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राहुल गांधी ने अमेठी छोड़ रायबरेली ही क्यों चुना,पूरा समीकरण समझिए

राहुल गांधी ने रायबरेली से पर्चा भरने के लिए आखिरी दिन तक सस्पेंस बनाए रखा. क्या ये दांव कांग्रेस के लिए मास्टर स्ट्रोक साबित होगा या 2019 का ही दौर दोहराया जाएगा

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 2 years ago

नए किरदार आते जा रहे हैं, मगर नाटक पुराना चल रहा है. अमेठी में कांग्रेस की तरफ से के एल शर्मा के आने और राहुल गांधी के रायबरेली जाने के बाद ये शेर अमेठी और रायबरेली की राजनीतिक सच्चाई के लिए सच साबित हो रहा है. इसकी शुरुआत उत्तर प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष अजय राय के एक बयान से हुई थी. अगस्त 3023 में उन्होंने दावा किया था कि राहुल गांधी अमेठी से चुनाव लड़ेंगे और प्रियंका गांधी की अगर इच्छा हुई तो वो वाराणसी से चुनाव लड़ेंगी. तभी ये बहस शुरू हुई कि राहुल गांधी एक बार अमेठी से चुनाव लड़ेगे. लेकिन इस बहस से अलग हटकर राहुल गांधी ने रायबरेली को चुना.  

दरअसल, 2024 के लोकसभा चुनाव का माहौल बनने के साथ ही ये दावा किया जा रहा था कि अब अमेठी का हाल वैसा है ही जैसा 1977 में रायबरेली में था. तब लोकसभा चुनाव में इंदिरा गाँधी की हार के बाद तमाम घरों में चूल्हे नहीं जले थे। यानी अमेठी राहुल गांधी की हार का पश्चाताप कर रहा है और इसका प्रायश्चित वो जीत के तोहफे से करना चाहता है. लेकिन जिन लोगों ने ये गुब्बारा भरा उसमें कील खुद राहुल गांधी ने लगाई. आखिर क्यों. इसे समझने के लिए रायबरेली और अमेठी के सियासी सफर पर चलना होगा.

अमेठी से राहुल गांधी आश्वस्त नहीं?

अमेठी लोकसभा सीट 1967 में अस्तित्व में आई. तब से ही अमेठी और कांग्रेस को एक दूसरे का पर्याय माना जाता रहा. लेकिन 2019 में ये मिथ टूट गया. बीजेपी की कद्दावर नेता स्मृति ईरानी से राहुल गांधी हार गए. राहुल गांधी दो सीटों पर चुनाव लड़े थे और अमेठी हारकर वो केरल के वायनाड से सांसद बने. तब से ही ये नैरेटिव सेट हो गया कि राहुल गांधी अमेठी से भाग गए. लेकिन इसी वर्ष 20 फरवरी 2024 को राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा अमेठी पहुंची और जिस तरह से उनका स्वागत हुआ, तब से ही ये कयास लगाए जा रहे थे कि अमेठी राहुल गांधी को वापस बुलाना चाहता है. इन कयासों को कांग्रेस जिलाध्यक्ष प्रदीप सिंघल के दावों ने और हवा दी. ये दावा किया गया था कि राहुल गांधी ही अमेठी से चुनाव लड़ेंगे और और अंतिम दिन पर्चा दाखिल करेंगे. लेकिन इस आखिरी दिन राहुल गांधी अमेठी नहीं रायबरेली को चुना. इसका मतलब अमेठी में भारत जोड़ो यात्रा का जनसमर्थन भी राहुल गांधी को अमेठी से निश्चित विजय के लिए आश्वस्त नहीं कर पाया. ऐसे में सवाल ये कि रायबरेली से राहुल गांधी आश्वस्त कैसे?

य़ूपी में कांग्रेस की सबसे सुरक्षित सीट रायबरेली

2019 में कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश से सिर्फ एक सीट जीती थी. रायबरेली. रायबरेली से सोनिया गांधी सांसद बनीं. रायबरेली से ही सोनिया गांधी के ससुर फिरोज गांधी, उनकी सास इंदिरा गांधी सांसद रहे. इसलिए रायबरेली के लोगों का कांग्रेस से भावनात्मक लगाव है. इस लगाव को सोनिया गांधी ने और मजबूत किया. आपको याद होगा. इसी साल फरवरी महीने में सोनिया गांधी ने तय किया था कि 
स्वास्थ्यगत कारणों से वो अब लोकसभा चुनाव नहीं लड़ेंगी.तब उन्होंने रायबरेली की जनता के नाम एक पत्र लिखा था, जिसमें सोनिया गांधी ने कहा कि रायबरेली के बिना उनका परिवार अधूरा है वो रायबरेली आकर और यहां के लोगों से मिलकर पूरा होता है। यह नेह-नाता बहुत पुराना है. राहुल गांधी इस भावनात्मक लगाव का फायदा हो सकता है इसलिए शायद एक सुरक्षित सीट के लिए अमेठी पर रायबरेली को प्राथमिकता दी

वायनाड से आस अमेठी से उदास?

राहुल गांधी 2019 की तरह ही इस बार भी दो सीट पर चुनाव लड़ रहे हैं. केरल के वायनाड और उत्तर प्रदेश के रायबरेली. वायनाड में 26 अप्रैल को चुनाव हो चुके हैं. राहुल गांधी वहां अपनी जीत को लेकर आश्वस्त हैं. 2009 से कांग्रेस यहां लगातर जीत रही है. इसी सीट से 2019 में राहुल गांधी सांसद बने. मोदी सरनेम मामले में इसी सीट पर उनकी सदस्यता गई और बहाल हुई. इस पूरे दौर में राहुल गांधी को वायनाड से भारी समर्थन मिला.इसीलिए राहुल नहीं चाहते थे कि ऐसा संदेश जाए कि उन्होंने उन वोटर्स को छोड़ दिया, जिन्होंने उनकी राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई में उनका साथ दिया. इस बीच अमेठी के साथ राहुल गांधी का वो जुड़ाव नहीं दिखा जो वायनाड को मिला. दूसरी तरफ स्मृति ईरानी ने अमेठी में अपना घर बना लिया. गृहप्रवेश किया. इस तरह अमेठी में घर बनवाने वाली वह पहली सांसद बन गई.गांधी परिवार की परंपरागत सीट होने के बावजूद इस परिवार के किसी सदस्य का यहां पर घर नहीं है. अमेठी लोकसभा क्षेत्र से संजय गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी,राहुल गांधी सांसद बने लेकिन किसी का घर अमेठी में नहीं है. 2019 में हार के बाद राहुल गांधी 5 बार गए जरूर, लेकिन स्मृति ईरानी ने यहां स्थाई ठिकाना बना लिया.

रायबरेली से भाजपा के पास बड़ा चेहरा नहीं 
अमेठी में भाजपा की तरफ से स्मृति ईरानी एक लोकप्रिया और मजबूत चेहरा हैं. जबकि रायबरेली से बीजेपी के प्रत्याशी दिनेश सिंह बिल्कुल इसके उलट. 2018 में बीजेपी में शामिल होने से पहले जब तक वो कांग्रेस में थे चुनाव जीतते रहे. 2019 में वो रायबरेली से लोकसभा चुनाव हारे. 2022 के विधानसभा चुनाव में दिनेश प्रताप सिंह के भाई को रायबरेली की हरचंदपुर विधानसभा सीट से उम्मीदवार बनाया गया था वो भी चुनाव हारे. राजनीतिक विश्लेषक बताते हैं कि कांग्रेस में रहते हुए भी दिनेश प्रताप सिंह की पार्टी पर अच्छी पकड़ थी, लेकिन बीजेपी में वो प्रभाव नहीं है. इसी कमजोर प्रभाव का फायदा राहुल गांधी को रायबरेली में मिल सकता है


यानी रायबरेली में राहुल गांधी के लिए वही सारे समीकरण फिट हो रहे हैं जो वायनाड में पहले से हैं. राजनीतिक पंडितों का मानना है कि कि अब अमेठी में कांग्रेस के प्रत्याशी के एल शर्मा के लिए प्रियंका गांधी कमान संभालेंगी, इस तरह आस-पास की दो सीटों पर कांग्रेस के दो बड़े नेताओं के रहने से पूर्वांचल की दूसरी सीटों पर भी कांग्रेस को माइलेज मिल सकता है. बहरहाल ये सभी समीकरण सियायी कयासों और किस्से सेट हो रहे हैं. सच्चाई 4 जून के नतीजों से साबित होगी


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