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समृति शेष-फिर देवदूत एक “विद्वान संत” को अपने साथ ले गए

मीडिया स्ट्रेटर्जिस्ट और कॉलमिस्ट गोपीनाथ मेनन ने पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की स्मृति में उनसे जुड़े कुछ किस्से साझा करते हुए उनके सरल और सच्चे व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

मैं कभी कभार ही शोक-संवेदनाएं लिखता हूं. मुझे याद है कि मैंने एक बार टाइगर पटौदी के लिए शोक संदेश लेख लिखा था, मुझे लगता है 2011 में और फिर कुछ साल बाद डॉ. वर्गीज कुरियन के लिए भी लिखा था. मैंने कभी भी किसी नेता या मंत्री के लिए शोक लेख लिखने का ख्याल नहीं आया, क्योंकि वे कभी भी वास्तविक या गरिमापूर्ण नहीं लगते थे, लेकिन डॉ. मनमोहन सिंह को लेकर मेरी ऐसी सोच नहीं है, वह सज्जन व्यक्ति एक अलग नस्ल के थे.फिर, मुझे यह लिखने की प्रेरणा एक दिलचस्प और स्पष्ट नजरिए से मिली जो राजनीति के बारे में था. यह स्पष्ट रूप से बताता है कि वे कभी भी एक पत्थर से दो पक्षियों को मारने का मौका नहीं छोड़ते, यानी खुद को एक पवित्र गाय के रूप में दिखाना और अपनी विपक्षी पार्टी को और कोने में धकेलना, डॉ. मनमोहन सिंह का निधन इस पहलू को साफ तौर पर उजागर करता है.

एक सच्चे सिख थे मनमोहन सिंह

डॉ. मनमोहन सिंह कई मायनों में अलग थे. सबसे पहले, वे सच्चे सिख थे, लेकिन फिर भी वे एक सामान्य सिख की तरह नहीं थे. वे एक सिख की तरह नहीं दिखते थे, कभी आक्रामक तरीके से बात नहीं करते थे, न ही शोर मचाते थे, बल्कि बहुत ही विनम्र और शांतिपूर्ण थे, कभी भी भड़कीले कपड़े नहीं पहनते थे और हमेशा अपनी उपलब्धियों को कम करते थे. लो-प्रोफाइल, लेकिन स्पष्टता से भरी सोच ने उन्हें पार्टी के भीतर ही नहीं, बल्कि विपक्ष में भी बहुत से लोगों के लिए जलन का कारण बना दिया. उनकी एक अद्वितीय विशेषता थी कि वे कभी भी आरोपों पर प्रतिक्रिया नहीं देते थे. मुझे लगता है कि यह उनके उच्च दर्जे और अखंडता का प्रदर्शन था. ये गुण आजकल बहुत दुर्लभ हैं.

विपक्षी दलों ने दिखाया नीचा

अब सोचिए, जब वे कार्यालय से बाहर हो गए, तो उनका जीवन एक दशक तक रिवाइंड करिए. 200 से ज्यादा टीवी न्यूज चैनल्स द्वारा उन पर किए गए विभिन्न आरोपों की फुटेज फिर से देखिए, विपक्षी दलों के प्रसिद्ध और बहेतर वक्ताओं ने उन्हें नीचा दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. "मौन मोहन सिंह" की प्रसिद्ध ब्रैंडिंग जनता के दिमाग में स्पष्ट रूप से अंकित है. अब वही नेता दिनभर नए-नए शब्दों में उनकी तारीफ कर रहे हैं. यह क्या बताता है? क्या यह बताता है कि पहले वे सही थे और अब वे गलत हैं? क्या यह वर्तमान राजनीति के मानसिकता या उनके वंश पर आधारित है? या फिर यह हमारे समाज के पतन की ओर इशारा करता है? कैसे काले और सफेद दोनों सही हो सकते हैं? कहते हैं, “आप आधे गर्भवती नहीं हो सकते, लेकिन ऐसा लगता है कि यह दुख की बात है कि आजकल यह सच है. इन दिनों, राजनीतिक मंत्रा 30 सेकंड का प्राइम टाइम है.”

डीयू के प्रोफेसर से लेकर प्रधानमंत्री बनने तक का सफर

उन्होंने कभी भी प्रतिक्रिया नहीं दी, यहां तक कि जब उनके अपने मीडिया सलाहकार ने अपने पद छोड़ने के बाद “द एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर” किताब लिखी. उन्होंने अपनी गरिमा बनाए रखी और चुप रहे, भले ही यह बाद में फ्लॉप फिल्म में बदल गया. डॉ. सिंह के दिल्ली विश्वविद्यालय के डी स्कूल में, फिर लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में, उनकी कैम्ब्रिज से डॉ. डिग्री और ऑक्सफोर्ड द्वारा सम्मानित की गई मानद डिग्री के बारे में बहुत कुछ कहा गया है. क्या कोई सार्वजनिक जीवन की ऐसी कोई संस्था है जिसने इतनी भूमिकाएं निभाई हों? दिल्ली विश्वविद्यालय के फैकल्टी सदस्य, फिर वित्त मंत्री, योजना आयोग के उपाध्यक्ष, राज्य सभा सदस्य, और दो लगातार कार्यकाल के प्रधानमंत्री!

मनमोहन सिंह की सरलता

उनकी सरलता का एक उदाहरण: मेरी पत्नी कनक नायर को एक बार वित्त मंत्री के रूप में और दो बार प्रधानमंत्री के रूप में उनसे इंटरव्यू करने का मौका मिला. उन्होंने पीएम निवास पर नाश्ते की बैठक का उल्लेख किया. ताजे संतरे और बिना मक्खन के सुखे टोस्ट के साथ अच्छा पुराना दलिया पेश किया गया. जापानी क्रू काफी चौंक गए थे, लेकिन बहुत प्रभावित हुए, क्योंकि नाश्ता 10 मिनट में खत्म हुआ और इंटरव्यू करीब एक घंटे चला, वे राज्य प्रमुखों को देखा करते थे जो चौथे स्तंभ को खुश करने के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते थे. यह सरलता थी जो उन्होंने बिना किसी शोशा के अपनाई.

जब लोकतंत्र के चौथे स्तंभ और नेताओं ने की थी मनमोहन सिंह की कड़ी आलोचना

आखिरकार, हम उनके व्यक्तित्व का एक झलक तब देखते हैं जब प्रसिद्ध अध्यादेश फाड़ने की घटना हुई, जहां पूरे चौथे स्तंभ और नेताओं ने उन पर कड़ी आलोचना की. मैं अभी भी याद करता हूँ कि प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने जो शब्द कहे थे: “इतिहास मुझे आप सभी से बेहतर तरीके से आंकेंगा.” वह कितने सही थे! मैं कल्पना करता हूँ कि जब पूरा चौथा स्तंभ और नेताओं का झुंड उनके बारे में बधाई गाने लगे, तो क्या कोई टीवी चैनल पहले की फुटेज दिखाने की हिम्मत करेगा! मुझे इसमें शक है. लेकिन डॉ. सिंह ऊपर देवदूत के साथ जरूर हैरान, खुश और हंसी में झूमते हुए कह रहे होंगे, “देखा, मैंने क्या कहा था.” उन्होंने आखिरकार आखिरी हंसी हंस ली है और इसलिए हमें उनके जीवन का उत्सव मनाना चाहिए और शोक नहीं करना चाहिए. यह राजनीतिक इच्छाशक्तियों के लिए एक बड़ा सबक भी है कि वे अपने शब्दों का चुनाव ध्यान से करें.

लेखक-गोपीनाथ मेनन, मीडिया स्ट्रेटर्जिस्ट और कॉलमिस्ट


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