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RBI से मिली हरी झंडी, क्या अब IDBI बैंक को बेचने का साहस दिखा पाएगी Modi सरकार?

बताया जा रहा है कि RBI ने IDBI बैंक के बोलीदाताओं को लेकर अपनी रिपोर्ट मोदी सरकार को सौंप दी है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 2 years ago

मोदी सरकार पिछले काफी समय से आईडीबीआई बैंक (IDBI Bank) को निजी हाथों में सौंपना चाहती है. इस बैंक में बिज़नेस घरानों ने दिलचस्पी दिखाई है. सरकार को इस मामले में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की हरी झंडी का इंतजार था, जो अब मिल गई है. दरअसल, सरकार RBI से यह जानना चाह रही थी कि क्या IDBI बैंक के लिए बोली लगाने वाले निर्धारित मानदंडों को पूरा करते हैं या नहीं. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, RBI ने सरकार को अपने आकलन से अवगत कराते हुए बैंक के निजीकरण पर आगे बढ़ने के लिए उसे हरी झंडी दिखा दी है. अब सवाल यह उठता है कि क्या सरकार नाराज़गी के बावजूद  IDBI को बेचने का साहस दिखा पायेगी?

इतनी हिस्सेदारी बिकेगी
मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो RBI ने IDBI बैंक के लिए बोली लगाने वालों पर अपनी 'फिट एंड प्रॉपर' रिपोर्ट सरकार को सौंप दी है. इस रिपोर्ट में एक विदेशी बोलीदाता को छोड़कर बाकी सबका जिक्र है. विदेशी बोलीदाता की तरफ से जानकारी साझा नहीं की गई थी, इसलिए RBI ने अपनी रिपोर्ट में उसका जिक्र नहीं किया है. मोदी सरकार के पास आईडीबीआई बैंक में 45.5% हिस्सेदारी है. जबकि देश की सबसे बड़ी इंश्योरेंस कंपनी एलआईसी भी इसमें 49% से अधिक हिस्सेदारी रखती है. योजना के अनुसार सरकार बैंक में कुल 60.7% हिस्सेदारी बेच सकती है. इसमें सरकार की 30.5% और LIC की 30.2% हिस्सेदारी शामिल है.

सरकार की भरेगी झोली
आईडीबीआई का मार्केट कैप वर्तमान में करीब 95,000 करोड़ रुपए है. इस लिहाज से देखें तो हिस्सेदारी बेचने से सरकार की झोली में लगभग 29,000 करोड़ रुपए मिल सकते हैं. मोदी सरकार अपने पिछले दो कार्यकालों में प्राइवेटाइजेशन पर खासा जोर देती आई है. उसने  IDBI के साथ-साथ BPCL, कॉनकॉर, बीईएमएल, शिपिंग कॉर्पोरेशन, दो अन्य सरकारी बैंकों और एक बीमा के निजीकरण की इच्छा दर्शाई थी, लेकिन पिछले 18 महीनों से इस दिशा में कोई प्रगति नहीं हुई है. पहले माना जा रहा था कि लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद सरकार तेजी से इस पर काम करेगी, लेकिन नतीजे भाजपा के अनुरूप नहीं होने के चलते निजीकरण पर फिलहाल कुछ कहना मुश्किल है. 

बैंक के पास इतनी संपत्ति 
IDBI बैंक के विनिवेश की प्रक्रिया अक्टूबर 2022 में शुरू हो गई थी.IDBI बैंक के पास 11,520 करोड़ रुपए की विलंबित कर एसेट्स हैं. इसके अलावा मुंबई, पुणे और चेन्नई सहित कई शहरों में उसकी 129 संपत्तियां भी हैं. बैंक की मुंबई में 68, पुणे में 20, चेन्नई में 9 और अहमदाबाद में 7 प्रॉपर्टी हैं. इसी तरह, कोलकाता में 6 और दिल्ली में 5 और हैदराबाद में भी 5 संपत्तियां हैं. यहां गौर करने वाली बात ये है कि हाल ही में 7 राज्यों के 13 सीटों पर हुए उपचुनाव में भी भाजपा और उसके सहयोगियों का  प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा है. उसे मात्र 2 सीटों पर जीत मिली. नीतीश कुमार अपने प्रदेश बिहार में सीट नहीं जीत पाए. ऐसे में यह देखना वाकई दिलचस्प होगा कि क्या मोदी सरकार लोगों को और नाराज करने वाला कोई फैसला ले सकती है?

सहयोगी ही रहे हैं विरोधी
इससे पहले लगातार दो बार भाजपा ने केंद्र में पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाई थी, जबकि इस बार उसे सहयोगियों की मदद से सत्ता की सीढ़ी चढ़नी पड़ी है. नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू इस सीढ़ी को थामने वाले प्रमुख सहयोगी हैं. खास बात यह है कि दोनों ही निजीकरण पर मोदी सरकार के खिलाफ आवाज उठा चुके हैं.2021 में तेलुगू देशम पार्टी (TDP) प्रमुख एन. चंद्रबाबू नायडू (Chandrababu Naidu) ने केंद्र के राष्ट्रीय इस्पात निगम लिमिटेड (National Steel Corporation Limited) के निजीकरण के फैसले का विरोध किया था. उन्होंने बाकायदा PM मोदी को पत्र लिखकर अपनी नाराज़गी जताई थी और निजीकरण रोकने की अपील की थी. इसी तरह, जनता दल (यूनाइटेड) के मुख्य नीतीश कुमार रेलवे के निजीकरण के विरोधी रहे हैं. उन्होंने कई मौकों पर खुलकर अपना विरोध भी जाहिर किया है. 2019 ने नीतीश कुमार ने कहा था कि रेलवे का निजीकरण नहीं किया जाना चाहिए. 
 


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