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भारत के ग्रीन एनर्जी सेक्टर के लिए यह मौका भुनाने का है सही समय, जानिए कैसे?

सुवोजॉय सेनगुप्ता का मानना है कि डाटा सेंटर, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और प्रोसेस इंडस्ट्री जैसे क्षेत्रों में नवीकरणीय ऊर्जा का इस्तेमाल और बढ़ने की उम्मीद है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

COP29 सम्मेलन इस हफ्ते अज़रबैजान में संपन्न हुआ, जहां कई हितधारक जलवायु परिवर्तन पर सामूहिक कार्रवाई के लिए अपनी प्रतिबद्धता दोहराने के लिए एकत्र हुए. हालांकि, मौजूदा भू-राजनीतिक परिस्थितियों (Geopolitical Uncertainty) और जीवन-यापन की बढ़ती लागत के चलते वैश्विक डीकार्बनाइजेशन प्रयास मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं. इसके बावजूद, यह सहमति बनी हुई है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए ठोस कदम उठाने की सख्त जरूरत है. अगले 4-5 साल बड़े देशों में ऊर्जा परिवर्तन की गति और तीव्रता के लिए बेहद अहम होंगे. 

भारत सरकार के प्रेस सूचना ब्यूरो के अनुसार, भारत ने COP29 में हुई प्रगति पर गंभीर चिंता जताई. भारत ने कहा कि हमारा क्षेत्र जलवायु परिवर्तन के सबसे बुरे प्रभावों का सामना कर रहा है, जबकि हमारी इनसे उबरने और इनके साथ तालमेल बिठाने की क्षमता बेहद कम है, और इन हालातों के लिए हम जिम्मेदार भी नहीं हैं. 

इस स्थिति का मतलब भारत के स्वच्छ ऊर्जा की ओर सफर के लिए क्या है? पिछले 7-8 वर्षों में भारत ने 140 गीगावाट से अधिक सोलर और विंड एनर्जी क्षमता जोड़ी है. सोलर और विंड एनर्जी अब सबसे सस्ती बिजली के स्रोत बन गए हैं. नई तकनीकों जैसे RTC (राउंड द क्लॉक पावर), FDRE (फ्लेक्सिबल डिस्पैचेबल रिन्यूएबल एनर्जी), और पीक पावर से रिन्यूएबल एनर्जी की हिस्सेदारी और बढ़ेगी. ग्रीन हाइड्रोजन, हालांकि अभी शुरुआती चरण में है, लेकिन कठिन उद्योगों को डीकार्बनाइज करने में मदद कर सकता है.

भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा रिन्यूएबल एनर्जी बाजार है, चीन और अमेरिका के बाद. अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के अनुसार, 2024-30 के दौरान चीन 3200 गीगावाट, अमेरिका 500 गीगावाट, और भारत लगभग 350 गीगावाट रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता जोड़ेगा. यूरोपीय संघ सामूहिक रूप से 500+ गीगावाट जोड़ेगा, लेकिन कोई भी एकल यूरोपीय देश चीन, अमेरिका या भारत के करीब नहीं है.  क्या वैश्विक हरित ऊर्जा रुझानों में संभावित अनिश्चितता भारत के लिए अपनी गति तेज करने का एक बड़ा मौका दे सकती है?  

हम चार प्रमुख अवसर देखते हैं. पहला, पूंजी उपकरण और सामग्री की आपूर्ति में. सोलर, बैटरी, पवन ऊर्जा और अन्य उपकरणों के उत्पादन की क्षमता बढ़ाई गई है, क्योंकि रिन्यूएबल एनर्जी की बढ़ती मांग की उम्मीद थी. अगर इस क्षेत्र में किसी कारण से प्रोजेक्ट्स धीमे होते हैं या प्रोत्साहन घटता है, तो उपकरणों की अधिकता हो सकती है, जिससे कीमतें कम हो सकती हैं. भारत पहले से ही हरित निर्माण (ग्रीन मैन्युफैक्चरिंग) का एक मजबूत तंत्र तैयार कर रहा है. यह समय इसे वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने का है.

जलवायु वित्त (क्लाइमेट फाइनेंस) जुटाने में दूसरा अवसर है. अगर अन्य देशों में प्रोत्साहन कम हो जाते हैं, तो निजी पूंजी का एक हिस्सा नए निवेश विकल्प खोज सकता है. नीतियों में अनिश्चितता से हरित ऊर्जा और बुनियादी ढांचे में लंबे समय तक निवेश करने का उत्साह भी कम हो सकता है. यह पूंजी मुख्य रूप से बड़े पेंशन फंड्स, सॉवरेन वेल्थ फंड्स और ESG फंड्स के पास है, जो जलवायु और ऊर्जा बदलाव में निवेश करने की प्रतिबद्धता रखते हैं। फिलहाल इस पूंजी का केवल एक छोटा हिस्सा उभरते बाजारों में निवेशित है. 

चीन के बाहर बड़े पैमाने पर बाजारों में से एक होने के नाते, भारत इस पूंजी को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए सक्रिय हो सकता है. यह भारत के लिए अवसर है कि वह निवेशकों को अपनी नीतियों की सक्रियता, विनियमन और जोखिम के अनुसार उचित रिटर्न दिखाए.  ऊर्जा की लागत (LCOE) के मामले में वैश्विक मानक तय करने का तीसरा अवसर है. भारत पहले से ही दुनिया में सबसे कम सोलर LCOE (लगभग 3 सेंट/KWH) में से एक प्रदान करता है. अब मौका है कि इसे पूरे दिन और रात (राउंड द क्लॉक) की आधार पर भी हासिल किया जाए. हाल ही में सोलर एनर्जी कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (SECI) की फर्म और डिस्पैचेबल रिन्यूएबल एनर्जी (FDRE) की टेंडर दरें 4.98–4.99 रुपये (6 सेंट से कम) प्रति KWH थीं. यह दिखाता है कि भारत इस दिशा में अच्छी प्रगति कर सकता है.

भारतीय बाजार में प्रतिस्पर्धा ने सोलर ऊर्जा परियोजनाओं की लागत (capex) प्रति मेगावाट लगातार कम की है. भारतीय बाजार का बड़ा पैमाना और बड़े पैमाने की नवीकरणीय परियोजनाओं के डिजाइन और प्रबंधन में भारत की उत्कृष्ट इंजीनियरिंग प्रतिभा, कैपेक्स और ऑपेक्स (संचालन लागत) को और भी बेहतर बना सकती है. अब अवसर है कि ऊर्जा भंडारण (पंप हाइड्रो और बैटरियों), ग्रिड फ्लेक्सिबिलिटी, डिमांड रिस्पॉन्स सॉल्यूशंस, और सहायक सेवाओं (एंसिलरी सर्विसेज) के बाजार के विकास जैसी तकनीकों में अधिक निवेश किया जाए. ट्रांसमिशन कनेक्टिविटी का समय पर विस्तार बेहद जरूरी है ताकि पूरी नवीकरणीय क्षमता को उपयोग में लाया जा सके. 

हाल ही में रूफटॉप सोलर और स्मार्ट मीटरिंग पर दिए गए जोर के साथ, ऊर्जा ग्रिड को द्वि-दिशात्मक प्रवाह (बाय-डायरेक्शनल फ्लो) और पीयर-टू-पीयर एनर्जी ट्रेडिंग जैसी नई तकनीकों को संभालने के लिए तैयार करना होगा. चौथा अवसर कठिन क्षेत्रों जैसे सीमेंट और स्टील का तेजी से हरित बदलाव करने का है. बढ़ती अर्थव्यवस्था की जरूरतों को पूरा करने के लिए इन क्षेत्रों में नई क्षमता की आवश्यकता होगी. रिन्यूएबल एनर्जी, वेस्ट हीट रिकवरी, ग्रीन हाइड्रोजन और बायोफ्यूल्स जैसी तकनीकों का संयोजन इन क्षेत्रों को टिकाऊ और लाभदायक विकास पथ पर ले जा सकता है. भारत ने पहले ही एक अनुपालन कार्बन बाजार (कॉम्प्लायंस कार्बन मार्केट) शुरू करने की योजना की घोषणा की है, जो इन क्षेत्रों में निवेश के लिए और अधिक प्रोत्साहन देगा. 

इन अवसरों का फायदा उठाकर भारत तेज आर्थिक विकास और डीकार्बोनाइजेशन का एक अनोखा मॉडल बना सकता है. आने वाले समय में डेटा सेंटर, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और प्रोसेस इंडस्ट्री जैसे क्षेत्रों में नवीकरणीय ऊर्जा का और अधिक इस्तेमाल बढ़ेगा, भविष्य में भारतीय रिन्यूएबल एनर्जी कंपनियां अपने कुशल प्रोजेक्ट निष्पादन मॉडल और वैश्विक पूंजी स्रोतों का उपयोग करते हुए अन्य देशों में भी प्रोजेक्ट्स विकसित कर सकती हैं. सबसे कम लागत वाली रिन्यूएबल एनर्जी ग्रीन हाइड्रोजन को बड़े पैमाने पर बढ़ावा देने का आधार बनेगी, जिससे जीवाश्म ईंधन के आयात में कमी आएगी. 

हर प्रकार की अनिश्चितता और बदलाव के दौर को एक अवसर के रूप में भी देखा जा सकता है. भारत के पास अगले 4-5 वर्षों में अपनी प्रगति को तेज करने और 2030 तक 500 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा का लक्ष्य समय से पहले हासिल करने का मौका है, वह भी अधिक कुशलता और निवेशकों के लिए बेहतर लाभ के साथ.  

डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं और जरूरी नहीं कि यह पब्लिकेशन के विचारों को दर्शाते हों.

(लेखक- सुवोजॉय सेनगुप्ता, चीफ एग्जीक्यूटिव ऑफिसर, AECOM इंडिया)
 


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