होम / बिजनेस / कच्चे माल की ऊंची कीमतों से FY27 की दूसरी तिमाही में कंज्यूमर कंपनियों के मार्जिन पर दबाव: नोमुरा
कच्चे माल की ऊंची कीमतों से FY27 की दूसरी तिमाही में कंज्यूमर कंपनियों के मार्जिन पर दबाव: नोमुरा
ब्रेंट और एचडीपीई की कीमतों में सालाना आधार पर तेज बढ़ोतरी, चीनी, पाम ऑयल और लिक्विड पैराफिन भी महंगे.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 hour ago
भारतीय कंज्यूमर कंपनियों को वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही (2QFY27) में मार्जिन के मोर्चे पर दबाव का सामना करना पड़ सकता है. कच्चे माल की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं और कंपनियों की ओर से वित्त वर्ष की पहली तिमाही में की गई कीमत बढ़ोतरी इनपुट लागत में हुई वृद्धि की पूरी तरह भरपाई करने के लिए पर्याप्त नहीं रही है. नोमुरा की 28 सितंबर की रिपोर्ट के मुताबिक, निकट अवधि में यह अंतर कंपनियों के मार्जिन पर दबाव बनाए रख सकता है और आगे कीमतों में बढ़ोतरी की जरूरत पड़ सकती है.
रिपोर्ट के अनुसार, सितंबर में ज्यादातर कच्चे माल की कीमतें या तो सीमित दायरे में रहीं या महीने-दर-महीने आधार पर नरम हुईं. हालांकि, सालाना और तिमाही आधार पर कई प्रमुख इनपुट अभी भी काफी महंगे हैं.
ब्रेंट और एचडीपीई से बढ़ी लागत की चिंता
ब्रेंट क्रूड और एचडीपीई कंज्यूमर कंपनियों के लिए प्रमुख लागत दबाव बनकर उभरे हैं. नोमुरा के अनुसार, सितंबर में ब्रेंट क्रूड की कीमत सालाना आधार पर करीब 40 फीसदी अधिक रही, जबकि एचडीपीई की कीमत में 45 फीसदी की बढ़ोतरी हुई. ऊंची एचडीपीई कीमतों से पैकेजिंग लागत बढ़ने की आशंका है. वहीं, पेंट कंपनियों के लिए भी कच्चे माल की लागत पर इसका असर पड़ सकता है.
चीनी और पाम ऑयल भी बढ़ा रहे दबाव
सितंबर में चीनी की कीमतों में महीने-दर-महीने 8 फीसदी की गिरावट आई है और सरकारी कदमों के बाद यह अपने उच्चतम स्तर से करीब 21 फीसदी नीचे आ चुकी है. सरकार ने कीमतों पर दबाव कम करने के लिए शुल्क-मुक्त आयात और स्टॉक जारी करने जैसे कदम उठाए हैं.
इसके बावजूद चीनी की कीमत सालाना आधार पर 18 फीसदी और तिमाही आधार पर 16 फीसदी अधिक है. इससे ब्रिटानिया इंडस्ट्रीज, नेस्ले इंडिया, डाबर इंडिया, आईटीसी के फूड कारोबार और हिंदुस्तान यूनिलीवर के मार्जिन पर दबाव बना रह सकता है.
पाम ऑयल की कीमतें सितंबर में स्थिर रहीं, लेकिन रुपये में सालाना आधार पर करीब 21 फीसदी अधिक हैं. सरकार ने 24 सितंबर से क्रूड पाम ऑयल पर बेसिक कस्टम ड्यूटी 10 फीसदी से घटाकर 5 फीसदी कर दी है. नोमुरा के मुताबिक, इससे गोदरेज कंज्यूमर प्रोडक्ट्स और हिंदुस्तान यूनिलीवर जैसी साबुन बनाने वाली कंपनियों को कुछ राहत मिल सकती है.
लिक्विड पैराफिन की कीमतों में महीने-दर-महीने 5 फीसदी की कमी आई है, लेकिन यह अभी भी सालाना आधार पर 38 फीसदी अधिक है. इसका असर डाबर और Marico जैसी हेयर ऑयल कंपनियों तथा पर्सनल केयर कारोबार पर पड़ सकता है.
कॉफी और कोपरा से कुछ राहत
हालांकि, सभी कमोडिटी की कीमतों में तेजी नहीं है. रोबस्टा कॉफी की कीमत सितंबर में महीने-दर-महीने 5 फीसदी और सालाना आधार पर 11 फीसदी कम हुई. इससे नेस्ले इंडिया और हिंदुस्तान यूनिलीवर के मार्जिन को कुछ फायदा मिल सकता है.
अरबिका कॉफी की कीमत में महीने-दर-महीने 12 फीसदी और सालाना आधार पर 5 फीसदी की गिरावट आई है. नोमुरा के मुताबिक, इससे टाटा कंज्यूमर प्रोडक्ट्स के कॉफी कारोबार को फायदा हो सकता है.
कोपरा की कीमतें भी महीने-दर-महीने 3 फीसदी नरम हुई हैं और सालाना आधार पर 32 फीसदी नीचे हैं. नोमुरा का अनुमान है कि इससे मैरिको पर मार्जिन दबाव कम हो सकता है, हालांकि इससे कीमतों में आगे कटौती जरूरी नहीं होगी.
इस बीच, सितंबर में सोने की कीमतें स्थिर रहीं. सोना अपने उच्चतम स्तर से करीब 14 फीसदी नीचे आ चुका है. नोमुरा के मुताबिक, इससे आगामी त्योहारी और शादी के सीजन में ज्वेलरी की दुकानों पर ग्राहकों की आवाजाही और बिक्री को समर्थन मिल सकता है.
कंपनियों पर अलग-अलग असर
नोमुरा के अनुसार, कच्चे माल की मौजूदा कीमतों का असर सभी कंज्यूमर कंपनियों पर एक जैसा नहीं होगा. गोदरेज कंज्यूमर प्रोडक्ट्स पर क्रूड डेरिवेटिव्स और पाम ऑयल/PFAD की ऊंची कीमतों का दबाव रह सकता है. कंपनी ने वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में करीब 5 फीसदी कीमत बढ़ाई थी, लेकिन नोमुरा का अनुमान है कि दूसरी और तीसरी तिमाही में भी आगे कीमत बढ़ाने की जरूरत पड़ सकती है.
कोलगेट-पामओलिव इंडिया के मार्जिन पर मक्का और मेंथा ऑयल की बढ़ती कीमतों का असर पड़ सकता है. कंपनी की पैकेजिंग लागत में भी अपेक्षाकृत अधिक हिस्सेदारी है. टाटा कंज्यूमर प्रोडक्ट्स के लिए चाय की महंगाई और एचडीपीई की कीमतों में उतार-चढ़ाव, कॉफी की कम कीमतों से मिलने वाले फायदे को सीमित कर सकते हैं.
पेंट कंपनियों पर भी लागत का दबाव
पेंट कंपनियों के लिए स्थिति अपेक्षाकृत चुनौतीपूर्ण बनी हुई है. ऊंची क्रूड कीमतों, महंगे इन्वेंटरी खर्च और सीजनल तौर पर कमजोर तिमाही का एक साथ असर पड़ सकता है. नोमुरा के अनुसार, पेंट कंपनियों ने पहली तिमाही में करीब 12 फीसदी कीमत बढ़ोतरी की थी, लेकिन यह इनपुट लागत में हुई वृद्धि से कम है. ऐसे में दूसरी तिमाही में इनके मार्जिन पर अतिरिक्त दबाव देखने को मिल सकता है.
मौसम और कृषि जोखिम बढ़ा रहे अनिश्चितता
कमोडिटी कीमतों का आउटलुक मौसम और कृषि संबंधी जोखिमों से भी प्रभावित हो रहा है. नोमुरा के अनुसार, दक्षिण-पश्चिम मानसून की बारिश दीर्घकालिक औसत से 12 फीसदी कम रही है. वहीं, महाराष्ट्र और कर्नाटक के करीब 75 फीसदी हिस्से में सूखे जैसी स्थिति का सामना करना पड़ रहा था.
ब्रोकरेज ने अल नीनो के मजबूत होने और फरवरी 2027 तक बने रहने की संभावना का भी उल्लेख किया है, हालांकि, खरीफ उत्पादन में सालाना आधार पर गिरावट करीब 1.5 फीसदी तक सीमित रही है. 1 जुलाई 2026 तक सरकार के पास चावल और गेहूं का बफर स्टॉक संबंधित मानकों से क्रमशः करीब तीन गुना और 1.8 गुना था. नोमुरा के अनुसार, ये स्टॉक खाद्य महंगाई को नियंत्रित रखने में मदद कर सकते हैं और कुछ राहत दे सकते हैं.
नोमुरा का मानना है कि मजबूत उत्पाद पोर्टफोलियो, कीमत बढ़ाने की क्षमता और बेहतर क्रियान्वयन वाली कंज्यूमर कंपनियां ऐसे समय में लागत और मांग से जुड़ी बढ़ती अनिश्चितता से निपटने में सक्षम हो सकती हैं.
टैग्स