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विदेशियों के लिए म्यूचुअल फंड और कैपिटल मार्केट खोलने की तैयारी में भारत! जल्द होगा ऐलान

सूत्रों के अनुसार, नई दो चरणों वाली उदार नीति का ऐलान अगले कुछ हफ्तों में किया जा सकता है. इसमें NRI और OCI लोगों को भारत में सीधे निवेश करने की अनुमति मिल सकती है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

भारत अब एक नया नियम लाने की तैयारी में है, जिससे सिर्फ NRI और OCI ही नहीं, बल्कि दूसरे विदेशी लोग भी सीधे भारतीय म्यूचुअल फंड्स में निवेश कर सकेंगे. यह कदम भारत के फाइनेंशियल सिस्टम को दुनिया के नियमों के हिसाब से और खोलने की दिशा में उठाया जा रहा है. 

इस नई पॉलिसी के पहले चरण में ऐसे विदेशी नागरिक जिन्हें भारत से कोई पारिवारिक संबंध नहीं है (जिन्हें Non-Resident Foreign Citizens या NRFC कहा जा रहा है), उन्हें भारत के डेट (ऋण) और इक्विटी म्यूचुअल फंड्स में हर साल 2.5 लाख अमेरिकी डॉलर (लगभग ₹2 करोड़) तक निवेश करने की अनुमति दी जाएगी. यह नियम भारत के "Liberalized Remittance Scheme (LRS)" की तरह होगा, जिसमें भारतीय नागरिक हर साल 2.5 लाख डॉलर तक विदेश में निवेश कर सकते हैं. सूत्रों के मुताबिक, भारत के बड़े म्यूचुअल फंड जैसे SBI Mutual Fund, ICICI Prudential, HDFC Mutual Fund और अन्य जो लगभग 800 अरब डॉलर की संपत्ति संभालते हैं, इन विदेशी निवेशकों से सीधे निवेश लेने में सक्षम होंगे.

ऑपरेशनल और रेगुलेटरी सुरक्षा उपाय

सरकार यह सुनिश्चित करना चाहती है कि यह प्रक्रिया आसान और सुरक्षित हो. इसके लिए हर NRFC निवेशक (यानी भारत से न जुड़े विदेशी नागरिक) को अपना पैसा भारत में मौजूद किसी RBI से मंज़ूरशुदा बैंक के ज़रिए भेजना होगा — जैसे HSBC, UBS, Citi, JP Morgan या SBI.

ये बैंक "Authorised Dealer (AD)" के रूप में काम करेंगे और ये सख्त नियमों का पालन करेंगे — जैसे KYC (Know Your Customer), मनी लॉन्ड्रिंग रोकने के नियम (AML), और अंतरराष्ट्रीय FATF नियम. हर विदेशी निवेशक को एक डिजिटल भारतीय PAN नंबर (Permanent Account Number) दिया जाएगा ताकि टैक्स की निगरानी और नियमों का पालन आसानी से किया जा सके. इससे आयकर विभाग को निवेश की पूरी जानकारी मिलती रहेगी.

खास बात यह है कि शुरुआत में निवेश सिर्फ म्यूचुअल फंड्स में ही किया जा सकेगा. इससे यह सुनिश्चित किया जाएगा कि विदेशी निवेशक भारतीय कंपनियों के प्रबंधन या वोटिंग में दखल न दें. इस तरह भारतीय कंपनियों को बाहरी नियंत्रण के जोखिम से बचाया जाएगा.

सख्त नियंत्रण, बड़े फायदे

हर विदेशी व्यक्ति के लिए 2.5 लाख अमेरिकी डॉलर (लगभग ₹2 करोड़) की सीमा रखी जा सकती है, ताकि विदेशी मुद्रा का बहाव कंट्रोल में रहे और बाजार में कोई गड़बड़ी न हो. टैक्स के मामले में, लंबे समय तक (2-3 साल से ज्यादा) किए गए निवेशों को टैक्स से छूट मिल सकती है, जबकि छोटे समय के निवेशों पर टैक्स लगेगा. इससे शॉर्ट टर्म और अचानक आने वाले "हॉट मनी" जैसे सट्टेबाज़ी वाले निवेशों को हतोत्साहित किया जाएगा और स्थिर, लंबे समय के निवेश को बढ़ावा मिलेगा.

SEBI के तहत चलने वाले म्यूचुअल फंड्स में पहले से ही मजबूत नियम और पारदर्शिता होती है, जिससे निवेशक सुरक्षित महसूस करेंगे. यह नीति म्यूचुअल फंड्स और अधिकृत बैंकों — दोनों को शामिल करेगी, जिससे दो स्तर की निगरानी होगी. इससे टैक्स चोरी और वित्तीय गड़बड़ियों के खतरे काफी हद तक कम हो जाएंगे.

ऋण बाजार (Debt Market)

हालांकि शेयर बाजार (equity market) अक्सर सुर्खियों में रहता है, लेकिन जानकारों का मानना है कि इस पॉलिसी का सबसे बड़ा असर भारत के डेट मार्केट पर पड़ेगा. भारत को इन्फ्रास्ट्रक्चर, हाउसिंग और विकास परियोजनाओं के लिए लंबे समय तक चलने वाले बड़े निवेश की ज़रूरत है. ऐसे में म्यूचुअल फंड्स जो सरकारी और कॉरपोरेट बॉन्ड्स में निवेश करते हैं, वे इन विदेशी पैसों को सही दिशा में लगा सकते हैं और देश की तरक्की में मदद कर सकते हैं.

दूसरा चरण: सीधे शेयर बाजार में निवेश

अगर पहले चरण की योजना सफल रहती है, तो दूसरा चरण शुरू किया जाएगा. इसमें NRFCs (भारत से न जुड़े विदेशी नागरिकों) को भारतीय शेयर बाजार में सीधे निवेश करने की अनुमति दी जा सकती है, ऐसा सूत्रों ने बताया.  इसका मतलब है कि वे SEBI से रजिस्टर्ड ब्रोकर्स के ज़रिए भारत में शेयर खरीद और बेच सकेंगे.  हालांकि इसके लिए पूरी तरह से KYC (पहचान की पुष्टि) और टैक्स से जुड़ी प्रक्रिया पूरी करनी होगी, जिसे ब्रोकर्स और अधिकृत बैंक (Authorised Dealers) मिलकर संभालेंगे.

सोची-समझी और संतुलित ढील

वित्त मंत्रालय से जुड़े सूत्रों का कहना है कि यह कदम एक सावधानीपूर्वक और योजनाबद्ध आर्थिक ढील है, जिसका मकसद है — भारत को विदेशी पूंजी मिले, लेकिन बाजार की स्थिरता और वित्तीय सुरक्षा भी बनी रहे. एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, "यह नीति भारत के बाजारों को विदेशी निवेशकों की एक नई श्रेणी के लिए खोलती है, बिना किसी रेगुलेटरी नियंत्रण के साथ समझौता किए. यह भारत और उन विदेशी निवेशकों — दोनों के लिए फायदेमंद है, जो दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था तक पहुंच बनाना चाहते हैं." सरकार की ओर से इसका आधिकारिक ऐलान आने वाले कुछ हफ्तों में होने की उम्मीद है.

(लेखक- पलक शाह, "द मार्केट माफिया - क्रॉनिकल ऑफ इंडिया’s हाई-टेक स्टॉक मार्केट स्कैंडल एंड द कबाल दैट वेंट स्कॉट-फ्री" किताब के लेखक हैं. पलक शाह पिछले दो दशकों से मुंबई में पत्रकारिता कर रहे हैं. उन्होंने द इकोनॉमिक टाइम्स, बिजनेस स्टैंडर्ड, द फाइनेंशियल एक्सप्रेस और द हिंदू बिजनेस लाइन जैसे प्रमुख पिंक पेपरों में काम किया है. वह 19 साल की उम्र में अपराध रिपोर्टिंग से जुड़े थे, लेकिन कुछ सालों में इस क्षेत्र में काम करने के बाद उन्हें यह महसूस हुआ कि अपराध की संरचना बदल चुकी थी और वह संगठित गिरोह, जैसा कि मुंबई ने 80 के दशक में देखा था, अब अस्तित्व में नहीं थे.  'व्हाइट मनी' अर्थव्यवस्था की जटिलताओं को समझने के उनके जुनून ने पलक को वित्त और नियामकों की दुनिया में पहुंचा दिया.)


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