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रिकॉर्ड निचले स्तर के करीब रुपया, RBI ने संभाला मोर्चा; डॉलर और कच्चे तेल का दबाव बरकरार
विदेशी पूंजी की निकासी, कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और डॉलर की मजबूत मांग से रुपये पर दबाव बना हुआ है. 9 अक्टूबर को रुपया शुरुआती कारोबार में 96.80 प्रति डॉलर के करीब पहुंचने के बाद संभला और 96.61 प्रति डॉलर पर बंद हुआ.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 hour ago
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने रुपये को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले नए रिकॉर्ड निचले स्तर पर जाने से रोकने के लिए विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप किया. मुद्रा बाजार के कारोबारियों के मुताबिक, डॉलर की लगातार मांग, कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और वैश्विक अनिश्चितता के कारण रुपये पर दबाव बना हुआ है. केंद्रीय बैंक के हस्तक्षेप से रुपये में और गिरावट को सीमित करने में मदद मिली.
8 अक्टूबर 2026 को रुपया कमजोर होकर 96.78 प्रति डॉलर पर बंद हुआ था. इसके बाद 9 अक्टूबर को कारोबार के दौरान यह 96.80 प्रति डॉलर के करीब पहुंच गया. हालांकि, बाद में इसमें सुधार आया और यह 96.61 प्रति डॉलर पर बंद हुआ. इस तरह पिछले कारोबारी सत्र के मुकाबले रुपये में करीब 0.2 फीसदी की मजबूती दर्ज की गई. कारोबारियों ने इस सुधार के पीछे RBI के हस्तक्षेप, डॉलर में नरमी और कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट को प्रमुख वजह बताया.
विदेशी मुद्रा बाजार में RBI की भूमिका ऐसे समय में महत्वपूर्ण हो गई है, जब बाहरी आर्थिक परिस्थितियां रुपये के अनुकूल नहीं हैं. भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है. ऐसे में तेल की कीमतें बढ़ने से आयात बिल बढ़ता है और भुगतान के लिए डॉलर की मांग में इजाफा होता है. इससे रुपये पर दबाव पड़ता है.
कच्चे तेल की कीमतें और विदेशी निवेशकों की बिकवाली बढ़ा रही दबाव
रुपये की कमजोरी के पीछे घरेलू और वैश्विक, दोनों तरह के कारक काम कर रहे हैं. कच्चे तेल की ऊंची कीमतें भारत के आयात खर्च को बढ़ाती हैं, जबकि विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की निकासी से भी रुपये पर दबाव बढ़ता है. इसके अलावा, भू-राजनीतिक घटनाक्रम और वैश्विक ब्याज दरों को लेकर अनिश्चितता ने भी मुद्रा बाजार की स्थिति को प्रभावित किया है.
RBI के हस्तक्षेप से रुपये की गिरावट की रफ्तार को सीमित करने में मदद मिल सकती है, लेकिन इससे उन बुनियादी कारणों को खत्म नहीं किया जा सकता, जो घरेलू मुद्रा पर दबाव बना रहे हैं. बाजार के प्रतिभागी अब कच्चे तेल की कीमतों, अमेरिकी डॉलर की चाल और विदेशी निवेश के प्रवाह पर नजर रख रहे हैं. इन कारकों से रुपये की आगे की दिशा तय होने की संभावना है.
RBI ने संकेत दिया है कि उसका उद्देश्य विदेशी मुद्रा बाजार में व्यवस्थित कारोबार बनाए रखना है, न कि रुपये को किसी निश्चित विनिमय दर पर बनाए रखना. गवर्नर संजय मल्होत्रा ने रुपये को उसके उचित मूल्य से कम यानी अंडरवैल्यूड बताया है. हालांकि, उन्होंने यह भी कहा है कि छोटी अवधि में बाजार का व्यवहार तर्कसंगत नहीं रह सकता.
RBI की मौद्रिक नीति का भी रुपये पर असर
रुपये की चाल पर RBI के हालिया मौद्रिक नीति फैसले का असर भी देखा जा रहा है. 7 अक्टूबर को केंद्रीय बैंक ने रेपो रेट में 25 आधार अंकों की बढ़ोतरी करते हुए इसे 5.50 फीसदी कर दिया था. साथ ही, मौद्रिक नीति के रुख को न्यूट्रल से बदलकर कैलिब्रेटेड टाइटनिंग यानी चरणबद्ध सख्ती की ओर किया था.
हालांकि, इस फैसले के बाद भी रुपये को तत्काल मजबूती नहीं मिली. इसकी वजह बाहरी आर्थिक दबाव और विदेशी पूंजी के प्रवाह को लेकर बनी चिंताएं हैं. इससे संकेत मिलता है कि केवल ब्याज दरों में बदलाव से रुपये की दिशा तय नहीं होती, बल्कि वैश्विक बाजार की परिस्थितियां भी अहम भूमिका निभाती हैं.
रुपये में गिरावट से किन क्षेत्रों पर पड़ेगा असर?
रुपये के कमजोर होने का अलग-अलग क्षेत्रों पर अलग प्रभाव पड़ता है. तेल विपणन कंपनियों, विमानन कंपनियों और उन कारोबारों की लागत बढ़ सकती है, जिन्हें कच्चे तेल, ईंधन, मशीनरी या अन्य वस्तुओं का आयात करना पड़ता है. डॉलर में भुगतान करने वाली कंपनियों के लिए भी आयात महंगा हो सकता है.
दूसरी ओर, सूचना प्रौद्योगिकी (IT) क्षेत्र की उन कंपनियों को फायदा मिल सकता है, जिन्हें विदेशों से डॉलर में कमाई होती है. डॉलर में अर्जित आय को रुपये में बदलने पर उन्हें अधिक राशि मिल सकती है. हालांकि, वास्तविक लाभ कंपनियों के खर्च, विदेशी मुद्रा जोखिम से बचाव की रणनीति और अन्य कारोबारी परिस्थितियों पर निर्भर करेगा.
रुपये में लगातार गिरावट से आयातित महंगाई बढ़ने का जोखिम भी रहता है. यदि कंपनियां आयात की बढ़ी हुई लागत का बोझ उपभोक्ताओं पर डालती हैं, तो ईंधन और अन्य आयातित वस्तुओं की कीमतें बढ़ सकती हैं.
RBI के सामने क्या है चुनौती?
RBI के सामने फिलहाल रुपये में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को रोकने और विदेशी मुद्रा बाजार में स्थिरता बनाए रखने की चुनौती है. केंद्रीय बैंक के लिए किसी एक विनिमय दर का बचाव करने के बजाय बाजार में असामान्य उतार-चढ़ाव को सीमित करना महत्वपूर्ण है.
आने वाले दिनों में रुपये की दिशा काफी हद तक कच्चे तेल की कीमतों, विदेशी निवेशकों के रुख, अमेरिकी डॉलर की मजबूती और RBI के हस्तक्षेप पर निर्भर करेगी. यदि तेल की कीमतों में तेजी और विदेशी पूंजी की निकासी जारी रहती है, तो रुपये पर दबाव बना रह सकता है. वहीं, डॉलर में नरमी और तेल की कीमतों में गिरावट से घरेलू मुद्रा को कुछ राहत मिल सकती है.
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