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हाथ में एक सीट और सत्ता का ख्वाब, आखिर राज ठाकरे ने क्यों दिया एकला-चलो का नारा?

महाराष्ट्र में इसी साल होने वाले विधानसभा चुनाव की तैयारियां तेज हो गई हैं. सियासी दल सीटों के गुणाभाग में जुटे हुए हैं.

नीरज नैयर 2 years ago

महाराष्ट्र को इसी साल विधानसभा चुनाव से गुजरना है. राज्य में इस समय भाजपा की अगुवाई वाली महायुति की सरकार है. भाजपा , एकनाथ शिंदे गुट की शिवसेना और अजित पवार गुट की एनसीपी सरकार का हिस्सा है. इस गठबंधन को लोकसभा चुनाव में बड़ा नुकसान उठाना पड़ा था. इसलिए विधानसभा चुनाव को लेकर भाजपा फूंक-फूंककर कदम आगे बढ़ा रही है. इस बीच, महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) प्रमुख राज ठाकरे ने अपने दम पर चुनाव लड़ने का ऐलान करके सबको चौंका दिया है. उन्होंने साफ किया है कि मनसे राज्य की 288 विधानसभा सीटों में से 225 से 250 पर लड़ने के लिए तैयारी कर रही है. राज ठाकरे ने संभावित उम्मीदवारों की पहचान करने के लिए 5 नेताओं की एक टीम भी बनाई है.

ऐसा रहा है प्रदर्शन 
महाराष्ट्र की राजनीति में राज ठाकरे कोई बड़ा करिश्मा नहीं कर पाए हैं. पिछले विधानसभा चुनाव में उन्हें केवल एक सीट मिली थी. लिहाजा, राज के 'एकला चलो' की घोषणा किसी को समझ नहीं आ रही है. विपक्ष भी ठाकरे के मजे ले रहा है. उद्धव ठाकरे गुट की शिवसेना के प्रवक्ता आनंद दुबे का कहना है कि मनसे एकमात्र विधायक के दम पर सत्ता में आने की इच्छुक है. लगता है कि पार्टी भ्रमित है और उसे स्पष्ट करना चाहिए कि वो असल में चाहती क्या है. बालासाहेब ठाकरे के निधन के बाद उद्धव और राज ठाकरे की राह अलग हो गई थी. राज ने 2006 में महाराष्ट्र नव निर्माण सेना (मनसे) नाम से अपनी पार्टी बनाई. 2009 में मनसे ने अपना पहला विधानसभा चुनाव लड़ा और 13 सीटों पर जीत हासिल की. लेकिन इसके बाद राज का 'सूर्य' अस्त हो गया. 2014 और 2019 में हुए चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा. 2019 में तो उसे केवल एक ही सीट नसीब हुई.

क्या स्थायी है ब्रेक?
राज ठाकरे ने लोकसभा चुनाव में बिना शर्त के PM मोदी को समर्थन दिया था. हालांकि, ये बात अलग है कि उनके पास समर्थन देने जैसा कुछ था. इस कदम को उनकी भाजपा से नजदीकी के तौर पर देखा गया. यह माना जा रहा था कि राज महायुति में शामिल होकर विधानसभा का चुनाव लड़ेंगे. क्योंकि इससे उनके ज्यादा सीटों पर प्रभाव छोड़ने की संभावना बनी रहेगी. महायुति में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लोकप्रियता की बदौलत महाराष्ट्र में भाजपा मजबूत हुई है. ऐसे में इस 'साथ' का कुछ न कुछ फायदा राज ठाकरे की मनसे को भी मिल सकता है. लेकिन ठाकरे ने इस संभावना पर खुद ही ब्रेक लगा दिया है. तो क्या इस 'ब्रेक' को स्थायी माना जाए? मौजूदा वक्त में सबसे बड़ा सवाल यही है.

रणनीति नंबर 1
मनसे प्रमुख के इस कदम के पीछे दो रणनीतियां हो सकती हैं. पहली, महायुति पर दबाव बनाना. राज ठाकरे को इल्म है कि भाजपा के नेतृत्व वाले इस गठबंधन का हिस्सा बनने से उन्हें कुछ लाभ मिल सकता है. ऐसे में अगर वो ज्यादा से ज्यादा सीटों पर लड़ते हैं, तो लाभ का प्रतिशत बढ़ने की संभावना भी बढ़ जाएगी. इसलिए वह 'एकला चलो' का नारा लगाकर  खुद को मोल-भाव की स्थिति में ला रहे हैं. और इसका शुरुआती असर दिखाई भी देने लगा है. मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की शिवसेना के विधायक एवं प्रवक्ता संजय शिरसाट का कहना है कि मनसे को विधानसभा चुनाव महायुति के साथ मिलकर लड़ना चाहिए. अभी सीट बंटवारे पर अंतिम सहमति नहीं बनी है, जब बनेगी तो मनसे को भी प्रस्ताव दिया जाएगा.

रणनीति नंबर 2
ठाकरे की दूसरी रणनीति, लोकसभा चुनाव के परिणामों से प्रेरित हो सकती है. इस चुनाव में महाराष्ट्र के सियासी समीकरणों को बिगाड़ कर भाजपा का साथ देने वाली पार्टियों को बड़ा नुकसान उठाना पड़ा है. एकनाथ शिंदे ने उद्धव ठाकरे की शिवसेना में तोड़फोड़ की थी और अजित पवार अपने चाचा शरद पवार की पार्टी तोड़कर आए थे. चुनाव में अजित की NCP महज एक सीट जीत पाई. वहीं, एकनाथ शिंदे की पार्टी को 7 सीटों पर संतोष करना पड़ा. जबकि उद्धव ठाकरे की शिवसेना (UBT) को 9 सीटों पर जीत मिली और शरद पवार की एनसीपी ने भी अच्छा प्रदर्शन किया. वहीं, भाजपा को भी राज्य में बड़ा नुकसान हुआ है. यदि यही स्थिति विधानसभा चुनाव में भी रही तो महायुति से जुड़े सभी दलों को नुकसान उठाना पड़ सकता है और जाहिर है राज ठाकरे भी इससे अछूते नहीं रहेंगे. लिहाजा, संभव है कि इसी को ध्यान में रखते हुए उन्होंने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला लिया हो. वैसे भी उनके पास चुनाव बाद भी हाथ मिलाने का विकल्प रहेगा.

ऐसा है समीकरण
महायुति में सीटों का बंटवारा अभी नहीं हुआ है, लेकिन भाजपा राज्य की 288 सीटों में से 160-170 पर चुनाव लड़ सकती है. अजित पवार की NCP ने 80 से 90 सीटों पर लड़ने का दावा किया है. वहीं, शिंदे की शिवसेना लगभग 100 सीटों पर किस्मत आजमाना चाहती है.  पिछले चुनाव में भाजपा को सबसे ज्यादा 105 सीटें मिली थीं. शिवसेना ने 56, एनसीपी ने  54 और कांग्रेस ने 44 सीटों पर जीत हासिल की थी. चुनाव के बाद शिवसेना ने भाजपा के नेतृत्व वाले NDA से रिश्ता तोड़कर एनसीपी-कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बना ली और उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री बने. लेकिन जून 2022 में एकनाथ शिंदे ने शिवसेना के 40 विधायकों को तोड़कर अलग पार्टी बनाई और BJP  के समर्थन से मुख्यमंत्री बन गए. इसी तरह अजित पवार भी एनसीपी तोड़कर सरकार का हिस्सा बन गए. 
 


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