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सेबी का जापानी समझौता: ऐसे नुकसान का निपटारा, जो अब अस्तित्व में ही नहीं है
एक पूर्णकालिक सदस्य ने निप्पॉन से जुड़े आदेश पर हस्ताक्षर कर दिए हैं. दूसरे सदस्य अभी फैसला नहीं कर पाए हैं. बॉन्ड फिर से जीवित हो गए हैं. और सेबी चेयरमैन की डायरी बार-बार निप्पॉन से टकरा रही है.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 hour ago
पलक शाह
सायोनारा, तर्क
सेबी (SEBI) के लिए यह साल जापानी रंग में रंगा रहा है. चेयरमैन ओसाका गए, जापान के कौंसुल जनरल सेबी आए और सेबी का आदेश जारी होने से पहले ही निप्पॉन का पैसा आ गया. यहां तक कि लेह में 11,500 फीट की ऊंचाई पर भी चेयरमैन ने निप्पॉन इंडिया की शाखा में जाने का समय निकाल लिया. यह शहर की एकमात्र म्यूचुअल फंड कंपनी की शाखा है.
निप्पॉन लाइफ इंडिया एसेट मैनेजमेंट (NAM India) ने यस बैंक के AT-1 बॉन्ड मामले में समझौता करने के लिए सेबी को 96.76 करोड़ रुपये का भुगतान किया है. पैसा कागजी कार्रवाई से पहले पहुंच गया. इस भुगतान को उचित ठहराने वाला आदेश अभी तक पारित नहीं हुआ है. अन्य जगहों पर किसी सौदे पर हस्ताक्षर होने से पहले किए गए भुगतान को अग्रिम राशि कहा जाता है. सेबी में इसे सैद्धांतिक मंजूरी कहा जाता है.
इस आदेश के लिए दो पूर्णकालिक सदस्यों की जरूरत है. मामले से परिचित लोगों के मुताबिक, संदीप प्रधान इस पर हस्ताक्षर कर चुके हैं. केवीआर मूर्ति ने अभी हस्ताक्षर नहीं किए हैं. 15 अक्टूबर से यह फाइल आगे नहीं बढ़ी है. इसी दिन सुप्रीम कोर्ट ने उन बॉन्ड को फिर से जीवित कर दिया था, जिन्हें खत्म माना जा रहा था.
AT-1 बॉन्ड अब तक किसी टीवी धारावाहिक के खलनायक से भी ज्यादा बार खत्म होकर वापस आ चुके हैं. इस बार उनका फिर से जीवित होना सेबी के समझौते को भी अपने साथ ले डूब सकता है.
वह नुकसान, जो हुआ ही नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाई कोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें यस बैंक के 8,415 करोड़ रुपये के AT-1 बॉन्ड को मार्च 2020 में राइट-डाउन करने के फैसले को रद्द कर दिया गया था. सुप्रीम कोर्ट ने इसे पूरी तरह अवैध और अमान्य बताया.
सेबी का अगस्त 2024 का कारण बताओ नोटिस एक आंकड़े पर आधारित है. इसमें योजनाओं के AT-1 बॉन्ड निवेश का मूल्य शून्य माना गया और निवेशकों का नुकसान 1,828.70 करोड़ रुपये आंका गया. समझौता भी इसी आधार पर टिका है. रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, 15 अप्रैल 2026 को सेबी के एक पत्र के जरिए भुगतान की गई राशि का करीब 93 फीसदी, यानी लगभग 89.74 करोड़ रुपये, उन निवेशकों को देने की बात कही गई थी, जिन्हें नुकसान हुआ था.
अब इन बॉन्ड की पूरी कीमत वापस मिल गई है. ब्याज के बकाया भुगतान को जोड़ने पर योजनाओं को करीब 2,900 करोड़ रुपये मिल सकते हैं. यह समझौते के तहत मिलने वाली राशि से लगभग 30 गुना अधिक है. और चूंकि निप्पॉन इंडिया ने 6 मार्च 2020 को इन बॉन्ड को साइड-पॉकेट में डाल दिया था, इसलिए इसकी वसूली उन सभी निवेशकों को मिलेगी, जिनके पास उस दिन यूनिट थीं. इसमें वे निवेशक भी शामिल हैं, जिन्होंने बाद में अपनी यूनिट बेच दी थीं.
इसलिए सवाल क्रिकेट स्कोरबोर्ड जितना छोटा है: आखिर किस नुकसान का समझौता किया जा रहा है?
सेबी जीते तो भी तर्क हारे
अगस्त 2025 में सेबी ने इसी मामले में अनिल अंबानी, जय अनमोल अंबानी और राणा कपूर की समझौते की अपीलें खारिज कर दी थीं. खबरों के मुताबिक, इसकी वजह निवेशकों को हुआ बड़ा नुकसान और पूरे बाजार पर पड़ने वाला प्रभाव बताया गया था. ये वही आधार हैं, जिनके तहत सेबी के नियम किसी मामले में समझौते से इनकार करने की अनुमति देते हैं.
एक ही नोटिस. एक ही लेनदेन. एक ही नुकसान. प्रमोटर्स से कहा गया कि मामला इतना गंभीर है कि इसमें समझौता नहीं हो सकता. लेकिन जिन फंड हाउस ने बॉन्ड खरीदे थे, उन्हें समझौता मिल गया.
अगर नुकसान के आधार पर अंबानी और कपूर को समझौते से बाहर रखा गया, तो यही आधार फंड हाउस पर भी लागू होना चाहिए. और अगर ऐसा नहीं था, तो 15 अक्टूबर के बाद शायद नुकसान बचा ही नहीं है. ऐसे में उन्हें समझौते से इनकार करने का सेबी का आधार भी खत्म हो गया है. सेबी नुकसान का तर्क दे सकता है या समझौते का. दोनों बातें एक साथ नहीं हो सकतीं.
इस महीने के नए समझौता नियमों के तहत जिन आवेदकों के आवेदन पहले खारिज हो चुके हैं, उन्हें दोबारा आवेदन करने के लिए एक बार 90 दिन का मौका दिया गया है. वकीलों को उम्मीद है कि NAM India के आदेश को आधार बनाकर समानता के अधिकार के तहत चुनौती दी जा सकती है. समझौते का उद्देश्य विवाद खत्म करना होता है. लेकिन सेबी में यह मामला तीन नए विवादों की शुरुआत कर सकता है.
सेबी के पास बचाव का एक तर्क है
सेबी के धोखाधड़ी-रोधी नियमों के तहत कार्रवाई के लिए नुकसान होना जरूरी नहीं है. इसके अलावा, 88.59 करोड़ रुपये की प्रबंधन फीस की वसूली और एक्सपोजर सीमा के उल्लंघन का मामला सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी बना हुआ है. यह तर्क अपनी जगह सही है. लेकिन तब आदेश में स्पष्ट रूप से कहा जाना चाहिए कि यह राशि नुकसान के लिए नहीं, बल्कि आचरण के लिए ली जा रही है. साथ ही यह भी बताना होगा कि समान आचरण के लिए एक नोटिस पाने वाली कंपनी को समझौते की अनुमति क्यों दी जा रही है, जबकि दूसरी को नहीं.
नवंबर में अप्रैल के गणित पर हस्ताक्षर करने का मतलब होगा कि सेबी उस आधार को सही ठहरा रहा है, जिसे सुप्रीम कोर्ट खारिज कर चुका है.
एक हस्ताक्षर, एक खामोशी
यह फाइल सबसे पहले कमलेश वार्ष्णेय के पास गई थी, लेकिन उन्होंने खुद को इस मामले से अलग कर लिया. इसके बाद फाइल मूर्ति और प्रधान के पास पहुंची. मामले से परिचित लोगों के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद मूर्ति ने इस पर संकोच जताया. समझौता पैनल का सामूहिक फैसला होता है, महज औपचारिक मुहर नहीं. अगर मूर्ति यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या यह आदेश अब भी तर्कसंगत है, तो संभव है कि वह इस इमारत में अकेले व्यक्ति हों, जो यह सवाल खुलकर पूछ रहे हैं.
सूत्रों के मुताबिक, दो साल तक NAM India और उसके अधिकारियों ने नोटिस के जवाब में मामले के गुण-दोष पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. छोटे फंड हाउस को शायद ही कभी दो साल तक चुप रहने की ऐसी छूट मिलती है. वे यह सोच सकते हैं कि इस फाइल को किस कतार में रखा गया था.
CBI को इसकी जानकारी नहीं मिली
CBI ने कपूर और अनिल अंबानी के खिलाफ रिलायंस निप्पॉन म्यूचुअल फंड और यस बैंक के बीच कथित 2,797 करोड़ रुपये के लेनदेन के बदले लाभ (Quid Pro Quo) के मामले में आरोपपत्र दाखिल किया है. आरोपपत्र देखने वाले लोगों के मुताबिक, इसमें सिक्का और त्रिपाठी की भूमिकाओं का भी जिक्र है. साथ ही पूरक आरोपपत्र दाखिल करने की छूट भी रखी गई है. BW Businessworld को NAM India की ओर से CBI की इस कार्रवाई के बारे में कोई एक्सचेंज डिस्क्लोजर नहीं मिला.
सिक्का AMFI के अध्यक्ष हैं, जो 75 लाख करोड़ रुपये के उद्योग का प्रतिनिधित्व करता है. एक एजेंसी उनके खिलाफ अपनी जांच पूरी कर रही है. दूसरी एजेंसी ने अपनी जांच का रास्ता खुला रखा है.
पांचवां T
तुहिन कांत पांडे ने सेबी की कमान संभालते समय चार T का वादा किया था: भरोसा (Trust), पारदर्शिता (Transparency), टीमवर्क (Teamwork) और टेक्नोलॉजी (Technology). पांचवां T, यानी समय (Timing), सबसे मुश्किल साबित हो रहा है.
22 जनवरी: निप्पॉन लाइफ के मुख्यालय वाले शहर ओसाका में निवेशकों की बैठक हुई. ऐसा कोई रिकॉर्ड नहीं है, जिससे पता चले कि उन्होंने निप्पॉन लाइफ से मुलाकात की थी. और हमारा यह सुझाव भी नहीं है कि उन्होंने ऐसा किया. भूगोल कोई सबूत नहीं है. यह महज भूगोल है.
15 अप्रैल: सेबी का समझौता पत्र NAM India को भेजा गया.
22 जुलाई: जापान के मुंबई स्थित कौंसुल जनरल ने उनसे शिष्टाचार मुलाकात की.
15 सितंबर: लेह में सेना के लिए AMFI के निवेशक जागरूकता कार्यक्रम के दौरान उन्होंने निप्पॉन इंडिया की शाखा का दौरा किया. यह इस क्षेत्र में किसी म्यूचुअल फंड हाउस का पहला कार्यालय है. 11,500 फीट की ऊंचाई पर स्थित इस शहर में एकमात्र फंड हाउस वही था, जो अपने नियामक के हस्ताक्षर का इंतजार कर रहा था.
सूत्रों के मुताबिक, निप्पॉन लाइफ भारत-जापान क्रिकेट मैच की मेजबानी भी कर रही है.
इनमें से कोई भी बात अपने आप में अनुचित नहीं है. लेकिन एक नियामक को निष्पक्ष दिखना भी जरूरी है.
जब किसी समझौते का तथ्यात्मक आधार खत्म हो चुका हो और फिर भी उसे हस्ताक्षर के लिए आगे बढ़ाया जा रहा हो, जबकि चेयरमैन का पूरा साल आवेदक के समूह और उसके देश के लोगों के साथ सौहार्दपूर्ण मुलाकातों में बीता हो, तो यह महज छवि का सवाल नहीं रह जाता. यही मुख्य मुद्दा बन जाता है.
शीर्ष स्तर पर खामोशी
सेबी ने विस्तृत सवालों का जवाब नहीं दिया. CBI ने भी निप्पॉन के खिलाफ अपने मामले पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी.
सेबी अब भी इस फाइल को वापस भेजकर गणना दोबारा कर सकता है. या फिर नवंबर में अप्रैल के समझौते पर हस्ताक्षर कर सकता है और आने वाले वर्षों तक ट्रिब्यूनल तथा उन नोटिस पाने वालों को इसका जवाब देता रह सकता है, जिन्हें उसने समझौते से बाहर कर दिया था.
फिलहाल, पैसा जमा हो चुका है, एक पेन रुक चुका है और दूसरा अब भी मूर्ति की जेब में है.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(BW रिपोर्टर्स पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free की लेखिका हैं. यह एक तीखा खुलासा है, जिसने भारत के वित्तीय बाजारों के छिपे हुए पक्ष को सामने लाया. मुंबई में करीब दो दशकों की जमीनी रिपोर्टिंग के साथ पलक ने पैसे, सत्ता और नियमन के बीच के गठजोड़ की गहराई से पड़ताल करने वाले पत्रकार के रूप में पहचान बनाई है. उनके लेख भारत के प्रतिष्ठित वित्तीय दैनिकों, जिनमें The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line शामिल हैं, में प्रकाशित हुए हैं.
19 वर्ष की उम्र में अपराध रिपोर्टिंग की ओर आकर्षित हुईं पलक ने जल्द ही महसूस किया कि 1980 के दशक के मुंबई के गैंग युद्धों की जगह अब कॉरपोरेट टावरों में चलने वाली सफेदपोश योजनाओं ने ले ली है. इस समझ ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने भारत की ‘व्हाइट मनी’ अर्थव्यवस्था की जटिल गतिविधियों को समझने में वर्षों बिताए हैं. शेयर बाजार में हेरफेर से लेकर नियामकीय खामियों तक, उनका काम हाई फाइनेंस की चमकदार सतह के पीछे छिपे उन समूहों को सामने लाता है जो पर्दे के पीछे से फैसलों को प्रभावित करते हैं. सच्चाई सामने लाने का उनका जुनून और उन कड़ियों को जोड़ने की क्षमता, जिन्हें दूसरे नजरअंदाज कर देते हैं, उन्हें एक मजबूत पत्रकार बनाती है, जो यथास्थिति को चुनौती देने और उन खिलाड़ियों को बेनकाब करने से नहीं डरतीं जो खुद को कानून से ऊपर समझते हैं.)
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