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Reliance में लगा 20 सालों का सबसे बड़ा शॉर्ट पोजीशन, क्या ये है Elon Musk का असर?

रिलायंस इंडस्ट्रीज में पिछले 20 वर्षों में सबसे बड़ा शॉर्ट पोजीशन निर्माण देखा गया है. यह संभवतः एलन मस्क के स्टारलिंक और स्पेसएक्स के प्रभाव की वजह से हो रहा है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

एलन मस्क, जो स्टारलिंक और स्पेसएक्स के ज़रिए सैटेलाइट टेलीफोनी में बहुत आगे हैं, उनकी तकनीक रिलायंस जियो (भारत की टेलीकॉम लीडर कंपनी) से बेहतर मानी जा रही है. सैटेलाइट टेलीफोनी को भविष्य की टेलीकॉम तकनीक माना जाता है. इस वजह से, रिलायंस इंडस्ट्रीज का 17.80 लाख करोड़ रुपये (लगभग 210 बिलियन डॉलर) का बाजार मूल्य शॉर्ट सेलर्स (शेयर गिरने पर फायदा कमाने वाले) के लिए आकर्षण बन गया है.

क्या हो रहा है रिलायंस इंडस्ट्रीज (RIL) के शेयरों के साथ?  

पिछले दो सालों से अडानी ग्रुप को नुकसान पहुंचाने की कोशिश के बाद, अब ये लोग रिलायंस पर निशाना साध रहे हैं. 28 नवंबर को RIL में लगभग 3 बिलियन डॉलर का फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट देखा गया. डेरिवेटिव्स (फ्यूचर्स एंड ऑप्शन्स) के विशेषज्ञों के अनुसार, इनमें से ज़्यादातर शॉर्ट पोज़िशन्स (शेयर गिरने पर शर्त लगाने वाले) थे, क्योंकि जैसे-जैसे RIL के फ्यूचर्स बढ़े, शेयर की कीमत गिरती रही. 28 नवंबर को RIL में 185 मिलियन फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट्स (ज़्यादातर शॉर्ट पोज़िशन्स) थे, जो पिछले 20 सालों में सबसे ज़्यादा थे. दिसंबर में ये संख्या थोड़ी घटी और अब 170 मिलियन कॉन्ट्रैक्ट्स है, जो फिर भी काफी बड़ी मानी जा रही है.  

2006 जैसा हाल?

स्ट्राइकमनी एनालिटिक्स और इंडिया चार्ट्स के फाउंडर कहते हैं कि अभी की स्थिति 2006 जैसी है, 2006 में भी ऐसा ही हुआ था. उस समय Nifty 30% गिरा था और RIL के शेयर ओवरबॉट (काफी महंगे) लग रहे थे. उस समय 200 मिलियन से ज़्यादा शॉर्ट पोज़िशन्स बनी थीं, धीरे-धीरे शेयर रिकवर हुआ था. अब भी, नवंबर में जब Nifty गिरा, तो RIL में भारी शॉर्ट पोज़िशन्स देखी गईं. अगर किसी वजह से "बियर स्क्वीज़" (शॉर्ट सेलर्स की जबरदस्ती खरीदारी) होती है, तो RIL के शेयर 5-6% तक बढ़ सकते हैं.

स्मोक सिग्नल्स (Smoke Signals)

RIL में इतने बड़े स्तर पर शॉर्ट पोजीशंस का निर्माण क्या दिखाता है? इसका मतलब है कि शॉर्ट सेलर्स (बियर्स) को लगता है कि RIL के शेयर की कीमत ज्यादा ऊपर नहीं जाएगी. साथ ही, उन्हें लगता है कि कोई बड़ा घटना कंपनी के शेयर की कीमत को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकती है.  भारत के वरिष्ठ शेयर बाजार विश्लेषक एसपी तुलसियान का मानना है कि RIL की वैल्यू बहुत ज्यादा है. वे कहते हैं, "RIL को टेलीकॉम और रिटेल बिजनेस के लिए होल्डिंग कंपनी का डिस्काउंट मिलना चाहिए, क्योंकि यह केवल रिलायंस जियो और रिलायंस रिटेल में बहुमत हिस्सेदारी रखती है, ये दोनों कंपनियां जल्द ही लिस्ट हो सकती हैं. 

तुलसियान ने यह भी कहा कि अगर टेलीकॉम सेगमेंट की बात करें, तो RIL की वैल्यू करीब ₹4 लाख करोड़ (लगभग $40 बिलियन) होनी चाहिए, जबकि भारती एयरटेल की मौजूदा मार्केट कैप करीब ₹9 लाख करोड़ है. एयरटेल की वैल्यू ज्यादा इसलिए है क्योंकि इसमें उसका अफ्रीका का बिजनेस भी शामिल है. वहीं, RIL को कम वैल्यू मिलनी चाहिए, क्योंकि यह रिलायंस जियो में केवल 67% हिस्सेदारी रखती है. इसलिए, टेलीकॉम सेगमेंट के लिए लगभग ₹4 लाख करोड़ की वैल्यू सही लगती है.

RIL के लिए मस्क हैं खतरा

एलन मस्क की स्पेसएक्स द्वारा संचालित स्टारलिंक भारत में टेलीकॉम के क्षेत्र में रिलायंस इंडस्ट्रीज (RIL) का सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी बन सकता है. मस्क के कारण दुनिया तेजी से सैटेलाइट टेलीफोनी की ओर बढ़ रही है. अब तक स्पेसएक्स 7,000 से ज्यादा सैटेलाइट लॉन्च कर चुका है और अपने नेटवर्क का विस्तार कर रहा है. 5 दिसंबर को मस्क ने घोषणा की कि उनकी कंपनी का पहला "स्टारलिंक डायरेक्ट टू मोबाइल" सैटेलाइट नेटवर्क तैयार हो गया है. मस्क का दावा है कि उनका नेटवर्क कभी फेल नहीं होगा, जब तक उपयोगकर्ता जमीन पर हैं.  

यह तकनीक RIL और अन्य टेलीकॉम कंपनियों की मौजूदा हार्डवेयर-आधारित तकनीक को कुछ सालों में अप्रासंगिक बना सकती है, जब तक कि वे नई उभरती तकनीकों को अपनाने में निवेश न करें. विश्लेषकों का मानना है कि सैटेलाइट तकनीक पर RIL का खर्च उसके कैश फ्लो को नुकसान पहुंचाएगा. हालांकि, RIL किसी अन्य सैटेलाइट प्रदाता के साथ साझेदारी कर सकता है, लेकिन ऐसा होने पर राजस्व में हिस्सेदारी करनी पड़ेगी.

मोदी सरकार पहले ही मस्क का समर्थन कर चुकी है. सरकार ने सैटेलाइट स्पेक्ट्रम को नीलाम करने के बजाय इसे सीधे आवंटित करने का निर्णय लिया, जो RIL और एयरटेल के विपरीत है. इससे अंबानी की RIL और मस्क की स्टारलिंक के बीच सीधा मुकाबला तय हो गया है. यह भी माना जाता है कि मोदी सरकार अमेरिकी डेमोक्रेटिक प्रशासन से असंतुष्ट थी और वह आने वाले रिपब्लिकन नेतृत्व, विशेष रूप से डोनाल्ड ट्रंप, जो मस्क के करीबी हैं, के साथ बेहतर संबंध चाहती है. इससे नीतिगत स्तर पर मस्क को पछाड़ने की अंबानी की संभावनाएं भी कम हो गई हैं. 

तुलसियान का मानना है कि "RIL रिलायंस जियो और रिलायंस रिटेल के लिए एक होल्डिंग कंपनी बनेगा. इसलिए, बाजार इसे होल्डिंग कंपनी का डिस्काउंट देंगे. उनके अनुसार, अगर टेलीकॉम को ₹4 लाख करोड़ माना जाए, तो रिटेल की वैल्यू ₹2.5 लाख से ₹3 लाख करोड़ तक हो सकती है, जो डेमार्ट जैसी कंपनियों की वैल्यू के आसपास है. पेट्रोकेमिकल्स बिजनेस की ₹7.5 लाख करोड़ की वैल्यू मानी जाए, तो भी पूरी कंपनी की वैल्यू ₹12.5 लाख से ₹13 लाख करोड़ (या कम) से ज्यादा नहीं होनी चाहिए, क्योंकि होल्डिंग कंपनी का डिस्काउंट और कर्ज है. खासकर होल्डिंग कंपनी डिस्काउंट और मौजूदा कर्ज को देखते हुए, RIL का कर्ज करीब ₹1.25-1.49 लाख करोड़ है.

इसके चार प्रमुख बिजनेस हैं - टेलीकॉम, पेट्रोकेमिकल्स, रिटेल और टेक्सटाइल्स. मीडिया और मनोरंजन का बिजनेस अलग कंपनी में लिस्टेड है. कंपनी ने नवीकरणीय ऊर्जा, जैव ऊर्जा, और मोबिलिटी बिजनेस में भी कदम रखा है. अभी RIL भारती एयरटेल से टेलीकॉम में, डेमार्ट से एफएमसीजी रिटेल में, टाटा ग्रुप से इलेक्ट्रिकल अप्लायंसेज और ज्वैलरी रिटेल में, और बिड़ला ग्रुप से फैशन रिटेल में प्रतिस्पर्धा कर रहा है. नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में RIL, आदानी ग्रुप से सीधी प्रतिस्पर्धा करेगा. मोबिलिटी में, RIL फिर से मस्क और जिस अमेरिकी अरबपति से भी वह साझेदारी करेगा, उससे मुकाबला करेगा.

होल्डिंग कंपनी डिस्काउंट क्या है?

होल्डिंग कंपनी डिस्काउंट उस अंतर को कहते हैं जो किसी होल्डिंग कंपनी की बाजार पूंजीकरण (मार्केट कैप) और उसकी निवेश संपत्तियों व अन्य नेट एसेट्स (जिनसे उसे कोई सीधा ऑपरेशनल इनकम नहीं होती) के बीच होता है. जब रिलायंस जियो और रिलायंस रिटेल का IPO आएगा, तो RIL उनके लिए एक होल्डिंग कंपनी बनकर रह जाएगी. इसका मतलब यह हो सकता है कि RIL को रिटेल और टेलीकॉम से सीधा मुनाफा नहीं मिलेगा. इन दोनों कंपनियों से RIL को केवल डिविडेंड इनकम (लाभांश) या इसी तरह की अन्य आय ही मिलेगी. RIL की अन्य व्यवसायों से होने वाली आय ही उसकी मुख्य कमाई होगी.

(लेखक- पलक शाह, BW रिपोर्टर. पलक शाह ने "द मार्केट माफिया-क्रॉनिकल ऑफ इंडिया हाई-टेक स्टॉक मार्केट स्कैंडल एंड द कबाल दैट वेंट स्कॉट-फ्री" नामक पुस्तक लिखी है. पलक लगभग दो दशकों से मुंबई में पत्रकारिता कर रहे हैं, उन्होंने द इकोनॉमिक टाइम्स, बिजनेस स्टैंडर्ड, द फाइनेंशियल एक्सप्रेस और द हिंदू बिजनेस लाइन जैसी प्रमुख वित्तीय अखबारों के लिए काम किया है).


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