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भारत का प्रिंट मीडिया दुनिया के ट्रेंड से चल रहा है अलग, न्यूज ब्रांड विज्ञापन खर्च में 6% सालाना बढ़त: रिपोर्ट
WARC की ताज़ा ग्लोबल एड ट्रेंड्स रिपोर्ट के अनुसार, भारत का न्यूज़ सेक्टर दुनियाभर के ट्रेंड से अलग है। यहां पर प्रिंट मीडिया अभी भी मज़बूत स्थिति में है, जबकि बाकी देशों में डिजिटल मीडिया तेजी से आगे बढ़ रहा है.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago
भारत में प्रिंट मीडिया ने साल-दर-साल विज्ञापन खर्च में 6% की बढ़त दर्ज की है. यह जानकारी WARC की नई रिपोर्ट "Global Ad Trends: Advertising's breaking news problem" में दी गई है. रिपोर्ट के मुताबिक, "भारत का न्यूज़ सेक्टर दुनियाभर की दिशा से अलग चल रहा है. जहाँ बाकी देशों में डिजिटल प्लेटफॉर्म का असर बढ़ रहा है, वहीं भारत में प्रिंट मीडिया अब भी मजबूत बना हुआ है. भारत दुनिया का सबसे बड़ा प्रिंट मीडिया बाजार बन चुका है. शहरी लोग भले ही डिजिटल की ओर बढ़ रहे हों, लेकिन फिर भी न्यूजब्रांड पर विज्ञापन खर्च में हर साल 6% की बढ़त हो रही है."
ये बढ़त उस वैश्विक रुझान के उलट है, जिसमें दुनिया भर में न्यूजब्रांड पर विज्ञापन खर्च 2025 तक गिरकर $32.3 बिलियन हो सकता है, जो कि 2019 से 33.1% की गिरावट है और 2026 तक यह खर्च लगभग स्थिर रहने की उम्मीद है. मैगज़ीन ब्रांड्स पर खर्च 2025 में $3.7 बिलियन रहने का अनुमान है, जो कि 2019 से 38.6% की गिरावट है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि "आजकल दुनिया भर में ट्रेड वॉर से लेकर जंग तक की बड़ी-बड़ी खबरें तो बहुत आ रही हैं, लेकिन इन खबरों से जुड़े पब्लिशर्स और ब्रॉडकास्टर्स को उतना विज्ञापन पैसा नहीं मिल रहा है." सुरक्षा और कंटेंट को लेकर चिंता की वजह से ब्रांड अब गूगल और मेटा जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म को पसंद कर रहे हैं, क्योंकि वहां वे टारगेटेड और बड़े स्तर पर विज्ञापन चला सकते हैं.
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भविष्य में ग्रोथ के लिए ज़रूरी होगा:
• फर्स्ट-पार्टी डेटा (यानी सीधे उपभोक्ताओं से मिली जानकारी)
• भरोसेमंद माहौल
• विज्ञापन से आगे बढ़कर कमाई के नए तरीके, जैसे कि सब्सक्रिप्शन और सीधे उपभोक्ताओं से जुड़ाव.
WARC की यह रिपोर्ट यह भी बताती है कि कैसे विज्ञापन खर्च पारंपरिक मीडिया से हटकर अब यूज़र जनरेटेड कंटेंट (UGC) और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर काम करने वाले क्रिएटर-जर्नलिस्ट्स की ओर जा रहा है. रिपोर्ट यह भी समझाती है कि न्यूज पब्लिशर्स अब कम होते विज्ञापन खर्च से कैसे निपट रहे हैं और वे यह दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि पेशेवर पत्रकारिता विज्ञापन के असर को कैसे बढ़ा सकती है.
WARC मीडिया के हेड ऑफ कंटेंट, एलेक्स ब्राउनसेल कहते हैं कि "ब्रांड अब गंभीर खबरों (जैसे युद्ध, संकट आदि) से जुड़ी सामग्री पर विज्ञापन देने से कतराने लगे हैं. कीवर्ड ब्लॉकिंग की वजह से पब्लिशर्स इन अहम खबरों से कमाई नहीं कर पा रहे. वहीं, विज्ञापन अब प्रोफेशनल पत्रकारों से हटकर 'क्रिएटर-जर्नलिस्ट्स' की तरफ जा रहा है." वे आगे कहते हैं कि "इस रिपोर्ट में हमने यह देखा है कि न्यूज मीडिया के विज्ञापन पैसे अब कहां खर्च हो रहे हैं, और न्यूजब्रांड्स इन नुकसानों से कैसे निपट रहे हैं ताकि वे विज्ञापनदाताओं को फिर से अपनी ओर खींच सकें."
ब्रांड्स अब सॉफ्ट कंटेंट को पसंद कर रहे हैं, जिससे न्यूज मीडिया को हो रहा नुकसान
गंभीर खबरों पर विज्ञापन खर्च कम होता जा रहा है. हालांकि लोग बड़ी खबरों (जैसे युद्ध, संकट, राजनीति) में दिलचस्पी लेते हैं, फिर भी ऐसे कंटेंट को अक्सर डिमॉनेटाइज़ (विज्ञापन से पैसा न कमाना) कर दिया जाता है. इसकी वजह है कीवर्ड ब्लॉकलिस्ट, जिसे ब्रांड अपनी छवि (reputation) बचाने के लिए इस्तेमाल करते हैं. ब्रांड्स को लगता है कि अगर उनके विज्ञापन किसी विवादित या दुखद खबर के साथ दिखें, तो उनकी छवि खराब हो सकती है. इसलिए वे ऐसे कंटेंट से बचते हैं और स्पोर्ट्स, लाइफस्टाइल जैसे सॉफ्ट कंटेंट को प्राथमिकता देते हैं.
उदाहरण के लिए 2024 में UK में टीवी विज्ञापन खर्च का केवल 3.7% (£177 मिलियन) ही न्यूज प्रोग्रामिंग पर खर्च हुआ. अमेरिका में, न्यूज़ ब्रॉडकास्टर्स के लिए फार्मा कंपनियां (दवाइयों के ब्रांड) ज़रूरी बन गई हैं – वे 12% राष्ट्रीय टीवी विज्ञापन बिक्री का हिस्सा हैं. ये स्थिति पुराने सवाल फिर से उठाती है कि क्या न्यूज कंटेंट की वाकई में वैल्यू है? और क्या ब्रांड्स को सिर्फ ऑडियंस को टारगेट करना चाहिए, न कि कंटेंट की टाइप देखनी चाहिए?
2026 तक यूजर जनरेटेड कंटेंट (UGC) पर विज्ञापन खर्च, प्रोफेशनल मीडिया से ज्यादा हो जाएगा
न्यूज मीडिया को जो मुश्किलें आ रही हैं, वे तब हो रही हैं जब विज्ञापनदाता इन्फ्लुएंसर्स और क्रिएटर्स से यूज़र जनरेटेड कंटेंट (UGC) को ज्यादा पसंद कर रहे हैं. यह कंटेंट कम उत्पादन लागत, सीधे ऑडियंस से जुड़ाव, और प्लेटफॉर्म के एल्गोरिदम से मेल खाने की वजह से आकर्षक होता है.
पारंपरिक मीडिया, जो पत्रकारिता में पहले निवेश करता है और कड़े कंटेंट मानकों और नियमों के तहत काम करता है, प्रतिस्पर्धा करने में संघर्ष कर रहा है. यह बदलाव विज्ञापन-फंडेड न्यूज़ इंडस्ट्री के लिए खासतौर पर हानिकारक है, क्योंकि उन्होंने हमेशा चेतावनी दी है कि पेशेवर पत्रकारिता में घटता निवेश सार्वजनिक साक्षरता में गिरावट और मिथ्या जानकारी के खिलाफ कमजोर रक्षा का कारण बन सकता है.
अगले साल तक, पेशेवर रूप से बनाई गई सामग्री का हिस्सा आधिकारिक कंटेंट-ड्रिवन विज्ञापन खर्च का आधे से कम होने का अनुमान है, जैसा कि GroupM द्वारा कहा गया है. टिकटॉक और पॉडकास्ट्स जैसे प्लेटफार्म्स क्रिएटर-जर्नलिस्ट्स की बढ़ती संख्या को बढ़ावा दे रहे हैं, और AI-जनित कंटेंट भी इस प्रवृत्ति को तेज कर रहा है. केट स्कॉट-डॉकिन्स, ग्रुपM की ग्लोबल प्रेसिडेंट, बिजनेस इंटेलिजेंस कहती हैं कि "जैसे-जैसे विज्ञापनदाताओं की संख्या बढ़ती जा रही है, UGC का प्रभाव और भी ज्यादा बढ़ने की संभावना है."
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