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नेपाल: अदृश्य पड़ोसी जिसे नजरअंदाज नहीं कर सकता भारत

नेपाल की भौगोलिक स्थिति उसे असाधारण रणनीतिक महत्व प्रदान करती है. यह भारत के साथ तीन ओर से खुली सीमा साझा करता है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

जैसे-जैसे नई दिल्ली अपनी विदेश नीति का दायरा इंडो-पैसिफिक, पश्चिम एशिया और लैटिन अमेरिका तक फैला रही है, ऐसा प्रतीत हो सकता है कि भारत की रणनीतिक ऊर्जा अब केवल अमेरिका, चीन और रूस जैसे महाशक्तियों तक ही सीमित है. लेकिन उत्तर में चुपचाप स्थित नेपाल, भारत का छोटा हिमालयी पड़ोसी, जिसे अक्सर सार्वजनिक विमर्श में नज़रअंदाज किया जाता है, आने वाले वर्षों में भारत के सबसे महत्वपूर्ण साझेदारों में से एक बन सकता है.

हिमालय में एक रणनीतिक आधारशिला
नेपाल की भौगोलिक स्थिति उसे असाधारण रणनीतिक महत्व प्रदान करती है. यह भारत के साथ तीन ओर से खुली सीमा साझा करता है और उत्तर में चीन के संवेदनशील तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र से लगा हुआ है. ऐतिहासिक रूप से नेपाल ने गंगा के मैदानी इलाकों में घुसपैठ से बचाव के लिए एक बफ़र की भूमिका निभाई. लेकिन आज की वैश्विक दुनिया में इसका महत्व केवल रक्षा तक सीमित नहीं रह गया है.

जलविद्युत से लेकर उच्च हिमालयी कूटनीति तक, नेपाल अब एशिया की दो महाशक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा का सेतु और रणक्षेत्र दोनों बनता जा रहा है.

जल और प्रभाव के इर्द-गिर्द उभरता संघर्ष
नेपाल के बढ़ते महत्व को सबसे स्पष्ट रूप से जल के मुद्दे से समझा जा सकता है. यह कोसी, गंडकी और कर्णाली जैसी प्रमुख अंतरराष्ट्रीय नदियों का उद्गम स्थल है, जो उत्तर और पूर्व भारत में करोड़ों लोगों की जीवनरेखा हैं. ये नदियां भारत की खाद्य और जल सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण हैं और अब भू-राजनीतिक संपत्तियों में बदलती जा रही हैं.

जलविद्युत परियोजनाएं, नदी जल साझा समझौते, और पारिस्थितिक सहयोग अब रणनीतिक साझेदारी के उपकरण बन चुके हैं. पाकिस्तान के साथ सिंधु जल संधि की हालिया पुनर्समीक्षा ने दक्षिण एशिया में नदी प्रणालियों की कूटनीतिक अहमियत को और भी उजागर किया है, जिसमें नेपाल अब एक केंद्रीय भूमिका निभा रहा है.

भारत के लिए, नेपाल हरित ऊर्जा क्षमता, हिमालयी रणनीतिक गहराई, और क्षेत्रीय निगरानी का केंद्र है. वहीं चीन के लिए यह बेल्ट एंड रोड परियोजना का गलियारा, सॉफ्ट पावर की आधारशिला और भारतीय क्षेत्र के नजदीक एक अहम उपस्थिति है.

नेपाल के सामने दो संभावित रास्ते
नेपाल आज एक रणनीतिक मोड़ पर खड़ा है, जहां इसके सामने दो संभावित रास्ते हैं - एक उच्च मार्ग जो स्वतंत्र कूटनीति की ओर ले जाता है, और एक निम्न मार्ग जो उसे बाहरी हस्तक्षेप और राजनीतिक उपकरण बनने की ओर धकेलता है.

रास्ता एक: रणनीतिक संतुलन साधने वाला नेपाल
नेपाल लंबे समय से भारत और चीन के बीच संतुलन साधता आ रहा है. यदि यह इस संतुलन को संस्थागत, पारदर्शी और लोकतांत्रिक जवाबदेही पर आधारित विदेश नीति में परिवर्तित कर सके, तो यह विकास और संवाद का एक तटस्थ केंद्र बन सकता है.

काठमांडू पहले ही भारत, चीन, अमेरिका, जापान और यूरोपीय संघ के साथ व्यापार, आधारभूत ढांचे, शिक्षा और जलवायु अनुकूलन जैसे क्षेत्रों में साझेदारी कर रहा है. यदि यह अपने लोकतांत्रिक ढांचे को मजबूत रख सके और राजनीतिक दखल से बच सके, तो यह भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को राष्ट्रीय विकास में बदल सकता है जैसे स्विट्जरलैंड ने किया, या भूटान ने चुपचाप.

भारत के लिए यही सबसे अनुकूल परिणाम होगा: एक स्थिर, संप्रभु सहयोगी जो पारिस्थितिकी, सुरक्षा और आर्थिक हित साझा करता है, पर निर्भर नहीं है.

रास्ता दो: प्रॉक्सी राजनीति का जाल
दूसरा विकल्प चिंता का कारण है. नेपाल के लोकतांत्रिक संस्थान अभी भी संवेदनशील हैं, और वहां राजनीतिक ध्रुवीकरण बढ़ता जा रहा है. आंतरिक गुटबाजी अब बाहरी ताकतों की ओर झुकाव का प्रतिबिंब बनती जा रही है, जहां वामपंथी दल चीन के करीब हैं, और मध्यमार्गी भारत की ओर झुकते हैं.

यदि यह रुझान नियंत्रित नहीं हुआ, तो नेपाल विदेशी शक्तियों के लिए प्रॉक्सी राजनीति का मैदान बन सकता है, जहां वे अपने हित साधने के लिए स्थानीय दलों को समर्थन दें. इसका परिणाम होगा: अस्थिरता, भ्रष्टाचार और कमजोर संप्रभुता.

भारत के लिए इसके गंभीर और तात्कालिक प्रभाव होंगे. भारत-नेपाल खुली सीमा, जो अब तक आपसी संबंधों का प्रतीक रही है, एक कमजोरी बन सकती है. डिसइनफॉर्मेशन, अवैध व्यापार और ग्रे-ज़ोन रणनीति के लिए एक रास्ता. नेपाल में चीनी प्रभाव का बढ़ना सिक्किम और बिहार जैसे सीमावर्ती राज्यों की सुरक्षा चिंताओं को फिर से जागृत कर सकता है.

भारत का अवसर: एक समकक्ष साझेदारी
इन खतरों को देखते हुए, भारत को नेपाल को एक कनिष्ठ साझेदार नहीं, बल्कि एक संप्रभु समकक्ष के रूप में देखना चाहिए. भारत-नेपाल संबंध गहरे सभ्यतागत जुड़ाव, सांस्कृतिक समानताओं और सीमापार आजीविकाओं पर आधारित हैं। यही इतिहास एक आधुनिक और भविष्य-उन्मुख साझेदारी की नींव बन सकता है.

इसके लिए नई दिल्ली को निम्नलिखित कदमों पर विचार करना चाहिए:

1950 की शांति और मित्रता संधि पर खुले मन से विचार-विमर्श करना, ताकि बदलते क्षेत्रीय परिदृश्य और नेपाल की संप्रभु प्राथमिकताओं को उचित मान्यता मिल सके.

स्वास्थ्य, शिक्षा और डिजिटल संपर्क जैसे जन-हितकारी क्षेत्रों में निवेश को प्राथमिकता देना, जिससे आम जनता का विश्वास और सद्भाव बढ़े.

राजनीतिक हस्तक्षेप से बचते हुए शासन और संस्थागत मजबूती में पारदर्शी सहयोग के ज़रिए नेपाल की लोकतांत्रिक मजबूती को समर्थन देना.

आज की रणनीतिक साझेदारियां पदानुक्रम से नहीं, बल्कि विश्वास से टिकती हैं.  एक सशक्त भारत को अपने पड़ोस में भरोसेमंद और स्थायी रिश्ते बनाने होंगे. एक लोकतांत्रिक, समृद्ध और आत्मनिर्भर नेपाल भारत के लिए कोई चुनौती नहीं है, बल्कि वह एक रणनीतिक पूंजी है.

क्या 'दो चट्टानों के बीच याम' की बात अब भी प्रासंगिक है?
नेपाल का ऐतिहासिक आत्म-वर्णन “दो चट्टानों के बीच याम” आज भी अर्थ रखता है, लेकिन अब यह याम निष्क्रिय नहीं है. अब उसके पास एजेंसी है. वह अपने भूगोल और हितों का उपयोग कर विकास और कूटनीति का केंद्र बन सकता है. या फिर, यदि सही नेतृत्व न मिला, तो वह बाहरी शक्तियों के संघर्ष का मैदान बन सकता है. भारत के लिए तस्वीर स्पष्ट है: एक संप्रभु, बहुलतावादी और सक्षम नेपाल केवल एक पड़ोसी नहीं है जिसे साथ लेकर चलना है. वह एक अनिवार्य रणनीतिक साझेदार है, विशेषकर इस उथल-पुथल से भरे एशियाई युग में.

सिद्धार्थ अरोड़ा, अतिथि लेखक
(सिद्धार्थ अरोड़ा एक मैकेनिकल इंजीनियर और एमबीए (मैनेजमेंट डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट) हैं, जो वर्तमान में डेलॉइट में एआई/एमएल प्रोडक्ट मैनेजर के रूप में कार्यरत हैं. उन्हें अंतरराष्ट्रीय संबंधों और विदेश नीति में गहरी रुचि है.)

 


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