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JIO कैश मशीन: भारत का पहला ₹10 लाख करोड़ का IPO, नेट डेट से लगभग मुक्त
जियो के ₹27,500 करोड़ के कर्ज खत्म हो जाएंगे. फ्री कैश फ्लो 29 गुना बढ़ गया है. 524 मिलियन ग्राहक. एयरटेल से कम कीमत पर वैल्यूएशन. वे आंकड़े, जिन पर सुर्खियों में ध्यान नहीं दिया गया.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 hour ago
पलक शाह
वह कहानी, जिस पर सुर्खियों में ध्यान नहीं दिया गया
जियो प्लेटफॉर्म्स (JIO) के आईपीओ को लेकर पिछले दो सप्ताह से सुर्खियों में वैल्यूएशन में कटौती, निवेशकों की सौदेबाजी और एलन मस्क पर ध्यान केंद्रित किया गया है. सबसे महत्वपूर्ण आंकड़ा अब तक छिपा रहा है: ₹27,500 करोड़. यह वह राशि है, जिसका इस्तेमाल जियो अपनी टेलीकॉम इकाई रिलायंस जियो इन्फोकॉम द्वारा लिए गए कर्ज को समय से पहले चुकाने के लिए करेगा. 31 मार्च, 2026 को जियो का नेट डेट ₹27,579 करोड़ था.
चेक क्लियर होने के बाद लगभग ₹79 करोड़ का कर्ज बचेगा. कंपनी की नेट डेट की अपनी परिभाषा के अनुसार, जियो लगभग नेट-डेट-फ्री स्थिति में शेयर बाजार में सूचीबद्ध होगा.
एक कैश मशीन
कर्ज का आंकड़ा कहानी का सिर्फ एक हिस्सा है. इससे बड़ा बदलाव कैश फ्लो में आया है.
दो साल पहले जियो अपनी कमाई का लगभग पूरा हिस्सा 5G पर खर्च कर रहा था. वित्त वर्ष 2024 में EBITDA में से पूंजीगत खर्च घटाने पर मिलने वाली राशि, जो फ्री कैश का एक मोटा अनुमान है, केवल ₹1,449 करोड़ थी. यह वित्त वर्ष 2025 में बढ़कर ₹19,902 करोड़ और वित्त वर्ष 2026 में ₹42,071 करोड़ हो गई. यानी दो साल में लगभग 29 गुना वृद्धि हुई.
5G नेटवर्क तैयार हो चुका है. इसी अवधि में पूंजीगत खर्च ₹53,510 करोड़ से घटकर ₹34,184 करोड़ रह गया, जबकि कमाई लगातार बढ़ती रही. वित्त वर्ष 2026 में जियो ने ₹1.47 लाख करोड़ का राजस्व दर्ज किया, जो 15% अधिक है. कंपनी का EBITDA 51.9% मार्जिन के साथ ₹76,255 करोड़ रहा और शुद्ध लाभ ₹30,049 करोड़ दर्ज किया गया. दो साल में मुनाफा 40% बढ़ा है.
यही वजह है कि आईपीओ से एक भी रुपया आने से पहले जियो का नेट डेट वित्त वर्ष 2024 के ₹48,440 करोड़ से घटकर ₹27,579 करोड़ रह गया. मार्च में जियो के पास ₹43,202 करोड़ की नकदी और निवेश थे.
रुपये में गिरावट के बीच डॉलर का कर्ज चुकाना
जिन कर्जों को चुकाया जा रहा है, वे 16 वैश्विक बैंकों से डॉलर और येन में लिए गए कर्ज हैं. इनमें बैंक ऑफ अमेरिका, सिटी, एचएसबीसी, एमयूएफजी और एसबीआई शामिल हैं. 2020 के बाद से रुपये में लगभग 29% की गिरावट के कारण विदेशी मुद्रा में लिया गया कर्ज हर साल रुपये के लिहाज से महंगा होता गया है. आईपीओ से जियो इस जोखिम को खत्म कर सकेगा.
समय से पहले कर्ज चुकाने पर कोई जुर्माना भी नहीं लगेगा. कर्ज समझौतों में समय से पहले भुगतान की अनुमति "बिना किसी प्रीमियम या ब्रेक कॉस्ट" के दी गई है.
भारती से सस्ता
₹1,119 प्रति शेयर की कीमत पर जियो का वैल्यूएशन वित्त वर्ष 2026 की प्रति शेयर आय के लगभग 33 गुना पर है. इसके सबसे करीबी प्रतिद्वंद्वी भारती एयरटेल का वैल्यूएशन इसी प्रॉस्पेक्टस में 42 गुना था.
इस तुलना के आधार पर, ग्राहकों की संख्या के लिहाज से भारत का सबसे बड़ा टेलीकॉम ऑपरेटर, जिसके 524 मिलियन सब्सक्राइबर हैं, 268 मिलियन ग्राहक 5G का इस्तेमाल करते हैं और 27 मिलियन ग्राहक होम ब्रॉडबैंड से जुड़े हैं (जो भारत में सबसे अधिक है), अपने प्रमुख प्रतिद्वंद्वी से सस्ता है.
प्रति यूजर औसत राजस्व (ARPU) दो साल में ₹182 से बढ़कर ₹214 प्रति माह हो गया है और प्रत्येक ग्राहक हर महीने 42 GB डेटा का इस्तेमाल करता है.
देश की चौथी सबसे मूल्यवान कंपनी बनने की राह पर
₹10.3 लाख करोड़ के वैल्यूएशन पर जियो भारत की चौथी सबसे मूल्यवान कंपनी के रूप में सूचीबद्ध होगा. इससे आगे रिलायंस (₹15.84 लाख करोड़), भारती एयरटेल (₹11.27 लाख करोड़) और एचडीएफसी बैंक (₹10.90 लाख करोड़) होंगे, जबकि जियो आईसीआईसीआई बैंक (₹9.72 लाख करोड़) से आगे होगा. यह भारत का पहला आईपीओ होगा, जिसका मूल्यांकन ₹10 लाख करोड़ से अधिक होगा. इससे पहले एलआईसी का वैल्यूएशन लगभग ₹6 लाख करोड़ था, जो उस समय एक मानक बना था.
इन कंपनियों के बीच अंतर कम है. लिस्टिंग के बाद जियो के शेयर में 6% की वृद्धि उसे एचडीएफसी बैंक से आगे कर देगी और 10% से भी कम की बढ़त उसे भारती एयरटेल से आगे पहुंचा देगी.
रिलायंस की छिपी हुई वैल्यू
रिलायंस के शेयरधारकों को भी वैल्यूएशन में बढ़ोतरी का फायदा मिलेगा. जियो में रिलायंस की लगभग 65% हिस्सेदारी आईपीओ मूल्य पर करीब ₹6.6 लाख करोड़ की है, जो रिलायंस के कुल बाजार मूल्य का लगभग 42% है. इसमें उसके तेल से लेकर केमिकल, रिटेल और न्यू-एनर्जी कारोबार की वैल्यू शामिल नहीं है.
2020 के निवेशकों का पैसा दोगुना हुआ
2020 में जियो में ₹1.52 लाख करोड़ निवेश करने वाले 13 वैश्विक निवेशकों का पैसा रुपये के लिहाज से दोगुने से अधिक हो गया है. ₹549 प्रति शेयर की कीमत पर निवेश करने वाले फंड का निवेश 2.04 गुना हो गया है, जबकि ₹488 प्रति शेयर की कीमत पर निवेश करने वाले मेटा और गूगल का निवेश 2.29 गुना हो गया है.
कर्ज-मुक्त होने के आंकड़े में क्या शामिल नहीं है
इसमें एक बड़ी अपवाद वाली देनदारी भी है. जियो पर अभी भी सरकार का ₹1.05 लाख करोड़ बकाया है, जो स्थगित स्पेक्ट्रम भुगतान से संबंधित है. इसका भुगतान आने वाले वर्षों में किस्तों में किया जाना है और इसे कंपनी के नेट डेट के आंकड़े में शामिल नहीं किया गया है. वित्त वर्ष 2026 में वित्त लागत बढ़कर ₹8,653 करोड़ होने की मुख्य वजह इस बकाया राशि पर लगने वाला ब्याज है. आईपीओ से इस देनदारी पर कोई असर नहीं पड़ेगा.
कर्ज-मुक्त होने का यह मतलब भी नहीं है कि "विकास पर खर्च होने वाला हर रुपया मुनाफे में बदल जाएगा." जिन कर्जों को चुकाया जा रहा है, उन पर ब्याज दरें 1.4–5.18% के बीच हैं, इसलिए सालाना ब्याज की बचत सीमित होगी. आईपीओ से वास्तव में कंपनी की बैलेंस शीट में बदलाव आएगा. 4G और 5G नेटवर्क बनाने के लिए भारी कर्ज लेने वाली कंपनी अब सालाना ₹40,000 करोड़ से अधिक का फ्री कैश पैदा कर रही है और उस पर बैंक का नेट डेट लगभग न के बराबर है.
यह इश्यू 21 अक्टूबर को खुलेगा, लिस्टिंग से पता चलेगा कि निवेशक इस बदलाव को कितना महत्व देते हैं.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(BW रिपोर्टर्स पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free की लेखिका हैं. यह एक तीखा खुलासा है, जिसने भारत के वित्तीय बाजारों के छिपे हुए पक्ष को सामने लाया. मुंबई में करीब दो दशकों की जमीनी रिपोर्टिंग के साथ पलक ने पैसे, सत्ता और नियमन के बीच के गठजोड़ की गहराई से पड़ताल करने वाले पत्रकार के रूप में पहचान बनाई है. उनके लेख भारत के प्रतिष्ठित वित्तीय दैनिकों, जिनमें The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line शामिल हैं, में प्रकाशित हुए हैं.
19 वर्ष की उम्र में अपराध रिपोर्टिंग की ओर आकर्षित हुईं पलक ने जल्द ही महसूस किया कि 1980 के दशक के मुंबई के गैंग युद्धों की जगह अब कॉरपोरेट टावरों में चलने वाली सफेदपोश योजनाओं ने ले ली है. इस समझ ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने भारत की ‘व्हाइट मनी’ अर्थव्यवस्था की जटिल गतिविधियों को समझने में वर्षों बिताए हैं. शेयर बाजार में हेरफेर से लेकर नियामकीय खामियों तक, उनका काम हाई फाइनेंस की चमकदार सतह के पीछे छिपे उन समूहों को सामने लाता है जो पर्दे के पीछे से फैसलों को प्रभावित करते हैं. सच्चाई सामने लाने का उनका जुनून और उन कड़ियों को जोड़ने की क्षमता, जिन्हें दूसरे नजरअंदाज कर देते हैं, उन्हें एक मजबूत पत्रकार बनाती है, जो यथास्थिति को चुनौती देने और उन खिलाड़ियों को बेनकाब करने से नहीं डरतीं जो खुद को कानून से ऊपर समझते हैं.)
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