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क्या बाहरी व्यापारियों का 'कब्जा' और अधिग्रहण बना अयोध्यावासियों की नाराजगी की वजह?

अयोध्या में भाजपा की हार चर्चा का विषय बनी हुई है. इसके लिए सोशल मीडिया पर अयोध्या के लोगों को कोसा भी जा रहा है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 2 years ago

लोकसभा चुनाव में भाजपा को उत्तर प्रदेश में सबसे बड़ा झटका लगा है. खासकर अयोध्या (Ayodhya) में भाजपा की हार हर किसी के लिए चौंकाने वाली है. सोशल मीडिया पर अयोध्यावासियों को जमकर कोसा जा रहा है. रामानंद सागर की 'रामायण' में लक्ष्मण का किरदार निभाने वाले एक्टर सुनील लहरी ने भी अयोध्या के लोगों पर शब्दों के बाण चलाए हैं. उन्होंने लिखा है - हम भूल रहे हैं कि ये वही अयोध्यावासी हैं जिन्होंने वनवास से लौटने के बाद देवी सीता पर संदेह किया था. अयोध्या के लोगों ने हमेशा अपने राजा के साथ विश्वासघात किया है. उन्हें शर्म आनी चाहिए.

विकास तो खूब हुआ
भाजपा की राज्य और केंद्र सरकार ने अयोध्या के लिए काफी कुछ किया. यहां भव्य राम मंदिर बनाया गया. अयोध्या को अंतर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट और वर्ल्ड क्लास रेलवे स्टेशन मिला. राम पथ बना और राम की पैड़ी की सुंदरता बढ़ाई गई. राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के बाद यहां बड़ी संख्या में देश-विदेश से श्रद्धालु पहुंचे और यह सिलसिला अब भी जारी है. अयोध्या की अपनी एक पूरी इकॉनमी खड़ी हो गई है. इसके बावजूद अगर भाजपा को यहां से हार का सामना करना पड़ा है, तो सवाल उठाना लाजमी है. 

हार ये 2 प्रमुख कारण
अयोध्या में हुए विकास को कोई नकार नहीं सकता. अयोध्यावासी भी स्वीकार करते हैं कि पहले और अब की अयोध्या में काफी बदलाव आया है. लेकिन बाहर से शानदार नजर आने वाले इस बदलाव में दर्द और पीड़ा भी छिपी है. अयोध्या में भाजपा की हार के दो प्रमुख कारण हैं - बाहरी व्यापारियों का कब्जा और जमीन अधिग्रहण में हुई मनमानी. मंदिर निर्माण के लिए बड़े पैमाने पर स्थानीय लोगों को जमीन अधिग्रहित की गई. शुरूआत में संत समाज ने इसका विरोध भी किया. आम जनता और प्रशासन आमने-सामने भी आए लेकिन हुआ वही जो प्रशासन को मंजूर था. राम पथ के निर्माण के लिए हजारों दुकान और मकान तोड़े गए. इतना ही नहीं, पीड़ितों को उचित मुआवजा भी नहीं दिया गया.    

नेता नहीं भांप सके गुस्सा 
अपनी आंखों के सामने अपने घर-दुकान टूटते देखने वालों के साथ किसी किस्म की सहानभूति भी नहीं दिखाई गई. जनप्रतिनिधियों और अधिकारी दोनों ने उनसे किनारा कर लिया. यहीं से अयोध्यावासियों में भाजपा के खिलाफ गुस्सा पनपना शुरू हुआ. प्रदेश और केंद्रीय स्तर पर कोई नेता इस गुस्से को भांप नहीं किया, क्योंकि सभी राम मंदिर की भव्यता में खोये थे और आश्वस्त थे कि 'राम' उनका बेड़ा पार लगा देंगे. भाजपा के प्रति गुस्से में उबाल उस वक्त आया जब बाहरी कारोबारी अयोध्या पर कब्जा करने लगे. दरअसल, राम मंदिर बनने के बाद अयोध्या में आर्थिक लाभ की संभावनाएं तलाशने के लिए बड़ी संख्या में व्यापारी बाहर से आकर यहां बस गए. इससे स्थानीय व्यापारियों को मिलने वाले संभावित लाभ में कटौती हो गई. 

सामान्य जीवन प्रभावित
राम मंदिर के अस्तित्व में आने बाद अयोध्या के लोगों की परेशानियों में और भी इजाफा हो गया. जगह-जगह पर बैरिकेडिंग, पुलिस बंदोबस्त, रूट डायवर्जन और वीआईपी कल्चर ने उनके सामान्य जीवन को बुरी तरह प्रभावित करके रख दिया. भाजपा की स्थानीय इकाई बदलते हालातों से पूरी तरह बेखबर रही. अयोध्यावासियों की फरियादों को अनसुना किया गया. बीजेपी प्रत्याशी और 2019 में जीत करने वाले लल्लू सिंह से उन्हें कोई मदद नहीं मिली. वहीं, समाजवादी पार्टी लोगों के गुस्से को अपने पक्ष में करने में कामयाब रही. सपा ने जातीय समीकरण साधते हुए अनुसूचित जाति के पासी समुदाय से आने वाले अवधेश प्रसाद को टिकट दिया. अवधेश ने बीजेपी के लल्लू सिंह को 55 हजार वोट से हराकर सपा के इस दांव को सही साबित किया. 


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