और 17 सितंबर का प्रस्ताव वैध रूप से पारित हुआ. वहीं, बी.एन. श्रीकृष्ण की राय में भी बोर्ड की कार्रवाई को आर्टिकल 121 के अनुरूप बताया गया है.
हालांकि, दूसरी ओर नोएल टाटा की ओर से प्राप्त कानूनी राय में इस व्याख्या पर आपत्ति जताई गई है. इसलिए फिलहाल दोनों पक्षों की कानूनी व्याख्याएं अलग-अलग हैं.
अगस्त में टली थी AGM
टाटा सन्स ने अपने पत्र में 18 अगस्त को हुई सालाना आम बैठक यानी AGM का भी जिक्र किया. कंपनी के मुताबिक, बैठक में जरूरी कोरम पूरा नहीं हो सका था, क्योंकि टाटा ट्रस्ट्स की ओर से संयुक्त प्रतिनिधि नामित नहीं किया गया था.
टाटा सन्स ने इस घटना को 17 सितंबर को चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति के लिए हुए बोर्ड फैसले से जोड़ने को भी खारिज किया है. कंपनी का कहना है कि दोनों घटनाओं को आपस में जोड़ना उचित नहीं है.
आगे क्या होगा?
चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति पर टाटा सन्स ने अपना रुख स्पष्ट कर दिया है, लेकिन इससे टाटा सन्स और टाटा ट्रस्ट्स के बीच विवाद समाप्त नहीं हुआ है. खास तौर पर आर्टिकल 118 और 121 की व्याख्या तथा कास्टिंग वोट के इस्तेमाल को लेकर दोनों पक्षों के कानूनी रुख अलग हैं.
इसके अलावा, चंद्रशेखरन के निदेशक पद पर बने रहने से जुड़ा मामला कंपनी अधिनियम की धारा 152 के तहत शेयरधारकों के सामने रखा जाना है. ऐसे में आने वाली बैठक इस पूरे घटनाक्रम में अगला महत्वपूर्ण पड़ाव होगी.
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