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इस देश की PM की प्राइवेट पार्टी पर बवाल, क्या प्रधानमंत्री की जिंदगी में निजी कुछ भी नहीं?

फिनलैंड की प्रधानमंत्री सना मरीन को फिलहाल उनके एक वीडियो के लिए निशाना बनाया जा रहा है. जिसमें वह अपने दोस्तों के साथ पार्टी करती नज़र आ रही हैं.

नीरज नैयर 3 years ago

बायकॉट और आलोचना आजकल सबसे ज्यादा ट्रेंडिंग हैं. बायकॉट के चलते भारत में आमिर खान की फिल्म फ्लॉप हो गई. एक फिल्म बनाने में कई लोगों की मेहनत और करोड़ों रुपया लगता है. ऐसे में किसी एक व्यक्ति के नाम पर फिल्म के खिलाफ अभियान छेड़ देना, उससे जुड़े बाकियों पर जुल्म की तरह है. लेकिन यह बात उसे नहीं समझाई जा सकती, जो केवल विरोध के लिए विरोध कर रहा है. वहीं, भारत से 5974 किमी दूर फिनलैंड में प्रधानमंत्री सना सना मरीन की जमकर आलोचना हो रही है. उनके खिलाफ सोशल मीडिया पर अभियान चलाया जा रहा है. जिस तरह भारत में बायकॉट के तर्क को समझना मुश्किल है, ठीक उसी तरह सना मरीन की आलोचना भी समझ से परे है. 

जायज अचानक से नाजायज हो गया
महज 34 साल की उम्र में प्रधानमंत्री बनने वालीं सना मरीन को फिलहाल उनके एक वीडियो के लिए निशाना बनाया जा रहा है. जिसमें वह अपने दोस्तों के साथ पार्टी करती नज़र आ रही हैं. सना यदि आम लड़की होतीं, तो उनका पार्टी करना जायज था, लेकिन चूंकि वह देश की प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठीं हैं, जायज अचानक से नाजायज हो गया. इसमें कोई दोराय नहीं है कि मुल्क की जिम्मेदारी संभालने वाले का व्यवहार और आचरण सामान्य लोगों से अलग होना चाहिए. लेकिन ख़ुशी व्यक्त करने का जितना अधिकार एक सामान्य नागरिक को है, क्या उतना ही प्रधानमंत्री को नहीं होना चाहिए?

PM की जिंदगी में ‘निजी’ कुछ नहीं होता
सना की गलती सिर्फ इतनी है कि पार्टी में जाने की भूल करने के साथ ही वह थिरकने का गुनाह कर बैठीं. यदि सबकुछ सियासी पार्टियों की तरह होता, जहां असम्भ्य नेता भी मीडिया की मौजूदगी के चलते कुछ देर के लिए सभ्यता का पाठ सीख जाते हैं, तो किसी को कोई दिक्कत नहीं होती. लेकिन यह उनकी निजी पार्टी थी और शायद आलोचकों के लिए प्रधानमंत्री की जिंदगी में ‘निजी’ कुछ नहीं होता. उनकी नज़र में PM की कुर्सी पर बैठा शख्स संवैधानिक मर्यादाओं से इस कदर जकड़ा होना चाहिए कि उसके लिए ‘अपना’ कुछ न रह जाए. पर क्या यह वाजिब है?

जिम्मेदारियों को बखूबी निभाया
मानव और रोबोट में यही फर्क है कि इंसान खुद को व्यक्त कर सकता है, अपने इमोशन, खुशी को बयां कर सकता है और वालीं सना मरीन ने जो किया वह एक सामान्य प्रतिक्रिया है. 10 से 6 की नौकरी करने वाला जब शाम को अपने बोझ का हवाला देकर जाम छलका सकता है, तो एक देश चलाने वाले पर कितना बोझ होगा, समझा जाना चाहिए. इस ‘बोझ’ को लगातार उठाए रखने के लिए, उसे शारीरिक और मानसिक रूप दोनों से स्वस्थ होना ज़रूरी है. अपनों का साथ, उनके बीच बिताए पल, नाच-गाना इस स्वास्थ्य के लिए बेहद ज़रूरी हैं और यदि सना ने इसके लिए कुछ समय निकाल लिया, तो इसमें बवाल किस बात का? वो भी तब जब एक प्रधानमंत्री के रूप में वह अपनी सभी जिम्मेदारियों को बखूबी निभा रही हैं. 

पूरी दुनिया हुई सना की कायल
सना मरीन 2019 से फ़िनलैंड की प्रधानमंत्री हैं और उनके कार्यकाल में फिनलैंड लगातार पांचवीं बार दुनिया का सबसे खुशहाल देश चुना गया है. रूस-यूक्रेन युद्ध के मुद्दे पर उन्होंने जो रुख अख्तियार किया, उसकी पूरी दुनिया कायल है. रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के सामने बोलने में दुनिया के ताकतवर देशों के नेता भी सहम जाते हैं, लेकिन सना ने उन्हें दो टूक शब्दों में कह दिया था कि फ़िनलैंड को भी नाटो में शामिल होने का अधिकार है. उन्होंने यह महज कहने के लिए नहीं कहा, बल्कि उनकी सरकार इस दिशा में आगे भी बढ़ी. बतौर प्रधानमंत्री सना देश में समानता के लिए काम कर रही हैं, महिलाओं के अधिकार उनकी पहली प्राथमिकता हैं. 2020 में उन्हें BBC की विश्व की 100 सबसे ज्यादा प्रभावशाली महिलाओं की लिस्ट में शामिल किया था. फोर्ब्स पत्रिका ने भी सना मेरिन को प्रभावशाली महिलाओं की सूची में जगह दी है. वह टाइम मैग्जीन के कवर पेज पर भी आ चुकी हैं. 

प्रधानमंत्री को भी कुछ हक हैं
फिनलैंड की प्रधानमंत्री को जो भी सम्मान मिले हैं, वह उनकी काबिलियत और काम की बदौलत मिले हैं. एक प्रधानमंत्री जो अपना हर काम पूरी ईमानदारी से कर रही हैं, क्या उन्हें अपने हिसाब से जिंदगी जीने के लिए कुछ पल नहीं मिलने चाहिए? इस आलोचना को तब सही कहा जा सकता था, जब सना हर मोर्चे पर विफल साबित हो रहीं होतीं, जनता उनके शासन से आजिज आ गई होती, लोग उनके खिलाफ सड़कों पर होते, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं है. सना मरीन प्रधानमंत्री हैं, साथ ही वह एक इंसान भी हैं, लिहाजा उन्हें भी इंसान के तौर पर अपनी भावनाएं, प्रतिक्रियाएं और खुशी व्यक्त करने का अधिकार होना चाहिए.


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