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तमिल रुपया: DMK का नया पृथकवाद समर्थक एजेंडा

तमिलनाडु के CM स्टालिन द्वारा भारतीय रुपये के प्रतीक को बदलना, उनकी पृथकवादी और 'Periyarist'' विचारधारा को दर्शाता है. मोदी सरकार को इसे अनदेखा नहीं करना चाहिए.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

पलक शाह
एक ऐसे युग में, जहां वैश्विक वित्तीय प्रणाली राजनीतिक संघर्षों और युद्धों पर हावी हो रही है, एक राष्ट्रीय मुद्रा राज्य की शक्ति और संप्रभुता का ठोस प्रतीक बन जाती है. यदि सरकारें अपनी राष्ट्रीय मुद्रा को हमलों या राजनीतिक खेलों में हेराफेरी से बचाने में असमर्थ रहती हैं, तो उन्हें उखाड़ फेंका जा सकता है या विफल किया जा सकता है. एम.के. स्टालिन की अगुवाई वाली तमिलनाडु सरकार ने गुरुवार को भारतीय रुपये के आधिकारिक प्रतीक (₹) को बदलकर राज्य के 2025-26 बजट में तमिल अक्षर ‘रु’ को अपना लिया, जो 'रुबई' (तमिल में रुपये) से लिया गया है. भारतीय रुपये के प्रतीक को बदलकर, स्टालिन की डीएमके सरकार ने भारत की राष्ट्रीय मुद्रा पर एक अप्रत्यक्ष हमला किया है. जबकि केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इसे "भाषाई और क्षेत्रीय संप्रभुतावाद का उदाहरण" बताया, इस कदम को वैसे ही देखा जाना चाहिए जैसा यह वास्तव में है: पृथकवादी विचारधारा का खुला प्रदर्शन.

"शासक के सिक्के" का विचार ऐतिहासिक रूप से इस बात का प्रतीक है कि शासकों ने अपनी संप्रभुता को दर्शाने के लिए अपनी खुद की मुद्राएं ढाली थीं. रुपये के राष्ट्रीय प्रतीक को तमिल भाषा आधारित प्रतीक से बदलकर, डीएमके ने प्रभावी रूप से "शासक के सिक्के" का अपना संस्करण बना लिया है. अगर इसे चुनौती नहीं दी जाती, तो यह कदम तमिलनाडु और अन्य राज्यों को अपनी डिजिटल रुपये का संस्करण जारी करने या "तमिल रुपये" के लिए अलग विनिमय दर स्थापित करने के लिए प्रेरित कर सकता है. क्या राज्य जैसे केरल और पंजाब इस कदम का पालन कर सकते हैं और रुपये के प्रतीक को बदल सकते हैं? क्या यह भारत की संप्रभुता पर हमला नहीं है?

डीएमके का 'द्रविड़ नाडू' के लिए खुला आह्वान
यह घटनाक्रम अकेली नहीं है. 3 जुलाई 2022 को, डीएमके के सांसद अंधिमुथु राजा ने मोदी सरकार को सीधा धमकी दी, और अपने पार्टी प्रमुख स्टालिन की उपस्थिति में एक अलग राज्य की मांग की. नमक्कल में स्थानीय निकाय कार्यकर्ताओं से बात करते हुए, राजा ने केंद्र से तमिलनाडु को स्वायत्तता देने की अपील की, और कहा: "हम अपनी लड़ाई तब तक नहीं रोकेंगे जब तक तमिलनाडु को राज्य स्वायत्तता नहीं मिल जाती. जब तक हम भारत का हिस्सा हैं, तमिलों को आर्थिक वृद्धि नहीं मिलेगी और न ही उन्हें नौकरियों का महत्वपूर्ण हिस्सा मिलेगा."

राजा के वैचारिक नेता पेरियार ने भारत की स्वतंत्रता के बाद तमिलनाडु के लिए अलग राज्य की वकालत की थी. "हालांकि, हमने लोकतंत्र और भारत की एकता के लिए उस मांग को नजरअंदाज कर दिया है," राजा ने घोषित किया. "मैं प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह से अपील करता हूं कि कृपया हमें इस मांग को फिर से न उठाने के लिए मजबूर न करें। कृपया हमें राज्य स्वायत्तता दें."

इन बयानों को केवल प्रचार के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए; वे डीएमके की असली मंशा को उजागर करते हैं. यह कोई संयोग नहीं है कि भारत को तोड़ने की कोशिश करने वाले ताकतों ने अक्सर डीएमके नेताओं से संपर्क किया है. इसका एक प्रमुख उदाहरण 2024 में डोनाल्ड लू, अमेरिकी विदेश मंत्रालय के दक्षिण और मध्य एशियाई मामलों के सहायक सचिव का चेन्नई तमिलनाडु दौरा है. हालांकि वह मोदी और बीजेपी के आलोचक रहे हैं, लू ने भारत के राष्ट्रीय चुनावों के चरम पर नई दिल्ली के बजाय चेन्नई का दौरा किया. अमेरिका ने एक विवादास्पद बयान जारी करते हुए कहा कि यह दौरा "दक्षिण भारत के साथ द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने के उद्देश्य से था." क्या इस कदम, राजा के बयानों और स्टालिन के प्रतीकवाद से एक गहरी योजना का संकेत मिलता है? क्या स्टालिन की मुद्रा प्रतीक को बदलने की पहल लू जैसे व्यक्तियों या अमेरिका के अन्य कारकों से प्रभावित हो सकती है?
पेरियार का मार्ग क्या है?

द्रविड़ नाडू, तमिल, मलयालम, तेलुगु और कन्नड़ भाषी लोगों के लिए एक अलग राज्य, का विचार 20वीं सदी की शुरुआत में ई.वी. रामासामी पेरियार ने प्रस्तुत किया था. इसमें कोई संदेह नहीं कि पेरियार की विचारधारा को ब्रिटिश राज से समर्थन मिला था, जिसने "फूट डालो और राज करो" नीति का उपयोग किया था, और उनका मंच तमिलों की पहचान और आत्मसम्मान को बढ़ावा देने के लिए एक अलग राज्य की मांग करता था. पेरियार का नारा, "तमिल नाडु फॉर तमिल्स," 1938 में ब्रिटिश शासन के दौरान गढ़ा गया था. हालांकि, जैसे-जैसे समय बीतता गया और द्रविड़ नाडू का विचार जनमानस में धुंधला पड़ा, पेरियार के अनुयायी एक बड़ी स्वायत्तता की मांग करने लगे. यह मांग आज भी वर्तमान डीएमके सरकार के तहत जारी है, जिसमें राजा जैसे नेता अलग तमिलनाडु की वकालत करते हैं, जबकि भारत का संविधान स्पष्ट रूप से कहता है कि कोई भी राज्य संघ से अलग होने का अधिकार नहीं रखता (धारा 3).

स्टालिन की हाल की प्रतीकात्मक पहल इस व्यापक वैचारिक दिशा का प्रतिबिंब है और यदि इसे चुनौती नहीं दी जाती, तो यह भारत की राष्ट्रीय एकता और अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा को कमजोर कर सकती है.

भारतीय रुपये का बढ़ता प्रभाव
भारतीय रुपया वैश्विक स्तर पर एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी बनता जा रहा है. अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष (IMF) ने रुपये को चीन की रेनमिन्बी (RMB) के साथ एक संभावित अंतरराष्ट्रीय मुद्रा के रूप में पहचाना है. भारत की सॉफ्ट पावर में लगातार वृद्धि हो रही है, और अब कई देशों में लेन-देन के लिए रुपये को स्वीकार किया जा रहा है. भारतीय रिजर्व बैंक ने तो 22 देशों में बैंकों को विशेष वॉस्ट्रो रुपये खाता (SVRA) खोलने की अनुमति दी है, ताकि भारतीय रुपये में भुगतान निपटाए जा सकें. इसके अलावा, भारत ने कई व्यापार समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं, जिनमें रुपया विनिमय मुद्रा के रूप में काम करता है.

इस संदर्भ में, स्टालिन जैसे हमले, जो रुपये के राष्ट्रीय प्रतीक पर किए गए हैं, भारत के बढ़ते वैश्विक प्रभाव पर व्यापक प्रभाव डाल सकते हैं. वित्तीय दुनिया में, मुद्रा प्रतीक केवल पैसों के प्रतिनिधित्व से अधिक होते हैं—ये शक्तिशाली राष्ट्रीय प्रतीक होते हैं. जब इन प्रतीकों पर हमला किया जाता है, तो यह एक देश की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा को भी कमजोर कर सकता है.

जब राष्ट्र बड़े राजनीतिक संघों से अलग होते हैं, तो नई मुद्राओं का निर्माण संप्रभुता का एक महत्वपूर्ण प्रतीक बन जाता है. यह अमेरिका, यूरोपीय संघ और सोवियत संघ के बाद के देशों के निर्माण में देखा गया था. अपनी किताब Shades of Sovereignty: Money and the Making of the State में लेखक पॉल विल्सन यह बताते हैं कि राष्ट्र अपनी मुद्रा का चयन कैसे करते हैं, जो आर्थिक आवश्यकताओं, सुरक्षा चिंताओं, अंतरराष्ट्रीय मान्यता और राष्ट्रीयता का संतुलन होता है। दांव बहुत ऊंचे होते हैं: किसी देश की मुद्रा को कमजोर करना, वस्तुतः उसकी संप्रभुता को चुनौती देना होता है.

किसी राष्ट्र को तोड़ने के लिए, पहले उसके प्रतीकों को निशाना बनाना पड़ता है—और रुपया भारत के संप्रभुता के सबसे महत्वपूर्ण प्रतीकों में से एक है. क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार एम.के. स्टालिन और डीएमके को इस पृथकवादी एजेंडा को बढ़ाने से रोक सकते हैं? अगर इस कदम को अनदेखा किया गया, तो यह भारत में और अधिक अस्थिरता और विघटन का मार्ग प्रशस्त कर सकता है.


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