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मूडीज की चेतावनी: खाड़ी तनाव से भारत की जीडीपी में 4% तक गिरावट का खतरा
कुल मिलाकर, खाड़ी क्षेत्र में जारी भू-राजनीतिक अस्थिरता भारत की अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकती है. यदि वैश्विक ऊर्जा बाजार लंबे समय तक बाधित रहते हैं, तो इसका असर जीडीपी, महंगाई, चालू खाता संतुलन और रुपये की स्थिति पर साफ दिखाई देगा.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 month ago
वैश्विक रेटिंग एजेंसी मूडीज (Moody’s) ने चेतावनी दी है कि खाड़ी क्षेत्र में जारी तनाव का भारत की अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ सकता है. रिपोर्ट के अनुसार, यदि यह संघर्ष लंबा खिंचता है, तो भारत की जीडीपी वृद्धि दर में 4% तक की गिरावट आ सकती है.
ऊर्जा आयात पर बढ़ेगा दबाव
मूडीज की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चा तेल और पेट्रोलियम उत्पाद खाड़ी देशों से आयात करता है. ऐसे में अगर संघर्ष के कारण वैश्विक तेल कीमतों में लगातार बढ़ोतरी होती है, तो आयात लागत बढ़ेगी. इससे चालू खाता घाटा बढ़ सकता है और महंगाई पर दबाव बनेगा.
महंगाई और वित्तीय स्थिरता पर खतरा
रिपोर्ट में कहा गया है कि तेल कीमतों में उछाल से देश की वित्तीय स्थिरता और संप्रभु क्रेडिट प्रोफाइल प्रभावित हो सकता है. बढ़ती महंगाई और कमजोर होती मुद्रा का असर आम उपभोक्ता और उद्योग दोनों पर पड़ेगा.
रणनीतिक भंडार की कमी बढ़ाती है जोखिम
मूडीज ने यह भी बताया कि भारत के पास सीमित रणनीतिक तेल भंडार हैं और ऊर्जा सब्सिडी पर निर्भरता ज्यादा है. ऐसे में लंबे समय तक कीमतों में उछाल रहने पर सरकार के लिए नीतिगत फैसले लेना मुश्किल हो सकता है.
जीडीपी वृद्धि पर असर
रिपोर्ट के अनुसार, यदि खाड़ी क्षेत्र में तनाव बना रहता है, तो भारत की आर्थिक वृद्धि दर पर सीधा असर पड़ेगा. अनुमान है कि लंबी अवधि के संघर्ष की स्थिति में जीडीपी पूर्व अनुमान से 4% तक कम रह सकती है. इसकी वजह उत्पादन लागत में वृद्धि, खपत में कमी और व्यापार पर असर होगी.
एशिया-प्रशांत क्षेत्र भी प्रभावित
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि पूरे एशिया-प्रशांत क्षेत्र की अर्थव्यवस्थाएं प्रभावित हो सकती हैं. बढ़ती कमोडिटी कीमतों और भू-राजनीतिक जोखिमों के कारण क्षेत्रीय विकास दर धीमी पड़ सकती है.
क्रेडिट जोखिम बढ़ने की आशंका
मूडीज के अनुसार, ऊर्जा आयात लागत बढ़ने, महंगाई में उछाल और वित्तीय संतुलन पर दबाव के चलते भारत का क्रेडिट जोखिम बढ़ सकता है. खासतौर पर तेल पर निर्भरता और सीमित भंडारण क्षमता इस जोखिम को और बढ़ाती है.
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