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500 करोड़ का विस्तार, 1,200 नई नौकरियां: टॉरल इंडिया का ‘मेक इन इंडिया’ पर बड़ा दांव

स्वदेशीकरण पर जोर देते हुए, टॉरल इंडिया उन्नत कास्टिंग सॉल्यूशंस विकसित कर रही है और भारत के रक्षा इकोसिस्टम को मजबूत करने के लिए वैश्विक साझेदारियों पर काम कर रही है

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

टॉरल इंडिया एल्युमीनियम सैंड कास्टिंग तकनीक में अग्रणी बनकर उभर रही है, जो रक्षा, एयरोस्पेस, ऊर्जा, रेलवे और समुद्री क्षेत्रों को सेवाएं दे रही है. कंपनी ने स्वदेशी रूप से टैंकों के लिए इंजन ब्लॉक और रेलवे सिस्टम के लिए गियर केस जैसे महत्वपूर्ण पुर्जों का निर्माण किया है, जिससे भारत की रूस, जर्मनी और चीन से आयात पर निर्भरता कम हुई है. महाराष्ट्र के अहिलानगर में कंपनी 500 करोड़ रुपये की लागत से नया निर्माण संयंत्र स्थापित कर रही है, जिससे 1,200 से अधिक नौकरियां पैदा होंगी.

कंपनी का योगदान ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ मिशनों से मजबूत रूप से जुड़ा हुआ है और यह वैश्विक मानकों के साथ तकनीकी अंतर को भी पाट रही है. हाल ही में BW बिज़नेसवर्ल्ड को दिए एक साक्षात्कार में टॉरल इंडिया के संस्थापक और सीईओ भरत गीते ने कई मुद्दों पर बात की. साक्षात्कार के कुछ प्रमुख अंश यहां प्रस्तुत हैं:

शुरुआत में, कृपया टॉरल इंडिया और इसके मुख्य कार्यों का एक अवलोकन साझा करें.
टॉरल इंडिया रक्षा, एयरोस्पेस, ऊर्जा, रोबोटिक्स, हेल्थकेयर और मरीन जैसे विविध क्षेत्रों के लिए एल्युमीनियम कास्टिंग सॉल्यूशंस प्रदान करती है. हम विभिन्न आकारों और जटिलताओं की कास्टिंग बनाते हैं, जो इन क्षेत्रों में उपकरणों के लिए आवश्यक होती हैं. उदाहरण के लिए, रक्षा में हम टैंकों के लिए इंजन ब्लॉक सप्लाई करते हैं. रेलवे क्षेत्र में हम मीडियम स्पीड ट्रेनों और मेट्रो सिस्टम (जैसे मुंबई मेट्रो) के लिए गियर केस और वेंटिलेटर पार्ट्स बनाते हैं. हमारी खासियत एल्युमीनियम सैंड कास्टिंग में है, जो भारत में अभी भी एक नई तकनीक है. यह हमें कम मात्रा में लेकिन भारी, जटिल और उच्च तकनीकी पुर्जों का निर्माण करने की सुविधा देता है.

रक्षा और एयरोस्पेस क्षेत्रों में आपके योगदान क्या हैं?
रक्षा क्षेत्र में हमने सरथ टैंक के लिए 170 किलो वजनी, 300 एचपी क्षमता वाला एक जटिल इंजन ब्लॉक विकसित किया है. यह पुर्जा पहले रूस से आयात होता था, लेकिन 2021 में हमने इसे स्वदेशी रूप से डिजाइन, सिमुलेशन और प्रोडक्शन कर विकसित किया. पिछले 3–4 वर्षों से हम इसे नियमित रूप से सप्लाई कर रहे हैं, जिससे आयात लागत में उल्लेखनीय कमी आई है. हम फिलहाल इजराइली कंपनियों के साथ ड्रोन मैन्युफैक्चरिंग को लेकर शुरुआती बातचीत कर रहे हैं. एयरोस्पेस में, हम HAL और कई अंतरराष्ट्रीय कंपनियों से भविष्य की परियोजनाओं के लिए चर्चा कर रहे हैं.

आपके स्वदेशी रक्षा निर्माण प्रयासों का वित्तीय प्रभाव क्या रहा है?
बचत आदेश की मात्रा पर निर्भर करती है, लेकिन सरथ टैंक के इंजन ब्लॉक्स के मामले में हम वर्तमान में ऑर्डनेंस फैक्ट्री को सालाना लगभग 10.5 करोड़ रुपये की बचत दिला रहे हैं. ये पुर्जे पहले विदेशों से मंगाए जाते थे, इसलिए लागत में बड़ा अंतर है.

क्या आप केवल भारतीय सेना को सेवा देते हैं या आपके अन्य घरेलू और अंतरराष्ट्रीय ग्राहक भी हैं?
जी हां, हम इजराइल और फ्रांस जैसी अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के साथ बातचीत कर रहे हैं, हालांकि गोपनीयता के कारण नाम नहीं बता सकते. भारत के रक्षा खरीद मानदंडों के अनुसार, विदेशी आपूर्तिकर्ताओं को एक निश्चित प्रतिशत स्थानीय सामग्री शामिल करनी होती है—वहीं हम भूमिका निभाते हैं. घरेलू स्तर पर, हम ऊर्जा, रेलवे, मरीन और रोबोटिक्स क्षेत्रों को भी सेवा देते हैं. हाल ही में, हमने भारतीय तटरक्षक जहाजों के लिए पुर्जे विकसित किए हैं.

क्या आप भारतीय प्रतिभा को नियुक्त करते हैं? स्किल डेवलपमेंट के लिए क्या कदम उठाए हैं?
बिलकुल. हमारी पूरी टीम भारतीय है, जिसे स्थानीय इंजीनियरिंग कॉलेजों से भर्ती किया गया है. हमने कौशल विकास में बड़ा निवेश किया है—टीमों को यूरोप भेजा ताकि वे महत्वपूर्ण पुर्जों को संभालना सीखें. हमने 2016 में पुणे में शुरुआत की थी, जो इंजीनियरिंग के लिए एक मजबूत इकोसिस्टम वाला शहर है. हमारी नई यूनिट अहिलानगर में बन रही है, जो पुणे से 120 किमी दूर है. पुणे यूनिट क्रिटिकल कास्टिंग पर केंद्रित होगी, जबकि अहिलानगर यूनिट में ऊर्जा और अन्य क्षेत्रों के लिए बड़े पैमाने पर उत्पादन होगा.

क्या आपको सरकार से कोई समर्थन मिला है?
हम ऑटोमोटिव या सेमीकंडक्टर क्षेत्र में नहीं आते, इसलिए PLI स्कीम के पात्र नहीं हैं. लेकिन हमारी अहिलानगर यूनिट D+ जोन में है, जिससे हमें राज्य सरकार की कई प्रोत्साहन योजनाओं का लाभ मिल रहा है, जैसे स्टाम्प ड्यूटी माफी, बिजली पर छूट और जीएसटी रिफंड. हमारे प्रोजेक्ट के वर्गीकरण (लघु, मध्यम, बड़ा) के अनुसार, हम अगले 5–7 वर्षों में 50–70% निवेश वापस पा सकते हैं. हम इस योजना के तहत कम से कम 30–40% लाभ उठाने की उम्मीद रखते हैं.

क्या सरकार को आपके उद्योग के लिए कुछ और करना चाहिए?
हां, ज़मीन आवंटन की प्रक्रिया को तेज करने की ज़रूरत है. प्रशिक्षित मानव संसाधन की उपलब्धता और औद्योगिक क्षेत्रों को शहरों से जोड़ने के लिए बेहतर सड़क इन्फ्रास्ट्रक्चर भी जरूरी है. अगर सरकार इंडस्ट्रियल हब्स में स्किल डेवलपमेंट सेंटर बनाए तो यह बहुत मददगार होगा. सरकार प्रगति कर रही है, लेकिन अभी और लक्षित प्रयासों की आवश्यकता है.

आपका ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ मिशनों में क्या योगदान है?
हमारे 70–80% उत्पाद आयात विकल्प (import substitutes) हैं. सरथ टैंक के इंजन ब्लॉक से लेकर अमृत भारत ट्रेन के गियर केस तक—जो पहले जर्मनी से आते थे—हमने इन्हें स्वदेशी रूप से विकसित किया है. ऊर्जा क्षेत्र में भी हमने चीन से आयात पर निर्भरता को घटाया है. टॉरल आत्मनिर्भर भारत का एक सशक्त उदाहरण है.

आपके अनुसार भारत और जर्मनी जैसे देशों के बीच तकनीकी अंतर कितना है?
अंतर है, लेकिन वह घट रहा है. यूरोपीय साझेदार अब भारत को तकनीक ट्रांसफर करने के लिए अधिक खुले हैं, जिससे हमारी वर्कफोर्स की स्किल बढ़ रही है. भारत चीन की तरह टेक्नोलॉजी की नकल नहीं करता, बल्कि उसे अपने इकोसिस्टम में समाहित करता है. हमारे इंजीनियरिंग कॉलेज भी तेज़ी से बदल रहे हैं—AI, रोबोटिक्स और मशीन लर्निंग को पाठ्यक्रम में शामिल कर रहे हैं. हम एक इंडो-जर्मन संयुक्त उद्यम हैं और भारत में अंतरराष्ट्रीय स्तर के उत्पाद बना रहे हैं.

2025 और आगे के लिए आपके भविष्य की योजनाएं क्या हैं?
हाल ही में हमने वर्ल्ड इकनॉमिक फोरम, दावोस में महाराष्ट्र सरकार के साथ एक MoU पर हस्ताक्षर किए हैं. हम सुपा (अहिलानगर) में 500 करोड़ रुपये का निवेश कर रहे हैं, जिससे शुरुआती चरण में 1,200 नौकरियां पैदा होंगी. यह यूनिट 30 एकड़ में फैली होगी, जिसकी 20–30% भूमि का शुरुआती उपयोग किया जाएगा और अगले 10 वर्षों में इसका विस्तार किया जाएगा. हमारी योजना है कि हम अंततः 3,000 से अधिक लोगों को रोजगार दें. यह प्रधानमंत्री के 5 ट्रिलियन डॉलर की भारतीय अर्थव्यवस्था के लक्ष्य और महाराष्ट्र को 1 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने के विज़न से मेल खाती है. फिलहाल हमारा महाराष्ट्र के बाहर विस्तार का कोई इरादा नहीं है.


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