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कांग्रेस ने अंबानी के करीबी परिमल नथवानी को राज्यसभा का तख्त सौंपा

जब राहुल गांधी "मोदी के दो दोस्त" का राग अलाप रहे हैं, उसी समय झारखंड में उनके अपने महागठबंधन ने मुकेश अंबानी के करीबी ग्रुप प्रेसिडेंट परिमल नथवानी को राज्यसभा की सीट थाली में परोस दी.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 4 months ago

पलक शाह 

परिमल नथवानी एक बार फिर राज्यसभा जा रहे हैं.

जो लोग नथवानी से परिचित नहीं हैं, उनके लिए संक्षिप्त परिचय: वह रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड में ग्रुप प्रेसिडेंट (कॉरपोरेट अफेयर्स) हैं. यानी मुकेश अंबानी की रिलायंस. वही मुकेश अंबानी, जिनके खिलाफ राहुल गांधी पिछले लगभग एक दशक से हर मंच, हर भाषा, हर राज्य और हर चुनाव में बोलते रहे हैं,  "मोदी के दो दोस्त: अडानी और अंबानी."

नथवानी किसी भी मायने में पारंपरिक राजनेता नहीं हैं, वह कॉरपोरेट दुनिया के उस सीनेटर जैसे व्यक्ति हैं, जिनकी उपयोगिता रिलायंस के लिए उन कमरों में मौजूद रहने में है जहां कानून बनाए जाते हैं. वह कई कार्यकालों से इस भूमिका में रहे हैं, पहले गुजरात से और अब झारखंड से. हमेशा निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में, हमेशा भाजपा के समर्थन के साथ, और इस व्यवस्था को लेकर शामिल सभी लोग भलीभांति जानते रहे हैं.

इसमें कुछ भी नया नहीं है.

जो नया है और जो 18 जून, 2026 को नथवानी की संसद में वापसी को अलग बनाता है, वह यह है कि उन्हें वहां पहुंचाने में किसने मदद की.

क्योंकि इस बार परिमल नथवानी कांग्रेस के बिना नहीं जीते, वे कांग्रेस की वजह से जीते.

अंबानी को कोसने के 10 साल, उन्हें चुनने की एक दोपहर

आइए, अभी जो हुआ है उसकी लगभग काव्यात्मक विडंबना को समझें.

राहुल गांधी ने 2019 के बाद अपनी राजनीतिक पहचान एक केंद्रीय तर्क पर बनाई है: कि नरेंद्र मोदी भारत को दो लोगों गौतम अडानी और मुकेश अंबानी के हित में चलाते हैं. उन्होंने यह बात संसद में कही. हजारों किलोमीटर लंबी भारत जोड़ो यात्राओं में कही. इंटरव्यू में, प्रेस कॉन्फ्रेंस में और सोशल मीडिया पोस्ट में कही, जिन्हें उनके समर्थक लगभग धार्मिक ग्रंथ की तरह साझा करते हैं.

चुनाव हार गए? अडानी, अंबानी.
बाजार ऊपर गया? अडानी, अंबानी.
लोकतंत्र कमजोर हुआ? अडानी, अंबानी.

"मोदी के दो दोस्त," वह गरजते हैं और भीड़ जवाब देती है, "अडानी और अंबानी."

सच कहें तो यह प्रभावी ब्रांडिंग है. यह जटिल सवालों को सरल बना देती है और आसानी से लोगों तक पहुंचती है. उन्होंने इसे संसद में, लंदन में, वाशिंगटन में और उन पत्रकारों के सामने दोहराया है जो इसे सत्ता से सच बोलना बताते हैं. एक ऐसे नेता के लिए जिनके अन्य राजनीतिक तर्क ज्यादा असरदार नहीं रहे, यह नारा बहुत लंबे समय तक चला.

जब तक आप यह न पढ़ लें कि नाथवानी को राज्यसभा किसने भेजा.

यही बात रांची में हुई घटना को असाधारण बनाती है.

18 जून को कांग्रेस के नेतृत्व वाले महागठबंधन, जिसका कांग्रेस हिस्सा है, जिसे संभालने के लिए कांग्रेस ने वरिष्ठ नेताओं को भेजा था और जो झारखंड सरकार चलाता है, मुकेश अंबानी के ग्रुप प्रेसिडेंट को राज्यसभा लौटने से रोक नहीं पाया. सिर्फ रोक नहीं पाया, बल्कि अनजाने में उनकी राह आसान भी कर दी.

दो अरबपतियों के खिलाफ दस साल तक लड़ने के बाद अंततः उनमें से एक के लिए संसदीय नियुक्ति एजेंसी की तरह काम करने की राजनीतिक प्रतिभा वास्तव में दुर्लभ होती है.

गणित हमेशा निर्मम था

इस चुनाव का गणित जटिल नहीं था. झारखंड विधानसभा में 81 सदस्य हैं. राज्यसभा सीट जीतने के लिए 28 प्रथम वरीयता वोट चाहिए थे.

महागठबंधन झामुमो, कांग्रेस, राजद और भाकपा (माले) का गठबंधन के पास 56 विधायक थे. ठीक 56. यानी दो उम्मीदवारों को जिताने के लिए बिल्कुल पर्याप्त संख्या. न 57. न 60. सिर्फ 56. 28 गुणा 2. एकदम सटीक.

एनडीए, भाजपा और उसके सहयोगियों के पास 24 विधायक थे. कोटे से चार कम.

इसके अलावा एक निर्दलीय विधायक भी थे: टाइगर मेहता. उनका नाम भले अंतरात्मा की आवाज पर वोट देने वाले व्यक्ति का आभास देता हो, लेकिन उनकी राजनीतिक प्रवृत्तियां नथवानी के पक्ष में झुकी हुई दिखती थीं.

तो समीकरण था: एनडीए 24 से अधिक टाइगर मेहता 1 = 25. फिर भी तीन वोट कम.

कागज पर नथवानी की हार तय लग रही थी. फिर उन्हें किसने बचाया? इसका जवाब कहीं न कहीं राहुल गांधी तक पहुंचता है.

कांग्रेस को सिर्फ एक दोपहर के लिए 56 लोगों को एकजुट रखना था.

झामुमो को पता था कि गणित तंग है. उन्होंने सार्वजनिक रूप से दावा किया कि उनके पास 61 वोट हैं. जबकि विधानसभा में उनके गठबंधन के पास 56 सदस्य ही थे. अगर यह सच होता तो पांच विधायक प्रेस कॉन्फ्रेंस और मतदान के बीच अचानक प्रकट हो गए होते.

बांध में रिसाव था और हर कोई उसकी आवाज सुन सकता था.

तीन वोट बाहर, बीस वोट अंदर. कांग्रेस का उम्मीदवार खत्म

छोटे गठबंधन सहयोगियों में असंतोष की एक खास किस्म होती है और झारखंड में राजद के चार विधायक कुछ समय से उसी में डूबे हुए थे.

सत्ता साझेदारी से नाराज. सम्मान को लेकर नाराज. अपने वोटों की उपयोगिता के बावजूद उपेक्षित महसूस करने से नाराज.

कांग्रेस यह जानती थी. कांग्रेस ने नेताओं को स्थिति संभालने भेजा था. बताया गया कि तेजस्वी यादव से भी अपने विधायकों को एकजुट रखने को कहा गया था.

लेकिन तीन विधायक साथ नहीं रहे.

महागठबंधन के भीतर से तीन वोट नथवानी को चले गए. उनके 25 वोटों के आधार में ये तीन वोट जुड़ गए और वह 28 के आंकड़े तक पहुंच गए. कुल 30 वोट पड़े, जिनमें दो अमान्य घोषित हुए. नथवानी पहली वरीयता के वोटों से सीधे जीत गए.

कांग्रेस के उम्मीदवार प्रणव झा को 20 वोट मिले. उन्हें 28 चाहिए थे. उन्हें 20 ही मिले.

56 विधायकों वाले गठबंधन में. उस राज्य में जहां कांग्रेस 2019 से सत्ता में साझेदार है. ऐसे चुनाव में जिसकी तैयारी के लिए महीनों का समय था.

झामुमो के बैद्यनाथ राम अपनी सीट जीत गए. गठबंधन का उम्मीदवार, जिसे झामुमो के 34 अनुशासित विधायकों का समर्थन मिला, आराम से जीत गया. हार केवल कांग्रेस के उम्मीदवार की हुई.

भाजपा ने यह सीट नहीं छीनी, कांग्रेस ने दरवाजा खुला छोड़ा

भाजपा ने क्या किया, इसका श्रेय उसे देना चाहिए. उसने नथवानी को भाजपा उम्मीदवार नहीं बनाया. वे निर्दलीय उम्मीदवार थे.

इसका मतलब यह था कि उनके पक्ष में वोट देने वाले विधायक यह कह सकते थे कि उन्होंने अंतरात्मा की आवाज पर वोट दिया, न कि "भाजपा के आदमी" को.

"निर्दलीय उम्मीदवार" एक ऐसा सौदा है जिसकी ज्यादा व्याख्या नहीं करनी पड़ती.

भाजपा ने कमजोरी पहचान ली, असंतुष्ट राजद विधायक. उसने अपनी रणनीति बनाई और बाकी काम कांग्रेस पर छोड़ दिया.

जिसे आप कभी चुनौती नहीं देते, वह दुश्मन नहीं होता. वह चुनावी बजट होता है

घटनाओं का एक ऐसा संस्करण भी है जिसमें कांग्रेस नेतृत्व के प्रति थोड़ी सहानुभूति महसूस की जा सकती है. गठबंधन प्रबंधन वास्तव में कठिन काम है. राजद के साथ संबंध पहले से ही तनावपूर्ण थे. भारत में छोटे सहयोगी दल अक्सर ऐसे ही होते हैं.

लेकिन यह तर्क उस नारे के सामने टिक नहीं पाता.

आप "अंबानी" को अपनी राजनीति का सबसे बड़ा खलनायक बनाकर फिर उसी व्यक्ति के करीबी को संसद पहुंचाने का कारण नहीं बन सकते. और फिर भी उसी नारे को जारी नहीं रख सकते.

भीड़ अब भी यह नारा लगाएगी. लेकिन उसका असर कम हो चुका है.

क्योंकि अब स्वाभाविक सवाल यह है: अगर भाई-भतीजावादी पूंजीवाद वास्तव में उतना बड़ा मुद्दा है जितना आप बताते हैं, और सत्ता में आने पर आप यही करते हैं, तो फिर आप वास्तव में क्या पेश कर रहे हैं?

रिलायंस का एक भी अनुबंध प्रभावित नहीं हुआ. कंपनी के खिलाफ एक भी नियामकीय फैसला नहीं गया. अंबानी के करीबी लगातार संसद में रहे और भाषण जारी रहे.

एक विचारधारा यह भी कहती है कि राहुल गांधी के लिए अरबपति खलनायक को स्थायी निशाने के रूप में बनाए रखना, उसे वास्तव में पराजित करने से अधिक राजनीतिक रूप से उपयोगी है.

इसलिए जिसे आप कभी वास्तव में चुनौती नहीं देते, वह दुश्मन नहीं होता. वह सिर्फ एक सहारा होता है.

मोदी के दो दोस्त. और तीसरा कभी-कभी कांग्रेस

सालों से नारा सरल रहा है.

"मोदी के दो दोस्त: अडानी और अंबानी."

लेकिन 18 जून को, जब परिमल नथवानी को तीन अतिरिक्त वोटों की जरूरत थी, तो वे वोट भाजपा से नहीं आए. भाजपा अपनी पूरी क्षमता के साथ 25 वोटों पर थी.

ये तीन वोट महागठबंधन के भीतर से आए. उस गठबंधन से जिसका नेतृत्व राहुल गांधी करते हैं. कांग्रेस के गठबंधन से.

शायद अब नारे में थोड़ा बदलाव चाहिए.

मोदी के दो दोस्त.
और तीसरा: कभी-कभी, कांग्रेस.

राहुल गांधी के नारे ने मदद की

परिमल नथवानी फिर संसद जा रहे हैं. मुकेश अंबानी का प्रतिनिधि दिल्ली में बना रहेगा और राहुल गांधी, जिन्होंने तीन महाद्वीपों में एक दशक तक कथित क्रोनी कैपिटलिज्म के खिलाफ भाषण दिए, अब हालिया संसदीय इतिहास में कॉरपोरेट हितों की सबसे प्रभावी सेवाओं में से एक की निगरानी करते नजर आते हैं.

अगली बार जब वह पूछेंगे कि मोदी के दोस्त कौन हैं, तो भीड़ हमेशा की तरह जवाब देगी.

लेकिन असली जवाब में शायद कोई और भी शामिल है.

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
 


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