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जियो को 60 अरब डॉलर का झटका: बाजार में गिरावट, मस्क की पोस्ट और मुश्किल में रोड शो

जैसे-जैसे वैल्यूएशन चर्चा $160 अरब से $100 अरब तक चली जाती है और वैश्विक फंड्स भारती पर 30% छूट की मांग करते हैं, जियो के 2020 के बैकर्स को डॉलर रिटर्न मिलता है जो एक बॉन्ड फंड भी पार कर सकता है और एलोन मस्क का 'ओलिगार्क्स' पोस्ट रोडशो के बीच में आता है।

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 2 hours ago

पलक शाह

साल की शुरुआत में बैंकर 160 अरब डॉलर के मूल्यांकन की बात कर रहे थे. यह घटकर 140 अरब डॉलर हुआ, फिर 120 अरब डॉलर पर आ गया. इस सप्ताह रोडशो के दौरान बातचीत में शामिल लोगों के मुताबिक, अब 100 अरब डॉलर के मूल्यांकन पर चर्चा हो रही है. इसका मतलब है कि एक भी शेयर की ट्रेडिंग शुरू होने से पहले ही करीब 60 अरब डॉलर की वैल्यू घट चुकी है.

इसकी वजह साफ है. भारत इस समय कई वर्षों की सबसे खराब बाजार गिरावट से गुजर रहा है और जियो को जिन बड़े वैश्विक फंडों की जरूरत है, वे अपनी शर्तें तय कर रहे हैं.

"हमें डिस्काउंट दीजिए"

बातचीत से परिचित लोगों के मुताबिक, बड़े संस्थागत निवेशक जियो के बैंकरों को साफ संदेश दे रहे हैं. अगर जियो को भारी डिस्काउंट पर पेश नहीं किया गया, तो वे पैरेंट कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज के शेयर खरीदकर जियो में अपना निवेश बढ़ा लेंगे.

उनका बेंचमार्क भारती एयरटेल है, जो जियो की सबसे करीबी लिस्टेड प्रतिद्वंद्वी कंपनी है. निवेशक भारती एयरटेल के मल्टीपल्स के मुकाबले करीब 30% कम मूल्यांकन की मांग कर रहे हैं. उनका तर्क है कि प्रमोटर के नियंत्रण वाली नई लिस्टेड कंपनी, जो गिरते बाजार में शेयर बाजार में उतर रही है, उसकी कीमत ऐसी होनी चाहिए कि निवेशक उसे खरीदने के लिए तैयार हों.

रिलायंस के लिए यह असहज स्थिति है. डिस्काउंट देने का मतलब होगा कि बाजार अंबानी की सबसे कीमती कंपनी के लिए उनकी तय की गई कीमत चुकाने को तैयार नहीं है, जबकि कीमत पर अड़े रहने से आईपीओ को कमजोर प्रतिक्रिया मिलने का जोखिम है.

सबसे ज्यादा नुकसान किसे होगा: जियो के 2020 के निवेशक

सबसे ज्यादा जोखिम में रिलायंस नहीं, बल्कि वे 13 वैश्विक निवेशक हैं, जिन्होंने 2020 में जियो में 20.3 अरब डॉलर का निवेश किया था. इनमें मेटा, गूगल, सऊदी अरब का पीआईएफ, केकेआर, सिल्वर लेक, विस्टा, मुबाडाला, एडीआईए, टीपीजी, जनरल अटलांटिक, एल कैटरटन, इंटेल कैपिटल और क्वालकॉम शामिल हैं.

जियो के ड्राफ्ट प्रॉस्पेक्टस में बताए गए शेयर आवंटन के विश्लेषण के मुताबिक, इन सभी निवेशकों के पास मिलकर कंपनी की करीब एक-तिहाई हिस्सेदारी है. उन्होंने प्रति शेयर 488 रुपये (मेटा और गूगल) या 549 रुपये (बाकी निवेशकों) की कीमत पर शेयर खरीदे थे.

120 अरब डॉलर के मूल्यांकन पर भी इनका रिटर्न सीमित है. इन निवेशकों की हिस्सेदारी का मूल्य 38.4 अरब डॉलर होगा, यानी उनके निवेश का 1.89 गुना. छह वर्षों में डॉलर के लिहाज से यह सालाना करीब 10.9% का रिटर्न है. यह सम्मानजनक है, लेकिन बड़े प्राइवेट इक्विटी फंड आमतौर पर जितने रिटर्न का लक्ष्य रखते हैं, उससे काफी कम है.

100 अरब डॉलर के मूल्यांकन पर इनकी संयुक्त हिस्सेदारी का मूल्य घटकर करीब 32 अरब डॉलर रह जाएगा और सालाना डॉलर रिटर्न गिरकर 7.6% पर आ जाएगा. केकेआर, पीआईएफ और सिल्वर लेक सहित उन 11 निवेशकों के लिए, जिन्होंने 549 रुपये प्रति शेयर की कीमत पर निवेश किया था, यह रिटर्न करीब 6.6% होगा. अगर 120 अरब डॉलर के मूल्यांकन से 30% की कटौती होती है, तो उनका रिटर्न घटकर 3.6% रह जाएगा, जो लगभग उतना ही है जितना अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड से मिल सकता था.

डॉलर के लिहाज से उन्हें नुकसान तभी शुरू होगा, जब मूल्यांकन करीब 64-67 अरब डॉलर तक गिर जाए. लेकिन असली मुद्दा यह है कि महामारी के दौर के सबसे चर्चित सौदों में से एक से उन्हें कितना कम रिटर्न मिला है.

रुपये की गिरावट पहले ही 11 अरब डॉलर का नुकसान करा चुकी है

2020 के मध्य में डॉलर के मुकाबले रुपया करीब 75 रुपये था, जो अब गिरकर करीब 96.7 रुपये पर आ गया है. यानी इसमें 29% की गिरावट आई है. केवल इस गिरावट के कारण ही 2020 के निवेशकों के लाभ में करीब 11 अरब डॉलर की कमी आई है.

अगर पुरानी विनिमय दर लागू होती, तो 120 अरब डॉलर के मूल्यांकन पर उनकी हिस्सेदारी का मूल्य करीब 49.6 अरब डॉलर होता. रुपये के लिहाज से उन्हें सालाना 14-17% का रिटर्न मिलता. लेकिन डॉलर में, जिस मुद्रा में वे अपने रिटर्न की रिपोर्ट करते हैं, उनका सालाना रिटर्न करीब 5 प्रतिशत अंक कम हो गया है.

यही स्थिति गतिरोध की वजह समझाती है. मुद्रा की गिरावट से पहले ही अरबों डॉलर का नुकसान झेल चुके 2020 के निवेशकों के पास अब अतिरिक्त भारी डिस्काउंट स्वीकार करने की बहुत कम वजह है.

रिलायंस का रिटर्न बिल्कुल अलग नजर आता है

रिलायंस की स्थिति इससे अलग है. प्रॉस्पेक्टस के आंकड़ों के आधार पर, जियो में रिलायंस का अपना निवेश, जो बड़े पैमाने पर 2020 की फंड जुटाने की प्रक्रिया से पहले 10 रुपये प्रति शेयर की कीमत पर किया गया था, डॉलर के लिहाज से अपनी लागत से करीब 14 गुना मूल्य का है. इसका मतलब सालाना करीब 49% का रिटर्न है. हालांकि, यह एक अनुमानित आंकड़ा है, क्योंकि भुगतान की एक तारीख का खुलासा नहीं किया गया है.

डिस्काउंट से रिलायंस की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचेगी. वहीं, 2020 के निवेशकों के रिटर्न पर इसका सीधा असर पड़ेगा.

फिर आई मस्क की पोस्ट

बुधवार को, जब रोडशो पूरी रफ्तार से चल रहा था, एलन मस्क ने इस मामले पर अपनी प्रतिक्रिया दी. उन्होंने एक्स पर पोस्ट किया, "दुर्भाग्य से, कुछ कुलीन कारोबारी हमें रोक रहे हैं, ताकि भारतीय लोगों पर अपनी एकाधिकारवादी पकड़ बनाए रख सकें. आप अंदाजा लगा सकते हैं कि वे कौन हैं..."

उन्होंने आगे लिखा, "यह भारत के लोगों के खिलाफ अपराध है!"

गुरुवार को उन्होंने अंदाजा लगाने का खेल खत्म कर दिया. मस्क ने पोस्ट किया, "स्टारलिंक को 165 से अधिक देशों में लाइसेंस मिला हुआ है और उसने भारत सरकार के हर कानून और आवश्यकता का पालन करने में पांच साल बिताए हैं, तो फिर अब तक लाइसेंस क्यों नहीं मिला?" उन्होंने आगे लिखा, "क्या अंबानी ही भारत के असली बॉस हैं?"

यह उस कारोबारी पर सीधा हमला था, जिसकी कंपनी उसी समय वैश्विक निवेशकों से 100 अरब डॉलर के मूल्यांकन की मांग कर रही थी.

यह शिकायत नई नहीं है. भारत में स्टारलिंक की शुरुआत इस साल अटक गई थी. सरकार ने सुरक्षा संबंधी चिंताओं का हवाला दिया था और कंपनी से प्री-ऑर्डर के पैसे वापस करने को कहा गया था. लेकिन मुंबई के डीलिंग रूम में इस समय चर्चा का विषय इस पोस्ट का समय है.

यह पोस्ट उस समय आई, जब जियो का प्रबंधन और उसके बैंकर उन्हीं वैश्विक फंड मैनेजरों के सामने अपनी बात रख रहे थे, जो पहले से ही डिस्काउंट की मांग कर रहे हैं. कोई भी कंपनी अपने आईपीओ के प्रचार के दौरान "एकाधिकारवादी पकड़" जैसे शब्दों को चर्चा में नहीं देखना चाहेगी.

इस बात का कोई सबूत नहीं है कि मस्क ने आईपीओ को नुकसान पहुंचाने के लिए जानबूझकर पोस्ट का समय चुना. लेकिन इससे हर उस निवेशक के सामने एक सवाल खड़ा हो गया है, जो 100 अरब डॉलर के मूल्यांकन पर निवेश करने पर विचार कर रहा है: क्या जियो का दबदबा प्रतिस्पर्धा के कारण है या नियामकीय संरक्षण की वजह से, और यह संरक्षण आखिर कब तक बना रहेगा?

अब आगे क्या होगा?

आईपीओ इसी महीने के अंत में खुलने की उम्मीद है. अब बैंकरों के सामने तीन विकल्प हैं:

- कम कीमत तय करके सौदा पूरा करना: यह स्वीकार करते हुए कि जियो की लिस्टिंग भारती एयरटेल के मुकाबले बड़े डिस्काउंट पर होगी और 2020 के निवेशकों को नुकसान उठाना पड़ेगा.

- कीमत पर कायम रहना और कमजोर प्रतिक्रिया का जोखिम लेना: ऐसा होने पर रिलायंस के लिए यह शर्मिंदगी की स्थिति हो सकती है.

- आईपीओ टालना और बाजार में सुधार का इंतजार करना: इसका मतलब होगा यह स्वीकार करना कि भारत का सबसे बड़ा आईपीओ बाजार में गिरावट से प्रभावित हुआ है.

हर विकल्प में किसी न किसी को कीमत चुकानी पड़ेगी. 2020 में दुनिया के सबसे बड़े निवेशकों ने अंबानी की डिजिटल महत्वाकांक्षा में निवेश करने के लिए कतार लगाई थी. छह साल बाद, उस निवेश से मिला रिटर्न बॉन्ड फंड से मिलने वाले रिटर्न से भी कम रहा है, मस्क की एक पोस्ट ने फिर से यह सवाल खड़ा कर दिया है कि जियो ने बाजार में अपना दबदबा कैसे बनाया और नए निवेशक अब अतिरिक्त डिस्काउंट की मांग कर रहे हैं.

रिटर्न सकल हैं, यानी इनमें शुल्क और कर शामिल नहीं हैं. ये 19 जून 2026 की तारीख वाले जियो प्लेटफॉर्म्स के ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस में बताए गए शेयर आवंटन और ईसीबी की डॉलर/रुपया संदर्भ विनिमय दरों पर आधारित हैं.

पलक शाह

(BW रिपोर्टर्स पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free की लेखिका हैं. यह एक तीखा खुलासा है, जिसने भारत के वित्तीय बाजारों के छिपे हुए पक्ष को सामने लाया. मुंबई में करीब दो दशकों की जमीनी रिपोर्टिंग के साथ पलक ने पैसे, सत्ता और नियमन के बीच के गठजोड़ की गहराई से पड़ताल करने वाले पत्रकार के रूप में पहचान बनाई है. उनके लेख भारत के प्रतिष्ठित वित्तीय दैनिकों, जिनमें The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line शामिल हैं, में प्रकाशित हुए हैं.

19 वर्ष की उम्र में अपराध रिपोर्टिंग की ओर आकर्षित हुईं पलक ने जल्द ही महसूस किया कि 1980 के दशक के मुंबई के गैंग युद्धों की जगह अब कॉरपोरेट टावरों में चलने वाली सफेदपोश योजनाओं ने ले ली है. इस समझ ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने भारत की ‘व्हाइट मनी’ अर्थव्यवस्था की जटिल गतिविधियों को समझने में वर्षों बिताए हैं. शेयर बाजार में हेरफेर से लेकर नियामकीय खामियों तक, उनका काम हाई फाइनेंस की चमकदार सतह के पीछे छिपे उन समूहों को सामने लाता है जो पर्दे के पीछे से फैसलों को प्रभावित करते हैं. सच्चाई सामने लाने का उनका जुनून और उन कड़ियों को जोड़ने की क्षमता, जिन्हें दूसरे नजरअंदाज कर देते हैं, उन्हें एक मजबूत पत्रकार बनाती है, जो यथास्थिति को चुनौती देने और उन खिलाड़ियों को बेनकाब करने से नहीं डरतीं जो खुद को कानून से ऊपर समझते हैं.)


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