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कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और बाजार बिकवाली के बीच रुपये में रिकॉर्ड गिरावट, 95.34 के स्तर तक पहुंचा
विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की लगातार बिकवाली ने भी रुपये पर दबाव बढ़ाया है. पिछले सत्र में ही एफपीआई ने ₹2,468.42 करोड़ की इक्विटी बेच दी.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 2 hours ago
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल और विदेशी निवेशकों की बिकवाली के दबाव में भारतीय रुपया गुरुवार को रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया. इंटरबैंक विदेशी मुद्रा बाजार में रुपया 95.01 पर खुला और शुरुआती कारोबार में ही तेजी से गिरकर 95.34 के रिकॉर्ड इंट्राडे निचले स्तर तक पहुंच गया. बाद में यह 95.25 के आसपास कारोबार करता दिखा, जो पिछले बंद स्तर से 37 पैसे की गिरावट है. इससे पहले सत्र में रुपया 94.88 के सर्वकालिक बंद स्तर तक गिर चुका था.
कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल से दबाव
ब्रेंट क्रूड की कीमत 3.46 प्रतिशत बढ़कर 122.11 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई. वैश्विक आपूर्ति में बाधा और पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव, खासकर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे महत्वपूर्ण मार्ग में रुकावटों ने तेल कीमतों को बढ़ाया है. विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ती तेल कीमतें रुपये पर सबसे बड़ा दबाव बना रही हैं, क्योंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है.
विदेशी निवेशकों की बिकवाली भी कारण
विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की लगातार बिकवाली ने भी रुपये पर दबाव बढ़ाया है. पिछले सत्र में ही एफपीआई ने ₹2,468.42 करोड़ की इक्विटी बेच दी.
डॉलर इंडेक्स और वैश्विक संकेत
अमेरिकी डॉलर इंडेक्स 98.79 पर मामूली कमजोरी के साथ स्थिर रहा. वहीं, अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों को अपरिवर्तित रखने के फैसले ने भी वैश्विक मुद्रा बाजार को प्रभावित किया.
शेयर बाजार में भी गिरावट
घरेलू शेयर बाजारों में भी कमजोरी देखी गई. बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE Sensex) 687.75 अंक गिरकर 76,808.61 पर आ गया, जबकि नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE Nifty 50) 228.60 अंक टूटकर 23,949.05 पर पहुंच गया.
बॉन्ड यील्ड और कैपिटल आउटफ्लो का असर
बॉन्ड यील्ड लगभग 7 प्रतिशत तक पहुंचने से भी विदेशी पूंजी बाहर निकल रही है, जिससे मुद्रा पर अतिरिक्त दबाव बना हुआ है. बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि निकट भविष्य में रुपया दबाव में रह सकता है. कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव, भू-राजनीतिक जोखिम और विदेशी निवेश प्रवाह आगे भी मुद्रा की दिशा तय करेंगे.
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