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Low Volatility फंड्स :अस्थिर बाजार में निवेशकों के लिए एक स्थिर विकल्प, जानें इसके फायदे

Low Volatility फंड्स अस्थिर शेयर बाजार में निवेशकों के लिए एक आकर्षक विकल्प बन रहे हैं, जो स्थिर रिटर्न और जोखिम कम करने की इच्छा रखते हैं.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

पिछले कुछ महीनों से शेयर बाजार में देखे जा रहे उतार-चढ़ाव ने निवेशकों को ऐसे विकल्प की तलाश में लगा दिया है जो जोखिम को कम कर स्थिर रिटर्न देने में सक्षम हों. इस बढ़ती मांग को देखते हुए कई एसेट मैनेजमेंट कंपनियां (AMCs) अब Low Volatility इंडेक्स फंड्स और एक्सचेंज-ट्रेडेड फंड्स (ETFs) लॉन्च करने की तैयारी कर रही हैं. ये फंड्स विशेष रूप से उन निवेशकों के लिए आकर्षक हैं जो बाजार की अस्थिरता से बचते हुए लगातार और स्थिर लाभ चाहते हैं. हालांकि, इन फंड्स के कुछ फायदे और सीमाएं भी हैं, जिन्हें समझना निवेशकों के लिए जरूरी है. तो आइए इन फंड्स के बारे में विस्तार से जानते हैं?

कौन-कौन सी कंपनियां ला रही हैं ये स्कीम्स?  
निप्पॉन, एक्सिस, एसबीआई, ग्रो और ICICI प्रु जैसी बड़ी कंपनियों ने इन फंड्स के लिए SEBI के पास आवेदन दिया है. वहीं, ICICI प्रु, कोटक, यूटीआई, मोतीलाल ओसवाल, HDFC और मिराए जैसी कंपनियां पहले से ही ऐसे फंड्स की पेशकश कर रही हैं. एक्सपर्ट्स का कहना है कि बढ़ती अनिश्चितता, जियोपॉलिटिकल रिस्क और ट्रेड टेंशन के चलते अब फंड हाउस ऐसे प्रोडक्ट्स पर ध्यान दे रहे हैं जो बेहतर रिस्क-एडजस्टेड रिटर्न दे सकें.

क्या होता है Low Volatility Index?  
Low Volatility इंडेक्स में ऐसे शेयर शामिल होते हैं जिनकी कीमतों में उतार-चढ़ाव अपेक्षाकृत कम होता है. उदाहरण के तौर पर, Nifty100 Low Volatility 30 Index टॉप 100 कंपनियों में से 30 सबसे स्थिर शेयरों को शामिल करता है. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार ये फंड आसान नियमों पर आधारित होते हैं और ऐसी कंपनियों में निवेश करते हैं जो बाजार के उतार-चढ़ाव में भी स्थिरता बनाए रखती हैं.

हर बाजार साइकिल में कर सकते हैं बेहतर प्रदर्शन  
Low Volatility फंड्स अस्थिर बाजार में नुकसान को सीमित कर सकते हैं और धीमे बाजार में भी अच्छा रिटर्न दे सकते हैं. बन्धन AMC के शिर्षेन्दु बासु के मुताबिक, “ऐसे निवेशक जो रिस्क को कंट्रोल कर लगातार ग्रोथ चाहते हैं, उनके लिए ये फंड्स मजबूत विकल्प हैं.” एक्सपर्ट्स के अनुसार  “Low Volatility फंड्स में गिरावट की आशंका कम होती है और ये लंबे समय में बाजार को भी मात दे सकते हैं.” उदाहरण के तौर पर, 10 साल की अवधि में *निफ्टी 50 ने 12.1% CAGR, जबकि **Nifty100 Low Volatility Index ने 13.7% CAGR* दिया है. साथ ही, इसकी वोलैटिलिटी भी कम रही है.

क्या हैं इन फंड्स की सीमाएं?  
तेजी वाले बाजार में ये फंड्स पीछे रह सकते हैं. एक्सपर्ट्स के कहा कि जब बाजार तेजी में होता है, तब ये फंड हाई-ग्रोथ स्टॉक्स के मुनाफे को मिस कर सकते हैं. इसके अलावा, इन फंड्स में कंसन्ट्रेशन रिस्क भी होता है क्योंकि ये कुछ सीमित और स्थिर सेक्टर्स में अधिक निवेश करते हैं. प्रतीक ओसवाल के अनुसार, “इससे डाइवर्सिफिकेशन कम हो जाता है और अगर इन सेक्टर्स पर दबाव आता है तो नुकसान की संभावना बढ़ जाती है.

किन निवेशकों के लिए हैं ये फंड्स फायदेमंद?  
अगर आप लंबी अवधि में स्थिर रिटर्न चाहते हैं, तो Low Volatility फंड्स एक सही विकल्प हो सकते हैं. एक्सपर्ट्स कहते हैं, इनमें निवेश का नजरिया कम से कम 5 साल का होना चाहिए. ये रिटायर्ड और कंजर्वेटिव इन्वेस्टर्स के लिए आदर्श हैं. ये फंड्स किसी भी निवेशक के कोर पोर्टफोलियो का हिस्सा हो सकते हैं, खासकर उन लोगों के लिए जो फैक्टर इन्वेस्टिंग को समझते हैं. यहां तक कि अगर आपने मिड-कैप या स्मॉल-कैप फंड्स में ज्यादा निवेश किया हुआ है, तब भी Low Volatility फंड्स से पोर्टफोलियो को संतुलित किया जा सकता है.


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