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अडानी ग्रुप के लिए राहत की खबर, ट्रंप ने विदेशी रिश्वत रोकने वाले कानून को रोका
बाइडेन सरकार ने भारत की मौजूदा सरकार पर दबाव बनाकर रिश्तों में खटास पैदा की थी, लेकिन अब ट्रंप के फैसले से अमेरिका-भारत संबंधों में सुधार के संकेत दिख रहे हैं.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago
पलक शाह
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बड़ा फैसला लिया है, जिसका सीधा असर भारत की अडानी ग्रुप पर पड़ेगा. ट्रंप ने एक आदेश जारी कर अमेरिका के न्याय विभाग (DoJ) को 50 साल पुराने उस कानून को लागू करने से रोक दिया है, जो अमेरिकी कंपनियों और विदेशी फर्मों को दूसरे देशों के सरकारी अधिकारियों को रिश्वत देने से रोकता था.
जो बाइडेन की सरकार के दौरान अमेरिका के न्याय विभाग ने अरबपति गौतम अडानी और उनकी कंपनी पर आरोप लगाए थे कि उन्होंने भारत में सोलर पावर प्रोजेक्ट्स के ठेके लेने के लिए भारतीय अधिकारियों को 265 मिलियन डॉलर (लगभग 2,200 करोड़ रुपये) की रिश्वत दी थी. अब, क्योंकि राष्ट्रपति ट्रंप ने इस कानून (Foreign Corrupt Practices Act - FCPA) को ही रोक दिया है, इसलिए अडानी ग्रुप के खिलाफ लगे आरोप हट सकते हैं.
राजनीतिक हलकों में पहले से चर्चा थी कि बाइडेन सरकार पीएम मोदी की नीतियों से खुश नहीं थी, खासकर रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ उनकी नजदीकियों को लेकर. इसीलिए, बाइडेन प्रशासन ने कई ऐसे कदम उठाए जो भारत की मौजूदा सरकार के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकते थे. चूंकि अडानी ग्रुप गुजरात से है, जो पीएम मोदी का गृह राज्य है, इसलिए इसे मोदी सरकार के करीबी के रूप में देखा जाता है. लेकिन अब खबरों के मुताबिक, ट्रंप ने अमेरिका की अटॉर्नी जनरल पैम बॉन्डी को निर्देश दिया है कि वे FCPA कानून को लागू करने के नए नियम तैयार करें. इसका मतलब है कि अडानी ग्रुप को अब इस मामले से राहत मिल सकती है.
ट्रंप ने इस कानून पर हस्ताक्षर करते हुए कहा, "यह सुनने में अच्छा लगता है, लेकिन देश को नुकसान पहुंचाता है." आपको बता दें कि FCPA कानून 1977 में लागू हुआ था, जो अमेरिकी कंपनियों और विदेशी कंपनियों को दूसरे देशों के सरकारी अधिकारियों को रिश्वत देने से रोकता है. 1998 में इसमें बदलाव किए गए ताकि यह कानून उन विदेशी कंपनियों और लोगों पर भी लागू हो, जो अमेरिका के अंदर रहकर किसी को रिश्वत देने की योजना बनाते हैं या इस प्रक्रिया को मंजूरी देते हैं. यह कानून सिर्फ सीधी रिश्वत पर ही नहीं, बल्कि उन मामलों पर भी लागू होता है, जहां रिश्वत देने की योजना बनाई गई हो या प्रस्ताव दिया गया हो.
(लेखक- पलक शाह, "द मार्केट माफिया - क्रॉनिकल ऑफ इंडिया’s हाई-टेक स्टॉक मार्केट स्कैंडल एंड द कबाल दैट वेंट स्कॉट-फ्री" किताब के लेखक हैं. पलक शाह पिछले दो दशकों से मुंबई में पत्रकारिता कर रहे हैं. उन्होंने द इकोनॉमिक टाइम्स, बिजनेस स्टैंडर्ड, द फाइनेंशियल एक्सप्रेस और द हिंदू बिजनेस लाइन जैसे प्रमुख पिंक पेपरों में काम किया है. वह 19 साल की उम्र में अपराध रिपोर्टिंग से जुड़े थे, लेकिन कुछ सालों में इस क्षेत्र में काम करने के बाद उन्हें यह महसूस हुआ कि अपराध की संरचना बदल चुकी थी और वह संगठित गिरोह, जैसा कि मुंबई ने 80 के दशक में देखा था, अब अस्तित्व में नहीं थे. 'व्हाइट मनी' अर्थव्यवस्था की जटिलताओं को समझने के उनके जुनून ने पलक को वित्त और नियामकों की दुनिया में पहुंचा दिया.)
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