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पश्चिम एशिया संकट से बढ़ा आर्थिक दबाव, फिर भी मजबूत बनी हुई है भारत की अर्थव्यवस्था: रिपोर्ट

तेल की बढ़ती कीमतें, सप्लाई चेन में रुकावट और विदेशी निवेश में उतार-चढ़ाव के बीच घरेलू मांग और मजबूत वित्तीय सिस्टम भारत को दे रहे सहारा.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 4 months ago

पश्चिम एशिया में जारी तनाव और युद्ध का असर अब वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ-साथ भारत पर भी साफ दिखाई देने लगा है. कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों, व्यापारिक मार्गों में बाधा और विदेशी निवेश में अस्थिरता ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ाया है. हालांकि इन चुनौतियों के बावजूद भारत की आर्थिक स्थिति अपेक्षाकृत मजबूत बनी हुई है. वित्त मंत्रालय और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) का मानना है कि मजबूत घरेलू मांग, स्थिर बैंकिंग व्यवस्था और सरकार की नीतिगत तैयारियों ने अर्थव्यवस्था को बड़े झटकों से बचाए रखा है.

ऊर्जा और व्यापार पर बढ़ा दबाव

इसके बावजूद वित्त मंत्रालय की ताजा रिपोर्ट कहती है कि भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत है, भले ही थोड़ी हिली हुई है. इसकी वजह है देश के अंदर मजबूत मांग, स्थिर वित्तीय सिस्टम और सरकार की नीतियां, जो झटकों को संभाल रही हैं.

पश्चिम एशिया संकट का सबसे बड़ा असर भारत के ऊर्जा आयात और व्यापार पर पड़ रहा है. भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा तेल और गैस आयात करता है और मिडिल ईस्ट इस आपूर्ति का प्रमुख केंद्र है. तनाव बढ़ने से न केवल तेल महंगा हुआ है, बल्कि शिपिंग लागत और सप्लाई चेन पर भी असर पड़ा है.

विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार बढ़ती भू-राजनीतिक अनिश्चितता से निर्यात, आयात और उत्पादन लागत प्रभावित हो सकती है. कई उद्योगों को कच्चे माल की उपलब्धता और समय पर शिपमेंट को लेकर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है.

महंगाई और ग्रोथ पर बढ़ा जोखिम

कच्चे तेल की कीमतें हाल के दिनों में 110 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गई हैं, जिससे भारत का आयात बिल बढ़ने की आशंका है. तेल महंगा होने का सीधा असर महंगाई पर पड़ता है, क्योंकि परिवहन से लेकर उत्पादन तक लगभग हर क्षेत्र में लागत बढ़ जाती है.

RBI ने भी चेतावनी दी है कि महंगे कच्चे माल और सप्लाई में बाधा आर्थिक विकास की रफ्तार को धीमा कर सकती है. हालांकि सरकार फिलहाल पेट्रोल और डीजल की कीमतों को स्थिर रखने की कोशिश कर रही है, लेकिन लंबे समय तक ऐसा करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है.

विदेशी निवेश में उतार-चढ़ाव

वैश्विक अनिश्चितता का असर विदेशी निवेश पर भी दिखाई दे रहा है. 2026 के शुरुआती महीनों में विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजारों से करीब 1.8 लाख करोड़ रुपये निकाले हैं. इससे शेयर बाजार और रुपये पर दबाव बढ़ा है.

हालांकि घरेलू निवेशकों ने इस दौरान बाजार को स्थिर बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई है. म्यूचुअल फंड और रिटेल निवेशकों की लगातार भागीदारी ने बाजार में भरोसा बनाए रखा.

क्यों मजबूत मानी जा रही है भारतीय अर्थव्यवस्था?

विशेषज्ञों के अनुसार भारत की अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत उसकी घरेलू मांग है. देश की 60 फीसदी से ज्यादा आर्थिक गतिविधियां घरेलू खपत पर आधारित हैं, जिससे बाहरी झटकों का असर सीमित रहता है.

इसके अलावा बैंकिंग सेक्टर की स्थिति मजबूत है, कंपनियों की बैलेंस शीट पहले से बेहतर हुई है और भारत का विदेशी मुद्रा भंडार करीब 697 अरब डॉलर के स्तर पर बना हुआ है. सेवाओं का निर्यात भी अर्थव्यवस्था को मजबूती दे रहा है.

संकट को अवसर में बदलने की चुनौती

अर्थशास्त्रियों का मानना है कि मौजूदा संकट भारत के लिए एक बड़ा सबक भी है. देश को ऊर्जा आयात पर निर्भरता कम करने, सप्लाई चेन को मजबूत बनाने और नवीकरणीय ऊर्जा के इस्तेमाल को तेज करने की जरूरत है.

सरकार पहले से ही ग्रीन एनर्जी, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने पर जोर दे रही है. आने वाले समय में यही कदम भारत को वैश्विक झटकों से ज्यादा सुरक्षित बना सकते हैं.

आगे कैसी रहेगी अर्थव्यवस्था की चाल?

फिलहाल भारत की अर्थव्यवस्था दबाव में जरूर है, लेकिन उसकी बुनियादी स्थिति मजबूत मानी जा रही है. घरेलू मांग, सरकारी निवेश और वित्तीय स्थिरता ने अर्थव्यवस्था को सहारा दिया है. हालांकि पश्चिम एशिया का संकट अगर लंबा खिंचता है तो महंगाई, व्यापार और विकास दर पर असर और गहरा हो सकता है. ऐसे में सरकार और केंद्रीय बैंक के अगले कदम भारतीय अर्थव्यवस्था की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे.
 


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