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बिहार का सुनामी मतदान : सट्टा बाजार में NDA को 150 से अधिक सीटों की भविष्यवाणी, महागठबंधन का सफाया तय!

महाराष्ट्र चुनाव की गूंज, सट्टेबाजों ने लगाया दांव, NDA दोहराने जा रहा है ऐतिहासिक जीत, महागठबंधन को भारी झटका लगने जा रहा है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 7 months ago

पलक शाह

बिहार में पहले चरण के धधकते मतदान ने 121 सीटों पर रिकॉर्ड तोड़ 64.66 प्रतिशत वोटिंग के साथ चुनावी समीकरणों को नया रूप दे दिया है. यह रुझान महाराष्ट्र 2024 के एनडीए तूफान की याद दिला रहा है और सट्टा बाजार में हलचल मचा दी है. अब जब अधिकांश दांव महागठबंधन के खिलाफ जा चुके हैं, तो सट्टा बाज़ार के जानकार विपक्ष की सरकार बनने की संभावनाओं को लगभग शून्य पर ला चुके हैं. अनुमान है कि 243 सदस्यीय विधानसभा में एनडीए 145-150 से अधिक सीटें जीत सकता है,जो उसके 2010 के सर्वाधिक प्रदर्शन को भी पार कर सकता है और तेजस्वी यादव के गठबंधन को शर्मनाक हार की ओर धकेल सकता है.

इस बार की भागीदारी बिहार के चुनावी इतिहास में सबसे अधिक रही है 2020 के महामारीकालीन 57.29 प्रतिशत की तुलना में पूरे 7.37 प्रतिशत अंक अधिक. इससे एनडीए खेमे में जोश भर गया है. बेगूसराय (67.32%) और मुज़फ्फरपुर (मीनापुर जैसे क्षेत्रों में 73% से अधिक) जैसे जिलों में महिलाओं की लंबी कतारें दिखीं, जिसे बीजेपी नेताओं ने अपनी कल्याण योजनाओं के समर्थन के रूप में देखा है.

“यह महाराष्ट्र जैसा क्षण होने जा रहा है,” मुंबई में बैठे एक सट्टेबाज़ ने कहा, जो बीजेपी-नेतृत्व वाले गठबंधन की 2024 महाराष्ट्र की निर्णायक जीत की याद दिला रहा था, जिसने एंटी-इनकंबेंसी को दरकिनार कर विपक्ष को चकनाचूर कर दिया था. एनडीए खेमे के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, पहले चरण की 121 सीटों में से लगभग 100 सीटों पर बढ़त के संकेत हैं, और यह लहर 11 नवंबर को होने वाले दूसरे चरण तक जारी रह सकती है.

मुंबई और दिल्ली के सट्टा बाजारों की गुप्त गलियों में, जो हमेशा कानूनी धुंध में काम करते हैं, रातोंरात समीकरण बदल गए हैं. पहले महागठबंधन सीमांचल और मिथिलांचल जैसे जातीय रूप से विभाजित इलाकों में मामूली बढ़त पर था, लेकिन गुरुवार की जबरदस्त वोटिंग ने विपक्षी दांव को तहस-नहस कर दिया. एक अनुभवी सट्टेबाज ने गुमनाम रूप से बताया, “एनडीए की जीत की संभावनाएं अब 75-80 प्रतिशत तक पहुंच चुकी हैं, जबकि महागठबंधन की सीटों का अनुमान 80 से नीचे गिर गया है.”

“हम एक साफ-साफ सफाए की बात कर रहे हैं, उनका अनुमानित आंकड़ा तेजी से गिर रहा है, खासकर अगर बाकी 122 सीटों पर ईबीसी और दलित मतदाताओं की भागीदारी बनी रही तो.” सट्टा बाज़ार के कारोबारी अब एनडीए पर बड़े पैमाने पर दांव लगा रहे हैं, जिसका श्रेय प्रधानमंत्री मोदी के जोशीले अभियान और नीतीश कुमार की जातीय समीकरणों पर मजबूत पकड़ को दिया जा रहा है.

महाराष्ट्र जैसी स्थिति रणनीतिकारों से छिपी नहीं है

वहां भी नवंबर 2024 में महिला और शहरी मतदाताओं की अभूतपूर्व भागीदारी ने बीजेपी-महायुति गठबंधन को जोरदार वापसी दिलाई थी, जिससे एक्ज़िट पोल ध्वस्त हो गए और महा विकास अघाड़ी की उम्मीदें खत्म हो गईं.

बिहार में वही गूंज सुनाई दे रही है

गंगा के दक्षिण के हाई-स्टेक इलाकों में, जहां 2020 में महागठबंधन को 61-59 की मामूली बढ़त मिली थी, अब एनडीए का जोश चरम पर है. “मोदी की कल्याण योजनाओं की बाढ़ और नीतीश की स्थानीय रसायनशास्त्र मिलकर एक बार फिर वही कहानी लिख रहे हैं एंटी-इनकंबेंसी की कोई गुंजाइश नहीं,” एक वरिष्ठ बीजेपी रणनीतिकार ने कहा. इस बीच विपक्ष संभलने की कोशिश में है, तेजस्वी यादव की “पक्की जीत” की घोषणा अब खोखली लग रही है, जबकि आरजेडी की “धांधली” की शिकायतें चुनाव आयोग ने “निराधार” बताकर खारिज कर दी हैं.

गति और गणित

सट्टा बाजार का मूड सिर्फ रुझान नहीं बल्कि आकार का संकेत दे रहा है. बिहार के 3.75 करोड़ मतदाता एक और रिकॉर्ड तोड़ भागीदारी के लिए तैयार हैं. सट्टा मॉडलों के अनुसार, एनडीए 150-160 सीटों के सुपरमेज़रिटी के करीब पहुंच सकता है, विपक्ष के यादव-मुस्लिम गढ़ों में सेंध लगाते हुए और जन सुराज की सीमित उपस्थिति को पीछे छोड़ते हुए. प्रशांत किशोर की नई पार्टी, जो 239 सीटों पर चुनाव लड़ रही है, कुछ असर डाल सकती है, पर सत्ता समीकरण बदलने की ताकत नहीं रखती. एक सट्टेबाज़ ने कहा, “अगर दूसरा चरण भी ऐसा ही रहा, खासकर ईबीसी बहुल और महिला मतदाता वाले क्षेत्रों में तो हम बिहार की राजनीति के नए समीकरण का साक्षी बनने जा रहे हैं.”

महागठबंधन समर्थक, जो कांग्रेस के 80 सीटों के दावे से उत्साहित हैं, कहते हैं कि उच्च मतदान “परिवर्तन” का संकेत है, लेकिन सट्टा बाजार की फुसफुसाहट कुछ और ही कहानी बयां कर रही है.

14 नवंबर की मतगणना से पहले निगाहें अब सीमांचल की सीमाओं, महिलाओं की 4-5 प्रतिशत अतिरिक्त भागीदारी और प्रवासी मतदाताओं वाले क्षेत्रों में एनडीए की बढ़त पर टिक गई हैं. बीजेपी-जेडीयू गठबंधन के लिए यह सिर्फ सत्ता बरकरार रखने की बात नहीं, बल्कि पुनर्निर्माण का क्षण है, महाराष्ट्र की तरह एक और सुनामी जो मोदी की पूर्वी दुर्ग को और मजबूत कर सकती है. वहीं महागठबंधन के लिए यह करो या मरो की लड़ाई है, दूसरा चरण कमजोर रहा तो लहर नहीं, बल्कि पूरा सफाया होगा. बिहार की गर्म चुनावी गणना में सट्टेबाज़ों की स्याही अब सूख रही है और वह पूरी तरह एनडीए के सुनहरे रंग में रंगी हुई है.

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और *The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के निडर लेखक हैं. मुंबई में लगभग दो दशकों की ग्राउंड रिपोर्टिंग के अनुभव के साथ, पालक ने खुद को एक अडिग सच की खोज करने वाले पत्रकार के रूप में स्थापित किया है, जो पैसे, सत्ता और नियमन के गठजोड़ की तहों में गहराई तक जाते हैं. उनके लेख भारत के सबसे प्रतिष्ठित वित्तीय अखबारों जैसे The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line में प्रकाशित हुए हैं जहां उनकी तीखी रिपोर्टिंग ने नरेटिव गढ़े और कॉर्पोरेट बोर्डरूम्स को हिला कर रख दिया.

19 साल की उम्र में ही अपराध पत्रकारिता की ओर खिंचाव महसूस करने वाले पालक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के मुंबई के गिरोह युद्ध अब एक और अधिक चिकने, लेकिन कहीं अधिक खतरनाक संगठित अपराध यानी कॉर्पोरेट टावरों में रची जाने वाली सफेदपोश साजिशों में बदल चुके हैं. यह अहसास ही उन्हें फाइनेंशियल जर्नलिज्म की ओर ले गया, जहां उन्होंने भारत की ‘सफेद धन’ अर्थव्यवस्था की जटिल चालों को वर्षों तक समझा और उजागर किया है. शेयर बाजार में हेरफेर से लेकर नियामक खामियों तक, पलक का काम हाई-फाइनेंस की चमक-दमक से पर्दा हटाकर दिखाता है कि असली धागे खींच कौन रहा है.)

 


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