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अजित पवार को यूं ही नहीं हो रहा है गलती का अहसास, सियासी हित हैं वजह

अजित पवार ने अपने चाचा को झटका देते हुए भाजपा की महायुति सरकार को समर्थन दिया था. लेकिन लोकसभा चुनाव के बाद सारे समीकरण बदल गये हैं

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 2 years ago

महाराष्ट्र में इसी साल विधानसभा चुनाव होना है. इससे पहले बड़ी सियासी उथल-पुथल देखने को मिल सकती है. संभव है कि चाचा की पार्टी तोड़ने वाले अजित पवार 'कमल' छोड़कर वापस चाचा के पास लौट जाएं. पिछले कुछ समय में वह लगातार ऐसे संकेत दे रहे हैं. मंगलवार को उन्होंने कहा कि लोकसभा चुनाव में बहन के खिलाफ पत्नी को चुनाव लड़ाना मेरी गलती थी और मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था. 

पत्नी को मिली थी हार
महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम अजित पवार ने कहा कि मैं अपनी सभी बहनों से प्यार करता हूं. मुझे सुप्रिया सुले के खिलाफ अपनी पत्नी को चुनाव नहीं लड़वाना चाहिए था. बता दें कि बारामती लोकसभा सीट से शरद पवार गुट की NCP उम्मीदवार सुप्रिया सुले ने चुनाव लड़ा था और जीत हासिल की थी. जबकि अजित पवार की पत्नी सुनेत्रा पवार को यहां शिकस्त का सामना करना पड़ा. 

जन सम्मान यात्रा
लोकसभा चुनाव में अजित पवार की एनसीपी को मात्र एक सीट पर जीत मिली. पवार के लिए सबसे बड़ा झटका ये रहा कि जिस बारामती विधानसभा क्षेत्र से वह पिछले 33 साल से विधायक हैं. वहां पार्टी का प्रदर्शन सबसे खराब रहा. अजित पवार इस समय राज्यव्यापी 'जन सम्मान यात्रा' पर निकले हैं. इस दौरान उन्होंने कहा कि राजनीति को घर के भीतर नहीं आने देना चाहिए. मैं अपनी सभी बहनों से प्यार करता हूं. मैंने अपनी बहन के खिलाफ सुनेत्रा को चुनावी मैदान में उतारकर गलती की. अब मुझे लगता है कि यह एक गलत फैसला था.

जनता में है नाराज़गी 
अजित पवार को अपनी गलती का अहसास ऐसे ही नहीं हुआ है. वह अच्छे से जानते हैं कि पार्टी तोड़ने और बारामती से शरद पवार को चुनौती देने से जनता में उनके प्रति नाराज़गी है. वैसे, तो बारामती शरद पवार का गढ़ रहा है, लेकिन इस बार सुप्रिया सुले की जीत में सहानुभूति वाली वोटों में भी अहम् भूमिका निभाई है. लोगों ने अजित पवार को झटका देने के लिए उनकी पत्नी के खिलाफ मतदान किया. 

भविष्य स्पष्ट नहीं
अजित के सामने सबसे बड़ी चुनौती ये है कि उनका भविष्य स्पष्ट नहीं है. भाजपा में यह मांग उठ रही है कि पार्टी को विधानसभा चुनाव में अजित पवार से नाता तोड़ लेना चाहिए. BJP के कुछ नेता लोकसभा चुनाव में पार्टी के कमजोर प्रदर्शन के लिए भी अजित को कुसूरवार ठहरा रहे हैं. ऑर्गनाइजर में प्रकाशित लेख में कहा गया था कि अजित के साथ गठबंधन से भाजपा की ब्रैंड वैल्यू कम हुई है. क्योंकि अजित के आने से पार्टी भ्रष्टाचार के मोर्चे पर मुखर नहीं हो पाई. कुछ रिपोर्ट्स में यह दावा भी किया गया है कि RSS अजित और भाजपा गठजोड़ से नाराज था. इसी वजह से संघ का एक बड़ा कैडर लोकसभा चुनाव में प्रचार के लिए नहीं निकला. 

बैलेंस बनाने की कोशिश
यदि भाजपा अजित से नाता तोड़ लेती है, तो अपने दम पर उनके लिए मजबूती से खड़े रहने लायक सीटें जीतना भी मुश्किल हो जाएगा. इसलिए अजित चाचा की तरफ झुकाव के संकेत देकर बैलेंस बनाने के कोशिश कर रहे हैं. यदि भाजपा के साथ बात बिगड़ती है, तो वो इसी गलती के अहसास की बदौलत चाचा के खेमे में वापस लौट सकते हैं. 


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